“बिहार की राजनीति में मुस्लिम प्रतिनिधित्व के नाम पर बस अगड़ी जाति के मुस्लिम क्यों?”

By pratyush prashant

 

भारत जैसे धर्मनिरपेक्ष देश में आज भी अल्पसंख्यक “वोट बैंक” से ज़्यादा कुछ नहीं हैं। इनके विकास की बात तो कोसों दूर है, इन्हें अपना हक भी मुहैया नहीं हो पा रहा है।

पिछले दशकों में पिछड़े और वंचित समूहों की राजनीतिक चेतना जागी और राजनीति के शीर्ष पर बिहार में भी पिछड़ी जाति के तथाकथित मसीहाओं ने शासन की बागडोर संभाली हुई है, मगर वंचितों के लिए इनके सामाजिक न्याय का फायदा पसंमादा मुसलमानों को अभी तक नहीं हो सका है।

अगड़ी मुस्लिम जाति ने कभी पिछड़े मुस्लिम समाज को आगे बढ़ने ही नहीं दिया

वर्ण व्यवस्था के तहत हिंदुओं में जितनी मात्रा में दलित और शोषित वर्ग का प्रतिशत है, ठीक वही अनुपात मुसलमानों में पिछड़ी जातियों का भी है। मुस्लिम अगड़ी जाति वालों की पकड़ बिहार के सियासत पर इतनी मजबूत रही है कि आज जब वंचित का शासन है, फिर भी इन्हें अपने हक के लिए काफी मशक्कत करनी पड़ रही है।

हिंदु-मुसलमान भेदभाव को बढ़ावा देकर सामंती दृष्टि सम्पन्न अगड़ी मुस्लिम जाति के चंद आकाओं ने इन्हें इनके अधिकार से दूर रखा। यह सिलसिला आज़ादी के लड़ाई से अब तक चलता चला आ रहा है।

Muslim Community Palghar Incidentप्रतीकात्मक तस्वीर। फोटो साभार- Flickr

भारत के स्वतंत्रता संग्राम में मुस्लिम पिछड़ों ने मुस्लिम लीग का मुखर विरोध किया और एक धर्मनिरपेक्ष शक्ति बनकर कांग्रेस को सहयोग दिया। अब्दुल कयूम अंसारी जैसे व्यापक जनाधार वाले नेता की पार्टी “आल इंडिया मोमिन कांफ्रेंस” ने 1937 के आम चुनाव में मुस्लिम लीग का विरोध किया। जिसके कारण मुस्लिम लीग को एक भी सीट इस चुनाव में बिहार में नहीं मिली।

1946 के आम चुनाम में मोमिन कांफ्रेस ने “इंडिपेन्डेन्ट पार्टी” को अपना खुला सहयोग दिया और बिहार में मुस्लिम लीग की शक्ति को सीमित कर दिया। ऐसे धर्मनिरपेक्ष, जनतांत्रिक और स्वतंत्रता संग्राम से उभरे अब्दुल कयूम अंसारी की बारी 1972  में बिहार के मुख्यमंत्री बनने की आई तब सिर्फ बैकवर्ड होने के कारण इस पद से उन्हें वंचित रखा गया।

मुसलमानों के राजनीतिक, धार्मिक नेता मौलाना आज़ाद, संविधान सभा के प्रमुख सदस्य थे। ‘इस्लाम में छूआछूत नहीं है’, इस नाम पर भारतीय संविधान में मुसलमानों के लिए अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति का कोई प्रावधान नहीं रखा गया। मौलाना आज़ाद स्वयं अभिजात्य वर्ग से आते थे।

बिहार पिछड़ा वर्ग आयोग की भूमिका भी संदेह के घेरे में हैं

आरक्षण बॉक्स में 14 प्रतिशत अनुसूचित जाति, 10 प्रतिशत अनुसूचित जनजाति, 14 प्रतिशत अत्यन्त पिछड़ी जाति और 10 प्रतिशत पिछड़ी जाति के लिए स्थान है। मुस्लिमों के साथ त्रासदी है कि इन्हें अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति की सुविधा प्राप्त नहीं है।

मात्र अत्यंत पिछड़ी जाति और पिछड़ी जाति से ही संतोष करना पड़ता है। मसलन, हिंदू धोबी को अनुसूचित जाति के अन्तर्गत रखा गया है जबकि मुसलमान धोबी इससे वंचित हैं और वह अत्यंत पिछड़ा वर्ग में है। इस संदर्भ में बिहार पिछड़ा वर्ग आयोग की भूमिका भी संदिग्ध रही है।

बिहार के सियासत में अगड़े मुसलमानों के वर्चस्व की एक लंबी परंपरा रही है। जब देश का विभाजन हुआ तो अगड़े मुसलमानों का एक हिस्सा पाकिस्तान चला गया। जो नहीं जा सके, उनमें से अधिकांश लोग रातों-रात गाँधी टोपी धारण कर कांग्रेसी बन गए। जिसको मौलाना आज़ाद ने ह्रदय परिवर्तन की संज्ञा दी।

दंगा रहित समाज के नाम पर पिछड़े मुसलमानों को सर कट जाने का भय दिखाकर और मुस्लिम एकता के नाम पर तब से आज तक अगड़े मुस्लिम पिछड़े मुसलमानों का शोषण करते चले आ रहे हैं।

प्रतीकात्मक तस्वीर

जिसमें शासक पार्टी की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। इन्हीं शासक पार्टियों ने मुसलमानों को वोट बैंक के रूप में इस्तेमाल कर अमानवीय प्रथा को जन्म दिया। बिहार की मुस्लिम समुदाय की राजनीति भी इससे अलग नहीं है।

