टूटती शादी- बच्चों की बर्बादी
कुदरत ने इंसानों के लिए इतनी खूबसूरत दुनिया बनाई, तरह तरह के फूल खिलाए, रंग बिरंगे दरख्त बनाए, नदी, जंगल, पहाड़, समंदर , चाँद सितारे, खूबसूरती से लबरेज़ कर दिए, इस खूबसूरती से सिर्फ और सिर्फ एक इशारा है कि खूबसूरती है तो खुशियाँ हैं। इंसान को यह अकल दी कि बालिग होने पर वह शादी करे और छोटे ___ छोटे बच्चों की किलकारियों से खुशी को दोगुना करे, इंसान को सलीका और हिदायत दी कि अपने बच्चों की परवरिश को इस तरह से करे, कि यह बच्चे समाज रूपी बगीचे के सुंदर फूल बन कर अपनी खुशबू से दूसरों को सुगंधित कर सकें। नई नसलों की शानदार परवरिश के लिए शादी का एक - मजबूत मेकेनिज्म बनाया जिसमें मर्द और औरत दोनो की जिम्मेदारी तय कर दी।
आसानी से इस टूटती शादीजिम्मेदारी से कोई निकल ना भागे, इस नुक्ते ए नजर से खुदा ने तलाक को अपने नज़दीक सब इतनी से ज्यादा ना पसन्दीदा चीज , बताया। क्योंकि जिसने इतनी खूबसूरत दुनिया की रचना की है वह यह भी जानता है कि जब बाग के माली ही गैर-जिम्मेदार अकल ___ हो जाएंगे तो बगीचे के फूलों की निराई, गुड़ाई, सिंचाई कुछ भी दोगुना ढंग से नही होगा, और नई नस्ल का बगीचा बेहतर परवरिश ना यह मिलने की वजह से झाड़दार जंगल की शक्ल इख्तियार कर लेगा। परिवार को इतनी - मजबूती से बांधे रखने वाले शादी के बंधन में भी जब दरार पड़ना शुरू होती है, तो वह दरार बढ़ती ही जाती है।
इंसानी इल्म बद-अकली का शिकार हो जाता है। मर्द और औरत दोनों को दूसरे में कमी नजर आती है, और अपनी कमियों की तरफ निगाह नही जाती। गुस्सा, अना (ईगो), दूसरे को तबाह करने की जिद, बदले की भावना, इतनी ज्यादा दिल ओ दिमाग पर छा जाती हैं कि उस की गर्द में बच्चों का बिगड़ता भविष्य भी दिखाई नहीं देता। इस मामले में जानवर अपने आप को इंसान से बेहतर साबित करते हैं।
वह किन्ही भी हालात में बच्चों की भूख, सुरक्षा, और परवरिश से समझौता नही करते, लेकिन इंसान छोटी छोटी बातों में शादी के बंधन को तोड़ने के लिए इतना उतावला हो जाता है कि उसे अपने बच्चों के बिगड़ते नसीब पर यह जान कर भी अफसोस नहीं होता कि तलाक के बाद बच्चे को माँ-बाप का प्यार नसीब नहीं होगा। आर्थिक कठिनाइयों के चलते बच्चे की शिक्षा पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।
स्वतन्त्र भारत में सबसे ज्यादा शादी के मामले शादी से संबंधित कानूनों की वजह से बिगड़े। पति-पत्नी के मामूली मन-मुटाव को कानून के ठेकेदारों ने खूब भुनाया, खूब कैश किया। झूठी एफआईआर दर्ज करके पति और उस के घर वालों को दहेज प्रताड़ना (498-A) के केस में जेल भिजवा दिया, घरेलू हिंसा सेक्शन 21 का मुकदमा डाल दिया, झूठे मामलो में फंस कर जब पति लद्दू की तरह कोर्ट और थानों की परिक्रमा करने लगता है तब पत्नी के सामने एक यक्ष प्रश्न मुह फैला कर खड़ा हो जाता है, कि अकेले बच्चे कैसे पाले।
इस आधुनिक विचारों वाली दुनिया में हम कह सकते हैं कि आज मर्द और औरत दोनों बराबर हैं। इसलिए औरत अकेले बच्चे पालने में सक्षम है। लेकिन यहां सवाल बराबरी का नहीं पूरक होने का है। इसलिए परिवार में यदि इस प्रकार की कोई स्थित उतपन्न होती है, तो घर वालो को पति -पत्नी को समझाना चाहिए, और अगर फिर भी बात नहीं बनती है, तो जिस कानून के तहत काजी से निकाह पढ़वाया था उसी कानून की मदद लेनी चाहिए नाकि कोर्ट कचहरी के चक्कर में खुद फंस कर बच्चों का भविष्य दांव पर लगा दिया जाए।
याद रखें कोर्ट में जाने से कम्प्रोमाइज हो सकता है, फैसला नही होता। फैसला हमेशा दिलों से ही होता है। इसलिए बच्चों के हक में फैसला करें, ताकि कुदरत की इस खूबसूरती की नदी हमेशा यूँही बहती रहे । और गुजरने वाली नस्ल प्यार, सुकून के किस्से यूँही कहती रहे।

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