मुख्य धारा मीडिया से मायूस किसानों ने निकाल दिया अपना अखबार, देखें ट्राली टाइम्स!

Pankaj Chaturvedi-

सरदार का दिमाग अभी सरकार के बस का नहीं। धरने पर बैठे किसान अब अब अपना अखबार निकाल रहै हैं-ट्रॉली टाइम्स। दिल्ली के टीकरी और सिंघू बॉर्डरों पर जमे आंदोलनकारियों में से कुछ ने वहाँ खड़ी एक ट्रॉली में बैठ कर इसकी योजना बनाई। इसके संपादक और प्रकाशक हैं 46 वर्षीय सुमीत मावी, जो फिल्मों के पटकथा लेखक हैं और 27 वर्षीय गुरदीप सिंह धालीवाल, जो डॉक्यूमेंटरी फिल्म फोटोग्राफर हैं। चार पृष्ठों के इस बुलेटिन में तीन पृष्ठ पंजाबी केे हैं और एक पृष्ठ हिंदी का।

चूंकि सिंघु और टिकरी बोर्डेर पर सारा दिन भाषण, गतिविधि, घोषणा आगमन होते हैं और सभी के लिए इस कई किलोमीटर में फैले आयोजनों की जानकारी रखना सम्भव नहीं। इसी लिये यह अखबार अब सारी सूचना एक साथ सभी तक ले जा रहा है। ट्रॉली टाइम्स में गतिविधियों की जानकारी दी जाती है और किसान नेताओं के वक्तव्य प्रकाशित किये जाते हैं। साथ ही फोटो, कार्टून, कविताएँ और खबरें भी। शुरू में खर्च संपादकों ने अपनी जेब से किया, पर अब उन्हें दूसरों से आर्थिक सहयोग मिल रहा है।

‘ट्रॉली टाइम्स’ के प्रवेशांक में पहले पृष्ठ पर छपा मुख्य शीर्षक है : जुड़ेंगे, लड़ेंगे, जीतेंगे। इस अखबार को kisanekta.in वेब् साईट पर पढ़ सकते हैं . सम्पर्क करने के लिए TimesTrolley@gmail.com पर सम्पर्क कर सकते हैं

सबसे बड़ी बात आप में से बहुत से लोग प्रदर्शन स्थल पर जा रहे हैं, अपने तरीके के वीडियो , फोटो ला रहे हैं लेकिन वे फेसबुक पर ही रह जाते हैं। आप सभी इस वेबसाईट पर अपने लेख, फोटो, वीडियो अपलोड कर सकते हैं — इस वेबसाईट को समृद्ध बनायें, निजी प्रचार से बचें, किसान की सोचें।

जब मीडिया सरकार चुन ले तो जनता को अख़बार चलाना पड़ता है.. किसान आंदोलन के बीच एक अख़बार निकलने लगा है। इस अख़बार का नाम है ट्राली टाइम्स। पंजाबी और हिन्दी में है। जिन किसानों को लगा था कि अख़बारों और चैनलों में काम करने वाले पत्रकार उनके गाँव घरों के हैं, उन्हें अहसास हो गया कि यह धोखा था। गाँव घर से आए पत्रकार अब सरकार के हो चुके हैं। किसान आंदोलन के बीच से अख़बार का निकलना भारतीय मीडिया के इतिहास का सबसे शर्मनाक दिन है।

जिस मीडिया इतिहास अंग्रेज़ी हुकूमत के ख़िलाफ़ अख़बार निकाल कर संपादकों के जेल जाने का रहा हो उस मीडिया के सामने अगर किसानों को अख़बार निकालना पड़े तो यह शर्मसार करने वाली बात है। भारत का मीडिया नरेंद्र मोदी की चुनावी सफलताओं की आड़ लेकर झूठ बेचने का धंधा कर रहा है। वह सिर्फ़ किसान विरोधी नहीं है बल्कि हर उसके ख़िलाफ़ है जो जनता बन कर सरकार के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाते हैं।

ट्राली टाइम्स का आना एक तरह से सुखद है। जनता के उस विश्वास के बने रहने का सूचक है कि अख़बार भले बिक गए हों, अख़बारों का महत्व है। सूचनाओं की पवित्रता ज़रूरी है।

पत्रकारिता में जनता का विश्वास एक दिन नए अख़बारों और चैनलों को जन्म देगा। मौजूदा अख़बारों और चैनलों से लड़े बग़ैर भारत में लोकतंत्र की कोई लड़ाई जीती नहीं जा सकती। इसमें कोई शक नहीं कि गोदी मीडिया लोकतंत्र का हत्यारा है। दुख की बात है कि जनता का हत्यारा जनता के पैसे ही चलता है।

जनता को अगर अपने इस सुंदर लोकतंत्र को बचाना है तो उसे गोदी मीडिया नाम के हत्यारे से लड़ना ही होगा। यह उसके स्वाभिमान का सवाल है। सही सूचना जनता का स्वाभिमान है। भारत का गोदी मीडिया आपके जनता होने का अपमान है। आख़िर आपने इस दलाल मीडिया को अपने जीवन का क़ीमती वक्त और मेहनत का पैसा दिया ही क्यों? ये सवाल आपसे भी है। आज न कल आपको अपने घरों से इन अख़बारों और चैनलों को बाहर निकाल फेंकना ही होगा।

 

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