सुप्रीम कोर्ट ने बुलडोज़र कार्रवाई पर यूपी सरकार को लगाई फटकार, प्रभावित परिवारों को मुआवज़ा देने का आदेश दिया
नई दिल्ली | सुप्रीम कोर्ट ने प्रयागराज में 5 लोगों के मकानों के ध्वस्तीकरण करने की कार्रवाई पर यूपी सरकार को कड़ी फटकार लगाई है और प्रयागराज विकास प्राधिकरण को प्रत्येक व्यक्ति को 10 – 10 लाख रुपये मुआवज़ा देने का निर्देश दिया है।
सुप्रीम कोर्ट ने यह फैसला प्रयागराज के रहने वाले वकील ज़ुल्फिकार हैदर, प्रो.अली अहमद और 3 अन्य की याचिकाओं की सुनवाई करते हुए दिया है।
यह मामला प्रयागराज के लूकर गंज का है। लूकर गंज क्षेत्र के नजूल प्लाट नंबर 19 में कुछ मकानों को अवैध निर्माण बताकर प्रयागराज विकास प्राधिकरण ने 2021 में उनपर बुलडोज़र चला दिया था।
जिनके मकानों के पर बुलडोज़र चलाया गया था, उनमें वकील जुल्फिकार हैदर, प्रो. अली अहमद और 3 अन्य लोग थे। इनका दावा था कि उन्हें शनिवार शाम को नोटिस दिया गया और रविवार को उनके घरों पर बुलडोज़र चलाकर उनको ध्वस्त कर दिया गया।
इस मामले को लेकर इन लोगों ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में एक याचिका दायर की। लेकिन इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इस मामले पर इनकी याचिका को ख़ारिज कर दिया।
इलाहाबाद हाईकोर्ट में याचिका ख़ारिज होने के बाद इस मामले को लेकर सुप्रीम कोर्ट गए और सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर न्याय किए जाने की फरियाद की।
इस मामले की सुप्रीम कोर्ट में 24 मार्च को सुनवाई हुई। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले की सुनवाई करते हुए कहा था कि, “हम
घरों के पुनर्निर्माण की अनुमति देंगे।”
इस पर तब अटारनी जनरल आर वेंकटरमणी ने कहा था कि, “पहला नोटिस दिसंबर 2020 में दिया था। जनवरी 2021 और मार्च 2021 में नोटिस दिए गए। उचित प्रक्रिया का पालन किया गया था।”
जबकि याचिकाकर्ताओं ने कहा कि, उन्हें एक रात पहले नोटिस दिया गया और अगले दिन उनके मकानों को बुलडोज़र से ध्वस्त कर दिया गया।
इस मामले की अगली सुनवाई कल 1 अप्रैल 2025 को सुप्रीम कोर्ट में फिर हुई। इस मामले की सुनवाई जस्टिस ए एस ओका और जस्टिस उज्ज्वल भुइयां की पीठ में हुई।
पीठ ने ध्वस्तीकरण नोटिस देने के तरीके पर असहमति जताई। पीठ ने कहा कि, केवल नोटिस चिपका देना ही पर्याप्त नहीं है।
जस्टिस ए एस ओका ने कहा कि, “यह चिपकाने का काम बंद होना चाहिए। इसके कारण उन्होंने अपने घर खो दिए हैं।” पीठ ने कहा कि, यूपी शहरी नियोजन एवं विकास अधिनियम, 1973 की धारा 27 के तहत कारण बताओ नोटिस 18 दिसंबर 2020 को जारी किया गया था, उसी दिन चिपका दिया गया। कहा गया था कि, इसे निजी रूप से देने के दो प्रयास किए गए थे।
इसके बाद सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने प्रयागराज में घरों को गिराने की कार्रवाई को अवैध और अमानवीय करार देते हुए यूपी सरकार को कड़ी फटकार लगाई। इसीके साथ पीठ ने प्रयागराज विकास प्राधिकरण को भी फटकार लगाया।
पीठ ने कहा कि, “इस कार्रवाई ने हमारी अंतरात्मा को झकझोर दिया है। देश में कानून का राज है। लोगों के घरों को इस तरीके से नहीं ध्वस्त किया जा सकता है। यह हमारी अंतरात्मा को झकझोर देता है। कानून की उचित प्रक्रिया जैसी कोई चीज होती है। अधिकारियों और विशेष रूप से विकास प्राधिकरणों को यह याद रखना चाहिए कि आश्रय का अधिकार भी संविधान के अनुच्छेद 21 का अभिन्न अंग है।”
इसके साथ ही जस्टिस ए एस ओका ने हाल ही में वायरल एक वीडियो का हवाला भी दिया,जिसमें वीडियो में बुलडोज़र एक्शन के दौरान एक बच्ची अपनी किताबें लेकर भागती हुई दिख रही है। जस्टिस ओका ने इसे अंतरात्मा को झकझोरने वाला करार दिया।
सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने इसके साथ ही प्रयागराज विकास प्राधिकरण को वकील जुल्फिकार हैदर, प्रो. अली अहमद और 3 अन्य को 10-10 लाख रुपये मुआवज़ा देने का निर्देश भी दिया।
पीठ ने यह भी कहा कि, यह मुआवज़ा 6 सप्ताह के अंदर पीड़ितों को मिल जाना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से पीड़ितों को बड़ी राहत मिली है और इसके साथ ही यूपी सरकार की बुलडोज़र कार्रवाई अवैध घोषित हुई है।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले से यूपी सरकार को ही नहीं बल्कि यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ को भी तगड़ा झटका लगा है। योगी आदित्यनाथ अपनी मुस्लिम विरोधी नीति के कारण अक्सर मुस्लिमों को टारगेट कर उनको जेल भेजने से लेकर उनके मकानों पर बुलडोजर चला कर उनको ध्वस्त करने से नहीं चूकते हैं।
हालांकि, योगी आदित्यनाथ को उनका यह दांव उल्टा पड़ गया है, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने उनकी सरकार को कड़ी फटकार लगाते हुए उनकी बुलडोज़र कार्रवाई को अवैध करार दिया है। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से योगी सरकार बैकफुट पर आ गई है।

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