“मोदी जी, काश आप देश के बेरोज़गार युवाओं के लिए कुछ कर पाते”
खुला है झूट का बाज़ार आओ सच बोलें
ना हो बला से खरीददार आओ सच बोलें,
सुकूत छाया है इंसानियत की कद्रों पर
यही है मौका-ए-इज़हार आओ सच बोलें।
हमारा वतन, हमारा देश इस समय किन हालातों से गुज़र रहा है, इसका अंदाज़ा शायद किसी आम इंसान के पास नहीं होगा। यहां गंदी राजनीति का खेल खेला जा रहा है। जिसके आप-हम सब ही शिकार हैं। आज़ादी कब मिली? किसको मिली?
हम तो आज भी उसी तरह से ज़िन्दगी गुज़ार रहे हैं, जैसे ब्रिटिश शासन में थे। न बोल सकते थे और न कोई क़दम उठा सकते थे। हमारे देश में लोगों ने इसको खेल बना लिया है। मुझे तो लगता है जैसे ‘लोकतंत्र’ कभी था ही नहीं। लोकतंत्र के जो अवशेष थे, अब तो उनकी भी हत्या की जा रही है।
बेरोज़गार युवा को खुद से पहले रिया और कंगना की फिक्र
लोग अपने देश की समस्याओं पर अब जवाब ही नहीं मांगते हैं! सरकार ने ऐसे हथकण्डे अपनाए हैं कि लोग “रिया और कंगना” में ही सिमटकर रह गए हैं। देश के मौजूदा हालात अब इस और इशारा कर रहे हैं कि हम अगर अभी भी नहीं सुधरे, तो अंजाम भुगतना होगा और इस सबमें पिसेगा कौन? आम आदमी।
बड़े-बड़े लोग तो भाग चुके हैं। यह बिल्कुल वैसे ही हालात हैं, जब हम एक उपनिवेश थे। जब अंग्रेज़ों को भारतीय स्वतंत्रता सेनानियों ने खदेड़ना शुरू किया। उनसे जितना हो सका भारत को लूट कर ले गए। आज स्थिति बिल्कुल वैसी ही है।
नीरव मोदी, माल्या ऐसे ही पूरे 51 लोगों ने 18000 करोड़ रुपयों का गबन कर, भारत को छोड़ना ही बेहतर समझा। अब यहां ईडी और सीबीआई सब कुछ करके भी उनका कुछ नहीं बिगाड़ पाई है। वैसे भी अब इन संस्थानों को रिया के खेल में लगा दिया गया है। यहां टॉम एंड जैरी का खेल खेला जा रहा है।
सब सोच रहे हैं देश की बाग़डोर एक सभ्य और निष्ठावान,समझदार इंसान के हाथों में हैं जबकि वास्तविकता कहती है देश जिनके हाथों में है, वह इन शब्दों के बिल्कुल उलट हैं। यहां नीरव और माल्या जैसे लोगों को स्पेशल फॉर्मूले के साथ भगाया जाता है और प्रशांत भूषण, सफूरा ज़रगर जैसे लोगों को सियासत के पैरों तले कुचले जाने की कोशिश की जाती है। यह वो भारत है जहां कुछ युवाओं को अपने अपने भविष्य से ज़्यादा कंगना और रिया का मामला सुलझाने में मज़ा आता है।
देश को खोखला करती हिन्दू-मुसलिम विचारधारा
बीते 6 सालों में ऐसी कौन सी नीति आई जो देश के भविष्य को आगे बढ़ा सकी हो। मार्च 2020 से पहले देश दंगों की आग में जल रहा था। जो लोग बेकसूर थे, आखिरकार गंदी राजनीति का शिकार हुए और दंगों का सारा ठीकरा उनके सर ही फोड़ दिया गया।
नईम जज़्बी ने लिखा है
कच्चे मकान जिनके जले थे फसाद में
अफसोस उनका नाम ही बलवाइयों में था।
ऐसा ही कुछ हाल हमारे देश का है। कश्मीर की अनुच्छेद 370, तीन तलाक़, नागरिकता संशोधन कानून, राम मंदिर आदि। इन विषयों के अलावा सरकार ने क्या किया? देश इस समय ऐसी परिस्थितियों से गुज़र रहा है, जिससे हमारी भावी पीढ़ीयां दर-दर की ठोकरें खाने को मज़बूर हो जाएंगी। इस समय देश पतन की तरफ बढ़ रहा है। वहीं दूसरी ओर भारत की बागडोर संभालने वाले लोगों की औसत दर्ज़े की सोच देश को निगलने के लिए आतुर है।

