तांडव देख ली मगर अभी तक ये समझ नहीं आया कि हिंदू भावनायें आहत किस सीन से हुईं हैं?

कनुप्रिया

तांडव आधी देख ली मगर अभी तक यह समझ नहीं आया कि हिन्दू भावनाएँ आहत किस दृश्य से हुईं.

अगर इन 7 सालों में हिन्दू भावनाए इतनी कमज़ोर हो गई हैं कि फिल्म और वेब सीरीज़ के दृश्यों तक से आहत हो जाती हैं तो हिन्दू भावनाओं को बेहतर स्वास्थ्य के लिए बेहतर वातावरण की ज़रूरत है, वो ऐसे न्यूज़ चैनल न देखें ऐसे व्हाट्सएप न पढ़ें जो उन्हें और बीमार करती हैं , दो गज़ दूरी, मास्क है ज़रूरी का पालन करें। ऐसी कमज़ोर भावनाओं को सच में इम्युनिटी बूस्टर की ज़रूरत है.

हैरानी ये भी है कि जो हिन्दू भावनाएँ मंदिर में पुजारी द्वारा बलात्कार और नृशंस हत्या से आहत नहीं हुईं, वो एक वैब सीरीज़ के एक छोटे दृश्य से इसलिए आहत हो गईं कि सीरीज़ एक मुसलमान ने बनाई है. फिर वही भावनाएं अर्णब के पुलवामा को अपनी जीत बताने पर आहत नहीं हुईं जबकि मामला सीधे सीधे आतंक का था। मगर सुशांत सिंह राजपूत मामले में अभिनेत्रियों के व्हाट्सअप चैट पर जो भावनाएँ उबाल पर थीं वो देश की सुरक्षा जैसे अति गंभीर मामले में भी अब तक आहत नहीं हुई. कमाल ये भी है कि बालाकोट स्ट्राइक जैसी देश की सेना से संबंधित अति गोपनीय जानकारी के एक मीडियाकर्मी द्वारा जानने और लीक किये जाने पर जो NIA एजेंसीज़ अब तक सक्रिय नहीं हुईं है वो किसान आंदोलन में किसानो से बिना किसी सुबूत के पूछताछ के लिए सक्रिय हैं. उनकी देश की सुरक्षा चिंता देखने लायक है.

बहरहाल ज़ाहिर है ऐसी भावनाओं का न धर्म से लेना देना है न देश से, घृणा से भरे इन लोगों की भावना का महज उसकी सत्ता से लेना देना है, कि वो बिना किसी तर्क और कारण के येन केन प्रकारेण बनी रहनी चाहिए।

भावनाओं के आहत होने का खेल भी बहुत दिलचस्प और एकतरफ़ा है.

सीरीज़ के एक सीन में सैफ़ का किरदार सुनील ग्रोवर के किरदार से पूछता है तुमने इतने बर्बर काम किये हैं तुम्हे कैसे आराम मिलता है, तो सुनील ग्रोवर का किरदार कहता है एक बिल्ली पाल रखी है उसे खिलाता पिलाता हूँ वो सीने पर सो जाती है तो भीतर सब शांत हो जाता है.

शायद मोर को दाना खिलाने से भी ऐसा होता हो. हे भावनाओं फिर से आहत न हो जाना।

तांडव सिरीज़ देख रही थी। बेहद ढीली स्क्रिप्ट के दरमियान अगर कुछ और नज़र आया तो वह केवल सेक्सिज़्म और सेक्सिज़्म था। औरतों को कुछ और नहीं आता है, आता है तो केवल अपने शरीर का इस्तेमाल करके ऊपर चढ़ना। सना को अपने प्रफ़ेसर के साथ सेक्स करना है क्योंकि उसे पैसे चाहिए। अनुराधा की पार्टी में उपस्थिति उसके काम का सिला नहीं है, उसके प्रधानमंत्री देवकी नंदन से सम्बन्धों की वजह से है। एक क़ाबिल नेता डिफ़ेन्स का पोर्टफ़ोलियो चाहती है क्योंकि वह पूर्व प्रधानमंत्री के बेटे के क़रीब है। आयशा भले ही समर के साथ हो पर आख़िर में समर उससे खाना लगाने को ही कहता है। मैं देखकर हतप्रभ हो रही हूँ कि किसी नयी उम्र के लेखक ने यह लिखा है। मुझे इस लेखक की सबसे चर्चित कहानी याद आती है जिसे पढ़ते हुए घिन भर आया था मन में, जहां नायिका रानी औरत कम ऑब्जेक्टिफ़िकेशन की मूर्ति अधिक नज़र आती है।

मेल गेज़, फ़ेमिनिज़्म… एक ज़ोर का ठहाका लगाने का मन करता है। उम्र की लगभग तमाम लेखिकाएँ रचना ही नहीं, ज़िंदगी में भी स्त्री-विमर्श इम्पलिमेंट करने की कोशिश करती हैं (जितनी हो सके)।
और उम्र के लेखक (सब तो नहीं फिर भी बहुत सारे) घटिया मज़ाक़ करते हैं ।औरतों, सरे-आम बीवी वाले, गर्लफ़्रेंड वाले सेक्सिस्ट जोक मारते हैं, ऐसे पोस्ट लिखते हैं कि आप चिढ़कर अनफ़ॉलो कर दें। उन्हें फ़ेमिनिस्ट दीदियों से चिढ़ मचती है। अपने दोस्तों के साथ मिलकर स्त्री-विमर्श का मज़ाक़ उड़ाते हैं।

यही लोग फिर फ़ेमिनिज़्म की बहस में ऐसे उतर आते हैं जैसे स्त्री-विमर्श स्त्रियों से अधिक इनसे मुख़ातिब हो। मेन्सप्लेनिंग एक बीमारी है, ख़तरनाक बीमारी, जिससे कम से कम उन पुरुषों को बचना ही चाहिए जो रचनात्मक होने की बात करते हैं। तांडव के लेखक/निर्देशक तो ज़रूर ही बचें, आगे उन्हें और भी बहुत कुछ बनाना है।

सनद रहे, गया वो ज़माना जब सेक्सिज़्म पर पारियाँ लम्बी खेली जाती थीं।

(और हाँ, लेखक महोदय यह भी याद रखिए एमबिशस औरतें अपनी सत्ता के लिए अपने प्रिय की मौत का सौदा नहीं करती हैं। क्या छवि बनायी है आपने महत्वाकांक्षी औरतों की। गज्जब/ गज्जब .. और कितने ठहाके लगाऊँ?)

 

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