ये आईना है 2019 के लोकसभा चुनाव की तस्वीर को देखने का
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कितना अजीब है।
मैं प्रेसिडेंशियल डिबेट वाले दिन जेएनयू में था,बारी बारी से अध्य्क्ष पद के प्रत्यशी अपनी बात रख रहे थे,छात्र राजद,बापसा,लेफ्ट यूनिटी,एनएसयूआई,एबीवीपी ओर निर्दलीय, मेने वहाँ एक चीज़ महसूस की 'जितने भी प्रत्यशी अपनी बात रखने आए सभी ने एबीवीपी को समान मुद्दों पर लपेटा,बाद में जब एबीवीपी प्रत्यशी ललित पांडे अपनी स्पीच के लिए खड़ा हुआ तो उसके विरोध में उठ रही आवाज़ भी मिली जुली थी,
वहां बापसा,लेफ्टिस्ट,जयंत,विकास,सब एक सुर में विरोध जता रहे थे,फिर जब आज सुबह ही से एबीवीपी ने कैंपस में गुंडई मचा रखी है,बाहर से लाठी डंडे ओर बंदे बुलवाए जा रहे हैं तो जेएनयू के सभी संगठन इसका विरोध मिलकर कर रहे हैं,ओर अब जब चुनावी नतीजों के शुरुआती रूझान सामने आने लगे हैं तो एबीवीपी बहुत कम मार्जन से दूसरे नम्बर पर है और निरन्तर प्रोग्रेस कर रही है,
बाकी अजीब ये है कि जयंत,बापसा,एनएसयूआई जो गुंडागर्दी के खिलाफ लेफ्ट यूनिटी के साथ खड़े हैं पचास साठ सत्तर में सिमटे जा रहे हैं,लेफ्ट यूनिटी मात्र दस बीस पचास वोट की लीड कर रही है।
ये मानने योग्य बात है कि चुनाव विभिन्न मुद्दों पर लड़ा जाता है,हर एक संगठन का अपना अधिकार भी है की वो स्वतंत्र लड़े या मिलकर लड़े,लेकिन महत्वपूर्ण प्रश्न इस बार "लड़ाई"का था वही लड़ाई जिसे लेकर हम सब एबीवीपी के सामने खड़े हैं,वही लड़ाई जिसमें एबीवीपी की हार के बाद नजीब की लड़ाई के जिंदा रह जाने की संभावना बचती है,एबीवीपी की जीत या कैंपस में मजबूती हमारी लड़ाई के सामने एक चुनोती है और इस चुनोती को हम खुद खड़ा किए हैं।
बाकी अजीब ये है कि जयंत,बापसा,एनएसयूआई जो गुंडागर्दी के खिलाफ लेफ्ट यूनिटी के साथ खड़े हैं पचास साठ सत्तर में सिमटे जा रहे हैं,लेफ्ट यूनिटी मात्र दस बीस पचास वोट की लीड कर रही है।
ये मानने योग्य बात है कि चुनाव विभिन्न मुद्दों पर लड़ा जाता है,हर एक संगठन का अपना अधिकार भी है की वो स्वतंत्र लड़े या मिलकर लड़े,लेकिन महत्वपूर्ण प्रश्न इस बार "लड़ाई"का था वही लड़ाई जिसे लेकर हम सब एबीवीपी के सामने खड़े हैं,वही लड़ाई जिसमें एबीवीपी की हार के बाद नजीब की लड़ाई के जिंदा रह जाने की संभावना बचती है,एबीवीपी की जीत या कैंपस में मजबूती हमारी लड़ाई के सामने एक चुनोती है और इस चुनोती को हम खुद खड़ा किए हैं।
जेएनयू का चुनाव एक आम चुनाव नही है,विचारधाराओं की बेड़ियों से परे मज़लूमों के हक की लड़ाई के लिए एकता बहुत ज़रूरी थीनजीब को गायब करने वाले यही लोग थे,रोहित वेमुला को प्रेशराइज़ करने वाले यही लोग थे,ओर आप वैचारिक मतभेद में अटक कर रह गए हैं,ये आईना है 2019 के लोकसभा चुनाव की तस्वीर को देखने काl

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