अंतर्राष्ट्रीय नेल्सन मंडेला दिवस आज : नोबेल शांति पुरस्कार पाने के पंद्रह वर्ष बाद 2008 तक अमेरिका में नेल्सन मंडेला के प्रवेश पर प्रतिबंध लगा रहा

1993 में नोबेल शांति पुरस्कार संयुक्त रूप से डी क्लार्क और नेल्सन मंडेला को दिया गया

लेख : रैहान शाहिद

''आखिरकार हम समान राजनीतिक अधिकार चाहते हैं क्योंकि उसके बगैर हम हमेशा पिछड़े रह जायेंगे। मैं जानता हूं कि इस देश के श्वेतों को यह क्रांतिकारी जैसा लग रहा होगा क्योंकि अधिकतर मतदाता अफ्रीकी होंगे। इस बात को लेकर श्वेत लोग लोकतंत्र से डरते हैं।’’

क्रांतिकारी गतिविधियों के कारण जब नेल्सन मंडेला को 1963 में गिरफ्तार किया गया था तब उन्होंने अफ्रीकी सरकार के खिलाफ यह बयान दिया था। उनका एकमात्र ये बयान पश्चिमी देशों के उस लोकतंत्रवादी चेहरे को बेनकाब करने के लिए पर्याप्त है। हमें ध्यान देना होगा ऐसी स्थिति बीसवीं सदी के आधा गुजर जाने के बाद थी। जब दुनिया में मानवता को बचाने के लिए संयुक्त राष्ट्र संघ भी अस्तित्व में था, उदारवाद और लोकतंत्र को लेकर पश्चिम से एक से एक विचार पेश हो रहे थे, अमेरिका वैश्विक लोकतंत्र की ठीकेदारी ले चुका था तब अफ्रीकी महाद्वीप के दक्षिण में गोरों की एक ऐसी कुंठित सरकार थी जो अल्पसंख्यक होते हुए भी सत्ता पर कुंडली जमाये बैठी थी कि यदि लोकतंत्र लागू हुआ तो उनकी सत्ता छिन जाएगी।

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उस कालखंड में वैश्विक परिदृश्य पर नजर डालने पर पश्चिमी राष्ट्रों की दोहरी नीति साफ स्पष्ट होती है। यह वही समय था जब यहूदियों पर अतीत में हुए अत्याचार की क्षतिपूर्ती के लिए उनको उनका 'शास्त्रीय राष्ट्र' सुपुर्द कर दिया गया। मानवतावाद और लोकतांत्रिक मूल्यों को तथाकथित रूप से स्थापित करने के लिए कश्मीर में जनमत संग्रह का फरमान संयुक्त राष्ट्र संघ के द्वारा सुना दिया जाता है। उसी तथाकथित लोकतंत्र की स्थापना के लिए अमेरिका कई देशों में सेना उतार देता है लेकिन दक्षिण अफ्रीका में जहां की जनता वास्तविक रूप से लोकतंत्र की बहाली की मांग कर रही थी तो उसके नेताओं को गिरफ्तार किया जा रहा था। 

महात्मा गांधी ने अपने दक्षिण अफ्रीका प्रवास के दौरान गोरों के क्रूर रंग भेद के खिलाफ जो संघर्ष  का लौ जलाया था वह गाँधीजी के अफ्रीका छोड़ने साथ ही बुझ गया। महात्मा गांधी ने दक्षिण अफ्रीका को छोड़कर अपनी जन्मभूमि को अपनी कर्मभूमि बनायी और लंबे संघर्ष के पश्चात भारत को स्वाधीनता दिलाने में ऐतिहासिक सफलता अर्जित की परंतु महात्मा गांधी के दक्षिण अफ्रीका छोड़ने के तीस वर्ष बाद भी वहां रंगभेद की स्थिति जस की तस थी।

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द्वितीय विश्वयुद्ध के पश्चात दुनिया के मानचित्र में अनेक नए देश अपनी स्वतंत्रता और संप्रभुता की घोषणा कर रहे थे, विश्वभर में लैंगिक समानता, धार्मिक समानता, आर्थिक समानता और नस्लीय समानता पर नए-नए सिद्धान्त पेश हो रहे थे परंतु उस समय भी दक्षिण अफ्रीका की अश्वेत जनता श्वेत शासक के चंगुल में कराह रही थी।

