व्यापारिक गलियारों की जंग: आगे कुआँ, पीछे खाई

ईश्वर के लिए, अभी भी समय है,संभल जाइए, देर होती जा रही है।

लेखिका: तस्नीम कौसर

चीन-बांग्लादेश समझौते के बाद: क्या तुर्किये की कूटनीति और चाबहार कार्ड के सहारे भारत चीन को मात दे सकता है? क्या भारत वास्तव में अपने पड़ोसी देशों के साथ बेहतर संबंध स्थापित करने का इच्छुक है? देश इस समय एक निर्णायक मोड़ पर खड़ा है। क्या बहुसंख्यक समाज में बढ़ता धार्मिक उन्माद वही चट्टान बनता जा रहा है, जिससे भारत का जहाज़ टकराने वाला है? ईश्वर के लिए, अभी भी समय है,संभल जाइए, देर होती जा रही है।

 

दक्षिण एशिया और पश्चिम एशिया (मध्य पूर्व) की भू-राजनीति इस समय ऐतिहासिक परिवर्तन के दौर से गुजर रही है। चीन और बांग्लादेश के बीच हाल ही में हुए रणनीतिक समझौते, विशेषकर तीस्ता नदी परियोजना, ने नई दिल्ली के सुरक्षा और रणनीतिक हलकों में चिंता बढ़ा दी है। दूसरी ओर, मध्य पूर्व में लगातार गहराते संकट ने अमेरिका और भारत की साझेदारी में प्रस्तावित इंडिया-मिडिल ईस्ट-यूरोप इकोनॉमिक कॉरिडोर (IMEC) को ऐसा झटका दिया है, जिसकी तुलना "टाइटैनिक" के डूबने से की जा रही है।

इन बदलती परिस्थितियों ने भारत को अपनी पारंपरिक विदेश नीति पर पुनर्विचार करने के लिए विवश कर दिया है। वर्तमान भू-राजनीतिक परिदृश्य में भारत के लिए सबसे व्यावहारिक और प्रभावी रणनीति यह हो सकती है कि वह तुर्किये के साथ अपने कूटनीतिक संबंधों को शीघ्र सामान्य करे और चीन के रणनीतिक प्रभाव, विशेषकर ग्वादर बंदरगाह, का मुकाबला करने के लिए चाबहार बंदरगाह और उससे जुड़े नेटवर्क को अधिक सक्रिय बनाए।

तुर्किये: यूरोप का वैकल्पिक प्रवेश द्वार और IMEC का संभावित समाधान

मध्य पूर्व में जारी संघर्ष और लाल सागर की अस्थिर स्थिति ने यह स्पष्ट कर दिया है कि इज़राइल के हाइफ़ा बंदरगाह पर आधारित लॉजिस्टिक मार्ग फिलहाल व्यावहारिक नहीं रह गया है। ऐसे में तुर्किये एक स्वाभाविक और सुरक्षित वैकल्पिक मार्ग प्रस्तुत करता है।

तुर्किये सदियों से एशिया और यूरोप के बीच व्यापारिक सेतु की भूमिका निभाता आया है। यदि भारत संयुक्त अरब अमीरात और सऊदी अरब के माध्यम से अपने व्यापारिक नेटवर्क को तुर्किये के सड़क और रेल नेटवर्क (हिजाज़ रेलवे सहित) से जोड़ सके, तो वह भूमध्य सागर के अस्थिर क्षेत्रों और युद्धग्रस्त इलाकों से बचते हुए सीधे और अपेक्षाकृत सुरक्षित रूप से यूरोप तक पहुँच सकता है।

जब IMEC की घोषणा हुई थी, तब तुर्किये को उसमें शामिल न किए जाने पर अंकारा ने असंतोष व्यक्त किया था। यदि भारत अब तुर्किये को अपनी नई लॉजिस्टिक रणनीति का हिस्सा बनाता है, तो इससे दोनों देशों के बीच विश्वास का वातावरण बनेगा, राजनीतिक तनाव कम होगा और व्यापारिक संबंधों को नई गति मिल सकती है।

