“क्यों हमें मीडिया द्वारा परोसी जाने वाली सामग्रियों को समझने की ज़रूरत है”

By Abhinandan Gopal

 

कल्पना कीजिए कि अगर किसी घटना की सूचना पाने का हमारे पास कोई माध्यम न हो। न घर की चौखट पर अख़बार आए, न किसी श्रवण यंत्र से हम हर शाम खबरें सुन पाएं, न हम रातों में बैठकर समाचार देख पाएं तो क्या होगा? हमें मालूम नहीं लेकिन संचार के हर माध्यम का हमारे जीवन के हर पहलू पर बहुत ही महत्वपूर्ण प्रभाव है।

खबरें हमें घर के बाहर की दुनिया से जोड़ती हैं। हमारी आबादी का इक बड़ा हिस्सा कभी अपने राज्य  या फिर देश के बाहर कदम नहीं रख पाता है परंतु फिर भी वह दूर की जगहों की घटनाओं का ज़िक्र यूं करते हैं जैसे यह उनके पड़ोस की बात हो।

हम जो सोचते हैं, हम जो कहते हैं और जो करते हैं, इन सबका सीधा नाता हमारे जो सुनने और देखने से है। बेशक, चाहे वह सोशल मीडिया से, प्रिन्ट मीडिया से या फिर मास मीडिया से हो।

आज दुनिया की हर पीढ़ी मीडिया से जुड़ी हुई है

हमारे देश में एक बड़ी जनसंख्या सांस लेती है और उसका एक बड़ा हिस्सा जो सुनता है,  जो देखता है उसके बाद कुछ सोचता नहीं है। मीडिया केवल खबर का माध्यम नहीं, यह कई लोगों की कान है, कई लोगों की आँख है और कई लोगों का दिमाग भी है। हमें पता होना चाहिय हम जो समाचार में देखते हैं वह हमें किसलिए दिखाया जा रहा है। हम जो समाचार सुनते हैं वो हमें किसलिए सुनाया जा रहा है? क्या हमारे अखबारों में उतनी ही वास्तविकता है जितनी हमारी दुनिया में।

बहरहाल संचार का एक सही माध्यम हमारी जागरूकता को सही दिशा दिखाता है। जब लोग शहर की चौक पर इकट्ठा होकर मोमबत्ती जलाते हैं। जब लड़कियां सड़कों पर उतरकर निर्भया का इंसाफ मांगती हैं। जब बच्चे मज़बूत इरादों के साथ धरती को सहेजने की ज़िद्द करते हैं उनकी आवाज़ और भावनायें देश के हर कोने में मीडिया के माध्यम से गूंजती हैं।

हम संचार के प्रभाव को उस वक्त पहचान पाते हैं जब हम अलग-अलग शहरों में,  अलग-अलग राज्यों में एक सही उद्देश्य के लिए अपनी आवाज़ उठाते हैं। सही और जागरूक मीडिया सरकार के लिए भी आईना है और हमारे लिए भी। यह लोगों के सवाल और दिक्कतें मुल्क को चलाने वालों तक पहुंचा सकती है और उनकी हर हरकत हम तक।

कई बार हमारी गली के आगे कोई मदद मांगता रह जाता है और लोग वहां से बहरे होकर गुज़र जाते हैं। उसी इंसान की गुहार को जब हम नेशनल न्यूज़ में देखते हैं तो पूरा देश हाथ बढ़ाने को खड़ा हो जाता है। इस लिए सवाल यह है कि क्या आजकल हम मीडिया पर पूरी तरह विश्वास कर सकते हैं। शायद हाँ या शायद नहीं।

सोशल मीडिया, जहां एक तरफ कई बार हमारे शोर गुल की दुनिया से दूर के दुखों को वायरल कर देती है। हम में से कुछ लोग जब कहीं कुछ गलत होता हुआ देखते हैं तो वह अपने मोबाइल और सोशलाइट्स का इस्तेमाल करते हैं। फिर हज़ारों और लाखों लोग इंटरनेट का इस्तेमाल करते हुए अपना विरोध व्यक्त करते हैं। अब सही और गलत खबरें बराबर की तेज़ी से फैलती हैं। लोग अब सोशल मीडिया पर एसिड अटैक को भी बढ़ावा देते हैं।

दुष्कर्म के आरोपियों के लिय फांसी की भी मांग करते हैं। हमारा हर एक लाइक और शेयर मायने रखता है और हमारी जागरुकता दर्शाता है। अब वक्त कुछ ऐसा है कि हमारे बच्चे केवल बुरे दोस्तों की बुरी संगति से नहीं बिगड़ते, अब उनके लिए असानी से एक गन्दी “डिजिटल गली” उपलब्ध है।

गौर कीजिएगा तो समझ आएगा कि जो खबरें हम सुनते हैं उनमें हकीकत से ज़्यादा मसाला और ध्वनि है। मीडिया जगत ज़मीन की वस्तु को आसमान में दिखाते हैं और आसमान की वस्तुओं को ज़मीन में। वह एक ही खबर को भयावाह और अलग शब्दो में बार बार दोहराते हैं। हम भी सुनते सुनते रोज़ाना की ज़िंदगी में वैसे ही शब्दों का इस्तेमाल करने लगते हैं। हमें यह नहीं कहना चाहिए कि हम किसी का विरोध कर रहें हैं, हमें यह कहना चाहिये कि हम किसका सहयोग कर रहे हैं। हमें मालूम होना चाहिय हमारे देश की ताकत क्या है और कमज़ोरी क्या है?

आजकल हमारे बीच सब कुछ एक फैशन है

समाज सेवा का फैशन आजकल प्रचलन में है। जितनी राहत की सामग्री नहीं बंटती उससे अधिक उसके पर्चे बंट जाते हैं। मदद करने वाले इस बात का भी ध्यान रखते हैं कि हर छोटी से छोटी वस्तु देते हुए उनकी तस्वीर खींची जाए। जब मेरा घर बन रहा था, तो वहां जो मज़दूर काम करने आते थे, वह अखबारों के पन्ने में रोटियाँ लपेट कर लाते थे। अखबार गरीबों के हिस्से की रोटियां बचा सकते हैं।

मीडिया कमज़ोरों की ताकत बन सकती है। क्योंकि जो हम देखते और सुनते हैं उसे केवल अपने तक नहीं रखते हैं। उसे दूसरों से साझा करते हैं। इसलिए यह ज़रूरी है कि जो हम देखें सुनें और फिर कहें वह सच और सही हो।

हमारी मीडिया ऐसी होनी चाहिए कि जब हमारी पुरानी पीढ़ी चाय की दुकानों पर बैठे तो केवल राजनैतिक गप्पें नहीं हांके। वह बात करें कि उनके घर की महिलायें कितनी शिक्षित हैं। उनकी पोतियां भी स्कूल जाती हैं और फिर वह उस चाय वाले से पूछें कि उसके दुकान पर काम करने वाला बच्चा स्कूल जाता है कि नहीं?

अखबार के पन्ने में एक बच्चा ख़ुद का हिस्सा भी हर सुबह तलाश सके। जब किसी के साथ कुछ गलत हो तो उसे लगे पूरा देश उसके साथ खड़ा है। जब एक समलैंगिक बच्चा टेलीविज़न पर समाचार देखे तो महसूस करे कि देश उसकी फिक्र करता है और जब सरकार को नींद आने लगे तो मीडिया अलार्म की तरह बजे उठे। 

 

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