आज़ादी की वो सुबह दूर है;हमारा राष्ट्रवाद बस इतना है कि हम किस तरह इसके बहाने एक दूसरे को ज़लील कर लें
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ये मुल्क सौ साल से ज़्यादा अंग्रेज़ों का ग़ुलाम रहा। ग़ुलामी भी ऐसी-वैसी नहीं। अंग्रेज़ों ने मुल्क के संसाधन लूटे, संस्कृति का हरण किया, हमारी भाषाएं छीनीं।
हमारी सभ्यता से जुड़ा जो कुछ भी था, वो सबकुछ लूट कर, खुरच कर, छील कर अपने साथ विलायत ले गए।
हम पर अपनी भाषा,अपना पहनावा और अपनी सोच थोप कर गए। हम उनकी लड़ाइयों का ईंधन बने। हमारी दौलत से लंदन जैसे शहर सजाए गए।
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- हमारे संसाधनों पर मैनचेस्टर के उद्योग खड़े हुए।
- हमारा ख़ून उनकी मिलों का ईंधन बना। हमारे खेत बंजर हो गए और हमारे जवान विश्व युद्धों की भेंट चढ़ गए।
- यहां जो रह गए वो ग़रीबी, भूख और अकाल की भेंट चढ़े। जो ज़िंदा रहे वो गोली, फांसी और सलीब की रौनक़ बने।
- उनके तख़्त, ताज, महल, दौलत, वैभव, म्यूज़ियम सब हमारी लूटी हुई संपत्ति हैं।
- लेकिन इस सबके बावजूद हमारे दिलों में अंग्रेज़ों के लिए वैसी नफरत नहीं है जैसी होनी चाहिए थी।
- हमारी नफरत के केंद्र में आज़ादी के सिपाही हैं। हमें नेहरू, गांधी से नफरत है।
- हम अपने सैकड़ों स्वतंत्रता सेनानियों का नाम नहीं जानते।
- जिन्हें हम सिपाही मान रहे हैं उसकी वजह उनके योगदान से ज़्यादा उनकी जाति और धर्म हैं।
- हमारी नफरत के केंद्र में साम्राज्यवाद नहीं है। अंग्रेज़ समझदार थे। उन्हें हमारे दिलों में छिपे मज़हबी नफरत के ज़हर का राज़ मालूम था।
- वो दक्षिण एशिया में हिंदू के सामने मुसलमान और हिंदी के सामने उर्दू को खड़ा करके गए।
- वो हमारे बहुसंख्यकों को बताकर गए कि देखो जब भी ज़हन में नफरत उबाल मारे तो सामने अल्पसंख्यकों को खड़ा कर लेना।
- पाकिस्तान हमारे लिए और हम पाकिस्तान के लिए चांदमारी की दीवार हैं। इन दीवारों पर हम अपनी नफरत के असलहे और बम दाग़ते हैं।
- हमारे शोषक और लुटेरे हमारे मित्र हैं। मित्र भी ऐसे कि उनकी लूट जारी है मगर हमें उसकी फिक्र नहीं।
- हमारे राष्ट्रवाद की बुनियाद आज़ादी का संघर्ष या साम्राज्यवाद से हमारी लड़ाई नहीं है।
- आज़ादी के दीवाने हमारे आदर्श नहीं हैं। आज हमारा राष्ट्रवाद मज़हबी नफरत की बुनियाद पर टिका है।
- हमारे राष्ट्रवाद का मतलब राष्ट्र निर्माण या साम्राज्यवाद के ख़िलाफ संघर्ष नहीं है।
- हमारा राष्ट्रवाद बस इतना सा है कि किस तरह इसकी कसौटी पर अल्पसंख्यकों की परीक्षा ली जाए।
- हमारा राष्ट्रवाद बस इतना है कि हम किस तरह इसके बहाने एक दूसरे को ज़लील कर लें।
- ऐसी नफरत के चबूतरे पर खड़े राष्ट्र को यौमे आज़ादी की मुबारकबाद, इस दुआ के साथ कि हम एक दिन इस नींद से जाग जाएं।
- हम उस रोज़ आज़ाद होंगे जिस रोज़ हम अपने तमाम देशवासियों की तरफ से दिलों का मैल धोकर उन्हें बराबर मानेंगे।
- आज़ादी उस रोज़ नुमाया होगी जिस रोज़ हम अपने लोगों से नहीं, शोषण, लूट और साम्राज्यवाद से नफरत करेंगे।
- फिलहाल वो सुबह दूर है, आज़ादी की वो सुबह अभी नहीं आई है ।

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