- नक्सलवाद
- गरीबी
- बेरोज़गारी
- भुखमरी
- साम्प्रदायिक हिंसा
- मॉब लीचिंग
- नशा
- बर्बाद होती आर्थिकी
उपरोक्त समस्याओं के लिए सरकार ने कौन से प्रभावी क़दम उठाएं हैं? शायद आपको और मुझे इस बात का उत्तर ढूंढ़ते-ढूंढते सदियां बीत जाएं। आज देश के बुद्धिजीवी वर्ग के लोगों में आक्रोश है विद्रोह है, मगर देश तो अनपढ़, अल्पबुद्धि लोगों से भरा पड़ा है, जिनमें बहुत सी खमियां हैं।
आप हिन्दू-मुसलमान कर के देश को क्या विकास की तरफ ले जाएंगे? क्या! इन बातों से देश, विकसित देशों की श्रेणी में आ जाएगा? नहीं ऐसा नहीं होगा बल्कि ऐसा करने से देश की नींव कमज़ोर और खोखली होती जाएगी।
ढोल पीटता मीडिया! राष्ट्रीय बेरोज़गार दिवस मनाते युवा

बेरोज़गार युवा इस समय अधिक परेशान हैं, जिनकी परेशानियों को नज़रअंदाज़ किया जा रहा है। सोशल मीडिया पर युवाओं ने अपने नाम के आगे “बेरोज़गार” शब्द तक जोड़ लिया है। सरकार सोई हुई है। यहां बस सरकार अपने हित के बारे में सोच रही है।
इस साल के आंकड़ों पर नज़र डालेंगे तो पाएंगे कि लगभग 50 लाख सैलरी पाने वाले लोगों ने जुलाई माह तक अपनी नौकरी गंवा दी। सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी (CMIE) की मौजूदा रिपोर्ट का निरीक्षण करेंगे तो पाएंगे 31 मई 2020 तक भारत की बेरोज़गारी दर 23.48% पर पहुंच गई है।
वहीं, ज़मीनी स्तर पर जो आंकड़े दर्ज किए गए हैं, वे इससे कहीं ज़्यादा हैं। मगर सरकार की प्राथमिक दुकान ‘मीडिया’ को इस समय सिर्फ लोगों की झूठी और अपरिष्कृत छवि दिखाने का कॉन्ट्रेक्ट मिला हुआ है। अभी दर्शकों को भी सब कुछ अच्छा लग रहा है। असलियत तो सिर्फ पीड़ित ही बता सकते हैं।
भारतीय युवा संगठन से पता लगा सकते हैं कि कितने लोगों के पास रोज़गार है और कितने लोगों के पास नहीं। इस समय देश का युवा अत्यंत कुंठित है साथ ही मानसिक तनाव से भी ग्रसित है। मेहनत कर पढ़ाई पूरी करो, फिर उसके बाद जॉब ही ना मिले तो ऐसे में युवा समाज अंदर से टूटना लाज़िम है।
देश के सभी युवाओं को एकजुट होने की आवश्यकता है। केवल बेरोज़गार ही नहीं, बल्कि जिन युवाओं के पास रोज़गार है, वे भी आंदोलनों का हिस्सा बनें। वो दिन दूर नहीं जब ऐसी स्थितियां कायम हो जाएंगी की हम भूखे मर जाएंगे। यह किसी लेख का संवाद भर नहीं बल्कि देश की ज़मीनी हक़ीक़त है।
देश पतन की ओर आगे बढ़ रहा है। आज हमको रिया, सुशांत, कंगना, यह सब नहीं चाहिए! हमको रोज़गार चाहिए। हमको रोटी चाहिए। 22 जनवरी 1905 को रूस में ज़ार सेना ने कई बेरोज़गार और बंधुआ मज़दूरों को गोलियों से भून दिया था। उस दिन रविवार था।
कई बार ऐसा लगता है कहीं हम भी रोटी मांगने के एवज में कत्ल ना कर दिए जाएं। इतिहास में इस दिन को ‘खूनी रविवार’ के नाम से जाना जाता है। उनका कसूर बस इतना सा था कि उन्होंने जार से रोटी मांगने की हिमाकत की थी। मौजूदा हालात को देखते हुए ऐसा लगता है कि कहीं भारत में भी कोई रविवार ‘खूनी रविवार’ ना बन जाए।

0 comments