पाकिस्तान-तुर्किये गठबंधन को संतुलित करने की रणनीति

भारतीय विदेश नीति की एक पारंपरिक कमजोरी यह रही है कि उसने तुर्किये को हमेशा पाकिस्तान का निकट सहयोगी मानकर उससे दूरी बनाए रखी। जबकि अंतरराष्ट्रीय राजनीति का मूल सिद्धांत है कि कोई भी कूटनीतिक रिक्तता लंबे समय तक खाली नहीं रहती।

यदि भारत तुर्किये से दूरी बनाए रखता है, तो वह अनजाने में अंकारा को पूरी तरह इस्लामाबाद के राजनीतिक दृष्टिकोण के प्रभाव में छोड़ देता है।

भारत को वही नीति अपनानी चाहिए, जो उसने अतीत में सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात के साथ अपनाई थी। अपने विशाल बाज़ार, आर्थिक क्षमता और निवेश की ताकत के माध्यम से भारत ने इन देशों के साथ मजबूत संबंध स्थापित किए और क्षेत्रीय संतुलन बनाने में सफलता प्राप्त की।

आज तुर्किये की अर्थव्यवस्था को विदेशी निवेश और नए व्यापारिक साझेदारों की आवश्यकता है। ऐसे में भारत आर्थिक सहयोग के माध्यम से तुर्किये को अपने साथ जोड़ सकता है और पाकिस्तान-तुर्किये समीकरण को अधिक संतुलित बना सकता है।

ग्वादर: चीन की रणनीतिक कमजोरी और चाबहार का महत्व

चीन की बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (BRI) तथा विशेष रूप से चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा (CPEC) एक ऐसी रणनीतिक चुनौती पर आधारित है, जिसे "मलक्का दुविधा" (Malacca Dilemma) कहा जाता है।

चीन को आशंका रहती है कि किसी बड़े संघर्ष की स्थिति में अमेरिका और भारत मलक्का जलडमरूमध्य को अवरुद्ध कर सकते हैं, जहाँ से उसकी ऊर्जा आपूर्ति का अधिकांश हिस्सा गुजरता है। इसी कारण चीन ग्वादर बंदरगाह के माध्यम से हिंद महासागर तक सीधी पहुँच विकसित करना चाहता है।

ग्वादर में चीन की बढ़ती मौजूदगी भारत के लिए एक रणनीतिक चुनौती है, लेकिन इसका उत्तर भारत के पास पहले से मौजूद है—ईरान का चाबहार बंदरगाह।

भारत को चाहिए कि वह चाबहार परियोजना को तेज गति से आगे बढ़ाए और उसे इंटरनेशनल नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर (INSTC) के साथ पूरी तरह जोड़कर सक्रिय करे। यह मार्ग न केवल पाकिस्तान को दरकिनार करते हुए भारत को मध्य एशिया और रूस तक पहुँच प्रदान करता है, बल्कि ग्वादर के प्रभावी विकल्प के रूप में भी उभर सकता है और अरब सागर में चीन की रणनीतिक महत्वाकांक्षाओं को सीमित कर सकता है।

समय की मांग: नई भू-आर्थिक सोच

उर्दू भाषी युवा पीढ़ी, विशेषकर वे लोग जिनकी रुचि शोध और भू-राजनीतिक विश्लेषण में है, उन्हें यह समझना चाहिए कि बांग्लादेश और मालदीव जैसे पड़ोसी देशों में चीन के बढ़ते प्रभाव का जवाब केवल रक्षात्मक नीति से नहीं दिया जा सकता।

भारत को एक नई, सक्रिय और भू-आर्थिक (Geo-economic) विदेश नीति अपनानी होगी। तुर्किये के साथ संबंधों का पुनर्निर्माण पाकिस्तान के पारंपरिक कूटनीतिक प्रभाव को आर्थिक हितों के माध्यम से संतुलित कर सकता है, जबकि चाबहार बंदरगाह का गंभीरता और प्रतिबद्धता के साथ विकास ग्वादर में चीन की रणनीतिक बढ़त को चुनौती दे सकता है।

अब समय आ गया है कि भारत अपनी पारंपरिक झिझक को छोड़कर यथार्थवादी, व्यावहारिक और राष्ट्रीय हितों पर आधारित विदेश नीति अपनाए।

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