मंडेला ने वर्ष 1952 में अनुचित कानूनों के खिलाफ व्यापक नागरिक अवज्ञा अभियान डिफियांस कैम्पेन शुरू किया। उन्हें इस अभियान का प्रमुख स्वयंसेवक चुना गया। सन् 1960 में एएनसी पर प्रतिबंध के बाद मंडेला ने उसकी सशस्त्र शाखा बनाने की वकालत की। जून 1961 में एएनसी इस बात पर सहमत हुई कि जो लोग मंडेला के अभियान से जुड़ना चाहते हैं, पार्टी उन्हें ऐसा करने से नहीं रोकेगी। उसके बाद 'उमखांतो वी सिजवे' की स्थापना हुई और मंडेला उसके कमांडर इन चीफ बने।

मंडेला को 1962 में गिरफ्तार किया गया। सन् 1963 में एएनसी और उमखांतो वी सिजवे के मंडेला समेत इन सभी पर हिंसा के माध्यम से सरकार को उखाड़ फेंकने की साजिश का मुकदमा चला। 12 जून, 1964 को मंडेला समेत आठ आरोपियों को आजीवन कारावास की सजा सुनायी गयी और फिर शुरू हुआ यातना और प्रतिरोध की वो महान यात्रा। सज़ायाफ्ता मंडेला और उनके साथियों को पहले रोब्बेन द्वीप और बाद में विक्टर वर्स्टर जेल ले में रखा गया। हिंसक गतिविधियों के कारण गिरफ्तार हुए मंडेला ने जेल में जब अहिंसक प्रतिरोध को हथियार बनाया तो पूरी दुनियां की सहानुभूति जीतने में कामयाब रहे। मंडेला के महात्मा गांधी से प्रेरित संघर्ष के इस तरीके ने उन्हें संसार में प्रसिद्ध कर दिया। सत्तर और अस्सी के दशक में दुनियाभर के विश्वविद्यालयों के छात्रावास और छात्र आन्दोलनों में नेल्सन मंडेला की तस्वीरें बहुलता से पाए जाने लगे थे।

आखिरकार मंडेला के अहिंसक संघर्ष के सामने अफ्रीकी सरकार को भी झुकना पड़ा। 1990 में 27 साल के सश्रम के कारावास के बाद नेल्सन मंडेला को जेल से रिहा कर दिया गया। सरकार देश में लोकतंत्र बहाल करने पर सहमत हो गयी। 1993 में समान वयस्क मताधिकार के आधार पर मतदान हुआ और नेलसन मंडेला की पार्टी को भारी बहुमत मिला। महात्मा गांधी के विपरीत मंडेला ने प्रत्यक्ष रूप से सरकार के नेतृत्व का निर्णय लिया और दक्षिण अफ्रीका के इतिहास के पहले अश्वेत राष्ट्रपति बने।

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सत्ता हस्तांतरण के बारे में ये आशंका जतायी जा रही थी कि दक्षिण अफ्रीका में अश्वेतों के हाथ में सत्ता जाएगी तो गृहयुद्ध छिड़ जाएगा और भयानक हिंसा होगी परंतु नेल्सन मंडेला के सूझबूझ और तत्कालीन राष्ट्रपति डी क्लार्क के साथ उनके अनुपम समन्वय ने राष्ट्र को अकल्पनीय हिंसा से बचा लिया। इसी कारण 1993 में नोबेल शांति पुरस्कार संयुक्त रूप से डी क्लार्क और नेल्सन मंडेला को दिया गया। नोबेल पुरस्कार पाने से तीन वर्ष पहले ही भारत सरकार के द्वारा नेल्सन मंडेला को भारत के सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार "भारत रत्न" से सम्मानित किया जा चुका था किंतु आश्चर्य की बात यह है कि विश्व में मनावतवाद और लोकतांत्रिक अधिकारों के सबसे बड़े रक्षक होने का दावा करने वाले अमेरिका के लिए नेल्सन मंडेला एक आतंकवादी थे एवं उनका नाम अमेरिकी सरकार के अधिकारिक आतंकवादियों की सूची में था। नोबेल शांति पुरस्कार पाने के पंद्रह वर्ष बाद 2008 तक अमेरिका में नेल्सन मंडेला के प्रवेश पर  प्रतिबंध लगा हुआ था।

 नेल्सन मंडेला का जीवन संघर्ष दुनिया के समाज के सभी वर्गों, दलितों और शोषितों को प्रेरणा तो देता ही है साथ ही पश्चिम के उस छद्म मानवतावाद को भी उजागर करता है जिसे आज हम मानवता और लोकतांत्रिक मूल्यों का सर्वमान्य मानक मान चुके हैं।

नोट : लेखक स्वतंत्र पत्रकार और कानून विशेषज्ञ हैं 

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