दिल्ली सांप्रदायिक हिंसा में गोदी मीडिया ने रेडियो रवांडा की याद ताज़ा करदी।

1994, रवांडा में मीडिया के झूठे प्रोपगैंडा के कारण सिर्फ सौ दिनों में आठ लाख लोगों को मौत के घाट उतार दिया था।

मोहम्मद अलामुल्लाह

'गोदी मीडिया' पिछले दो तीन महीने से 'सी ए ए' , 'एन आर सी' और 'एन पी आर' के सम्बन्ध में जो रवैया अपनाये हुए है उसे किसी भी प्रकार से पत्रकारिता के सिद्धांत और मूल्यों पर आधारित नहीं कहा जा सकता है। अगर मीडिया का यही रवैया रहा तो उसके बहुत नकारात्मक परिणाम दिखेंगे। तब मीडिया पर समाज का भरोसा बाक़ी रहेगा या नहीं यह एक अलग चर्चा का विषय है लेकिन ऐसे मीडिया परिवार से देश और देश वासियों का क्या हाल होगा अंदाज़ा लगाना मुश्किल नहीं है। हमारे सामने इसके उदाहरण मौजूद हैं। जिसमें मीडिया के ऐसे व्यवहार के कारण पुरे एक विशेष समुदाय को अति भयानक परिणाम भुगतने पड़े हैं और एक पूरे वर्ग को तबाह कर दिया गया है।

इस संबंध में रवांडा में होने वाले नरसंहार का उदाहरण प्रस्तुत किया जा सकता है। जिसमें 6 अप्रैल 1994 को अफ्रीकियों को समाप्त करने में मीडिया की भूमिका को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता है। इस सन्दर्भ में एलिन थॉम्पसन द्वारा सम्पादित पुस्तक 'द मीडिया एंड रवांडा जेनोसाइड' एक उपयोगी दस्तावेज़ है। इस किताब के अनुसार मीडिया के झूठे प्रोपगैंडों के कारण केवल सौ दिनों में आठ लाख लोगों को मौत की नींद सुला दिया गया। रवांडा में दो समुदाय के लोग निवास करते थे। एक होतु जो बहुसंख्यक समुदाय से थे और दूसरा तुत्सी जो अल्पसंख्यक थे। रवांडा के राष्ट्रपति की फ्लाइट को एंटी एयर क्राफ्ट मिसाइल से निशाना बनाया गया, जिसमें राष्ट्रपति की मौत हो गयी। लेकिन यह नहीं पता चला कि यह किसने किया। राष्ट्रपति का सम्बन्ध बहुसंख्यक समुदाय हुतो से था और फौजी कमान का भी। इस हत्या का आरोप अल्पसंख्यक तुत्सी समुदाय पर लगा। उनके आपस में पहले से ही हालात तनावपूर्ण थे। उनको मीडिया में कॉकरोच कहा जाता था ठीक वैसे ही जैसे भारत में कुछ लोग मुसलमानों को 'कपड़ों' से पहचानने की कोशिश करते हैं तो कुछ 'पोहा' से तो कुछ लोग 'गद्दार' कह कर गोली मारने की धमकी देते हैं, तो कुछ 'बाबर की औलादों को गोली मारो सालों को---' जैसे अपमानजनक शब्दों का धड़ल्ले से उपयोग करते हैं। यह सारी चीज़ें टीवी और मीडिया पर भी बगैर किसी डर और बिना किसी शर्म के बार बार कही जाती है।

नफरत क्या कुछ कर सकती है ? यह किसी ने सोचा भी नहीं होगा। हमारी मीडिया की ही तरह रेडियो रवांडा की माध्यम से उस अल्पसंख्यक समुदाय के विरुद्ध लगातार ज़हर उगला गया और टॉट्सियों को कॉकरोच कह कर मार डालने के सन्देश प्रसारित किए जाते रहे। रवांडा की फ़ौज ने 'होतो' में डंडे बांटे कि जहाँ विरोधी समुदाय के लोग मिलें उनकी हत्या कर दी जाये। जो उस समुदाय से हमदर्दी दिखायेगा उसे गद्दार कहा जायेगा। लोगों ने अपने पड़ोसियों यहाँ तक के विरोधी समुदाय से सम्बन्ध रखने वाली अपनी बीवियों की भी डंडों और चाकुओं से हत्या कर दी। असांप्रदायिक हुतू भी उनके लपेटे में आ गये। जैसे आज हमारे देश में सेक्युलर हिन्दुओं को निशाना बनाया जा रहा है और उनके खिलाफ नफरत का माहौल बनाया जा रहा है। कुछ लोग खुलेआम त्रिशूल, लाठी, डंडें और बल्लम बाँट रहे हैं और उन्हें कोई पूछने वाला नहीं है, यहाँ तक कि मीडिया भी नहीं, जिनका काम ही समाज के असल रूप को दिखाना और सवाल पूछना है।