बिहार में सामाजिक न्याय के मसीहा कहे जाने वाले लालू प्रसाद यादव और राबड़ी देवी ने भी समरसतावाद के उसूल को त्यागकर उन्हीं मुस्लिम नेताओं को तरजीह दी जो अगड़े थे। बिहार में मुस्लिम समुदाय में मंडल का सामाजिक न्याय जिस समुदाय तक पहुंचना था, वहां वह पहुंचा ही नहीं।

बिहार विधानसभा के चुनावों में अब तक जीतने वाले मुस्लिम विधायकों में पिछड़े और दलित बिरादरी के कुल मिलाकर सैकड़ा तक भी नहीं पहुंच सके हैं। मुसलमानों में शेख, सैय्यद और पठान जाति के लोग ही सत्ता सुख के अधिक करीब रहे।

बिहार की राजनीति में अगड़े मुस्लिमों का दखल

1952 से लेकर राबड़ी देवी के शासनकाल तक कुल 106 मुस्लिम मंत्री हुए हैं जिनमें अगड़े मुस्लिमों की कुल संख्या 78 और पिछड़ों की संख्या मात्र 28।

पिछड़े वर्ग के सबसे बड़े हिमायती लालू यादव के दो बार के शासनकाल में दस मुस्लिमों को मंत्री बनने का मौका मिला, जिसमें आठ अगड़े एंव दो पिछड़े थे। लालू के ही छाया में गठित राबड़ी देवी के मंत्रीमंडल में पाँच अगड़े मुस्लिम मंत्री थे और पिछड़े में से दो को राज्यमंत्री का दर्ज़ा मिला।

नीतीश कुमार ने 2005 से मौजूदा सरकार तक मुस्लिम समुदाय से छह लोगों को मंत्रीपरिषद में शामिल किया जिसमें केवल एक पसंमादा समाज से थे और तीन पसंमादा समाज के चेहरे को राज्यसभा के लिए भेजा।

साथ ही साथ बिहार में पहली बार किसी मुस्लिम महिला परवीन अमानुल्लाह को मंत्री बनने का मौका मिला जो अगड़ी मुस्लिम समाज से रही है। ज़ाहिर है बिहार के राजनीति में पसंमादा मुसलमानों का नेतृत्व भी अगड़ी समुदाय के मुसलमानों के हिस्से ही रहे हैं।

प्रतीकत्मक तस्वीर

तमाम पिछड़ी जातियां बुनकर से लेकर धुनकर, सब्ज़ी फरोश, दर्जी, धोबी, हजाम, चिक, कसाई, चुड़िहार, रंगरेज, डफाली, नालबंद सभी पेशावर बिरादरियों की स्थिति बिहार में बेहतर, तो नहीं ही कही जा सकती है। हथकरघा उद्योग दम तोड़ चुकी है, सारी योजनाएं कागजों पर हरी हो रही हैं। औरतों और महिलाओं से सबंधित बीड़ी उद्योग अपनी ही आग में जल रहा है।

बिहार में मुसलमानों के परंपरागत नेतृत्व ने कभी भी आम मुसलमानों के तकलीफ पहुंचने, उनके दुख-दर्द को समझने तथा उनकी ज़िंदगी के बुनयादी ज़रूरत को पूरा करने की कोशिश नहीं की।

नतीजा यह है कि इस समुदाय के पास आज बेरोज़गारी, आर्थिक तंगी और अशिक्षा के साथ कई समस्याओं का पहाड़ है। इस समाज में जो भी हल्ला-फुल्का बदवाल दिख रहा है, वह इस समाज के उदारवादी लोगों की कोशिशों का असर है। जिन्होंने गुरबत से निकलने के लिए शिक्षा को ज़रूरी समझा।

हिंदू समाज के ही तरह मुस्लिम समाज में भी ऊंच-नीच का भेद, आर्थिक स्तर पर होने के साथ-साथ अनुवांशिक भी है। इस्लाम से लेकर मार्क्सवाद तक सबने इस भेद को मिटाने के लिए रास्ता दिखाया। भारतीय संविधान भी किसी तरह के भेदभाव की खुदमुख्तारी नहीं करता है लेकिन यह भेद हिंदू समाज की तरह मुस्लिम समाज में भी मौजूद है।

दो महीने बाद होने वाले चुनाव में असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी AIMIM ने भी बिहार की 50 सीटों पर चुनाव लड़ने का ऐलान किया है। वह विपक्षी दलों के साथ मिलकर गठबंधन करने को भी तैयार हैं।

प्रतीकात्मक तस्वीर

चुनाव के ठीक पहले चुनावी दंगल में जनता के बीच में काम किए बिना सिर्फ मुस्लिम पहचान के आधार पर कितना सफल हो सकेगा, यह कहना मुश्किल है लेकिन बिहार की जनता के बीच में उनकी पहुंच अन्य दलों से कम ही है।

बिहार के पसंमादा मुसलमानों को अपना उम्मीदवार अपने बीच से ही खड़ा करना होगा जो ज़मीनी स्तर पर उनके साथ जुड़ा हो और उनके शोषण और उत्पीड़न में उनके साथ का हमनवा हो। तभी बिहार के मुस्लिम राजनीति में कोई नया ऊबाल देखने को मिलेगा।

अपने हक और अधिकारों के लिए उनका संगठित होना ही उनको बिहार की राजनीति में उचित सम्मान दे सकेगी, जब तक वह इस बात को समझेंगे नहीं, गैर-मुस्लिम दल के परंपरागत नेतृत्व काठ के घोड़े के तरह बस हवाई उड़ान ही भरेंगे। आज़ादी के बाद से अब तक की राजनीति से उनको यह समझना होगा।

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