रवांडा में उस व्यापक नरसंहार के पीछे मीडिया का घृणास्पद रवैया था। जिसने एक विशेष समुदाय के विरुद्ध इतना प्रोपगैंडा किया कि लोग उस समुदाय से नफरत करने लगे और उनके खिलाफ सड़कों पर निकल आए और वही हुआ,जिस का डर था। बहुत ही ढंग से सत्ता विरोधीयों की लिस्ट तैयार कर के सांप्रदायिक लोगों को दिया गया। जैसे 2002 में गुजरात हिंसा के समय किया गया था। पड़ोसियों ने अपने पड़ोसियों की हत्या की। ऐसा भी हुआ कि पतियों ने अपनी पत्नियों की हत्या कर दी की अगर वो ऐसा नहीं करते तो अलगावादी उन्हें मार देते। उस समय लोगों से कहा गया वह अपना पहचान पत्र अपने साथ रखें। अलगावादियों ने सड़कों की नाका बंदी कर दी और तूत्सीयों को रोक कर कृपाणों से हत्या कर दी। हज़ारों की संख्यां में तूत्सी युवतियों को दासी बनाया गया। इन शैतानी मीडिया आउटलेट्स ने दर्शकों और पाठकों की भावनाओं को भड़काते हुए उन पर ज़ोर देते कि 'कीड़े मकोड़ों' को मिटा कर रख दो। मानो तुत्सी आबादी को ही समाप्त कर दो। यहाँ तक कि उन गिरजा घरों और पादरियों को भी मार दिया गया जिन में किसी ने जान बचाने के लिए पनाह लेने की कोशिश की।

वर्तमान समय में अपने देश के मीडिया को देखिये। पूरे देश में कुछ वर्षों में हुए मॉब लींचिंग का विवरण देखिये। जामिया और शाहीन बाग़ में गोली चलाये जाने की घटना को याद कीजिये , बंगलुरु,भोपाल,उत्तर प्रदेश, बंगाल और चेन्नई में 'सी ए ए' और 'एन आर सी' से सम्बंधित हो रहे शांति पूर्वक धरना प्रदर्शनों पर मीडिया और पुलिस के रवैये को देखिये तो आप को रवांडा की घटना से काफी समानता दिखेगी। सरकार की ओर से 'सी ए ए' की घोषणा, उस के बाद जामिया मिल्लिया इस्लामिया, जे एन यू और अलीगढ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में हंगामा, छात्रों पर हमला और उन की पिटाई और इन पूरे मामलों पर मीडिया का जो रवैया रहा है उस पर ध्यान दीजिये।

भारत में मीडिया का स्तर इतना शायद पहले कभी नहीं गिरा होगा, उस समय भी नहीं जब इन्दिरा गाँधी के ज़माने में इमरजेंसी लागू हुई थी। लेकिन आज कल तो ऐसा लग रहा है जैसे मीडिया अपनी ज़िम्मेदारियों को ही फरामोश कर बैठी है। इसकी वजह से पूरे देश का वातावरण प्रभावित हो रहा है। भोले भले, सीधे सादे लोग मीडिया के प्रोपगंडे का शिकार हो कर एक विशेष समुदाय को मारने मरने पर तुले हुए हैं। गाँव गाँव में जहाँ से कभी सांप्रदायिक हिंसा की कोई खबर नहीं आती थी वातावरण ऐसा ज़हरीला हो गया है कि कई स्थानों से अल्संख्यकों को भगाने और उन पर अत्याचार की ख़बरें लगातार आ रही हैं। लेकिन किसी को इसका अफ़सोस तक नहीं है। कहीं एक्का दुक्का मीडिया घरानों में इसकी ख़बरें दिखाई देती हैं। लेकिन ज़्यादा तर इस तरह की ख़बरों से या तो मुंह छुपाती हैं या जानबूझ कर ग़लत रिपोर्टिंग करके लोगों को गुमराह करने की कोशिश की जाती है।

मीडिया की इस नकारातमक भूमिका के कारण आपस में नफरत एक बीमारी का रूप ले चुकी है। इसके कारण हम देश में दिन प्रतिदिन कुछ न कुछ नयी वारदात होते देख रहे हैं। लोकतान्त्रिक तरीक़े शांतिपूर्वक से धरना प्रदर्शन कर रहे लोगों पर गोलियां चलाई जा रही हैं। गौ हत्या के नाम पर लोगों की लिंचिंग की जा रही है। निहत्ते प्रदर्शनकारियों पर गुंडे हमले कर रहे हैं। पुलिस जब, जिसको चाहती है उठा कर ले जाती है, गोली मार देती है, लेकिन इसके विपरीत मीडिया उस पर सवाल खड़े करती, ऐसा लगता है वह ज़ालिमों की समर्थन कर रही है। उन्हें बचाने की कोशिश हो रही है। हमारे यहाँ रुझान इस हद तक हावी हो गया है कि अब इसे लोग बुरा भी नहीं मान रहे हैं। इसके कारण न सिर्फ नागरिकों और संस्थानों की साख तबाह हो रही है, बल्कि बहुत सी जानें भी दाव पर लग रही हैं। जो वास्तविक स्थिति इस समय है अगर इसे बदलने के लिए कदम नहीं उठाए गए, तो हमें आपदा और विनाश को गले लगाने के लिए तैयार रहना होगा। क्योंकि नफरतों की शाखों पर मुहब्बतों के फूल कभी नहीं खिल सकेंगे, बसंत में।

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