रिसर्च में भारत के संपन्न वर्गों में टैक्स चोरी का दावा, कांग्रेस ने मोदी सरकार की टैक्स प्रशासन व्यवस्था की विश्वसनीयता पर उठाया सवाल
नई दिल्ली | देहली स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स के डायरेक्टर प्रोफेसर राम सिंह ने हाल ही में एक रिसर्च पेपर लिखा जिसमें उन्होंने इस तथ्य को उजागर किया कि कैसे भारत का धनवान तबका टैक्स चोरी कर रहा है. इस रिसर्च को लेकर कांग्रेस ने मोदी सरकार को घेरा है.
प्रोफेसर राम सिंह द्वारा लिखित यह शोधपत्र इंटरनेशनल एसोसिएशन ऑफ रिसर्च इन इनकम एंड वेल्थ के इनकम एंड वेल्थ रिव्यू के मई 2025 संस्करण में प्रकाशित हुआ था.
प्रोफेसर राम सिंह की रिपोर्ट यह दर्शाती है कि भारत के सम्पन्न परिवार अपनी आय और संपत्ति के बीच के बड़ा अंतर दिखाते हैं, और ऐसा करके अमीर परिवार करों से बचते हैं और अपनी असल आय छिपाते हैं.
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, राष्ट्रीय खातों का अध्ययन करने वाले एक शोधपत्र में – और लोकसभा सांसदों द्वारा संपत्ति के खुलासे का नमूना लेते हुए – पाया गया कि अमीर भारतीय अपनी आय को कम करके बता रहे हैं, जिससे यह संभावना बढ़ गई है कि भारत में आय असमानता पिछले अध्ययनों की तुलना में कहीं अधिक स्पष्ट है.
दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स के निदेशक राम सिंह द्वारा लिखे गए शोधपत्र में पाया गया है कि “एक परिवार जितना अमीर होता है, वह अपनी संपत्ति के विपरीत उतनी ही कम आय की रिपोर्ट करता है”.
अब कांग्रेस ने प्रोफेसर राम सिंह द्वारा लिखित इस रिपोर्ट का हवाला देते हुए आरोप लगाया है कि मोदी सरकार ने भारत की कर प्रशासन व्यवस्था की विश्वसनीयता और प्रतिष्ठा को पूरी तरह से खत्म कर दिया है.
कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने ‘एक्स’ पर पोस्ट में लिखा कि सबसे निचले 10 प्रतिशत परिवारों की कुल घोषित आय, उनकी कुल संपत्ति के 188 प्रतिशत से भी अधिक है तथा शीर्ष 0.1 प्रतिशत परिवारों की कुल रिपोर्ट की गई आय, उनकी पारिवारिक संपत्ति का केवल दो प्रतिशत है.
कांग्रेस नेता और पार्टी महासचिव जयराम रमेश का कहना है कि अत्यधिक अमीर परिवारों के लिए आय-संपत्ति अनुपात के इतना कम होने का एक अहम कारण टैक्स चोरी की प्रवृति है.
इस प्रकार की प्रवृति से भारत की आयकर प्रणाली पक्षपाती बन चुकी है, क्योंकि अमीर लोग इस व्यवस्था में कर का भुगतान किए बिना ही बच निकलने में सक्षम हो गए हैं.
उन्होंने आगे कहा कि, “मोदी सरकार देश में बड़े पैमाने पर की जा रही कर चोरी की सच्चाई को बदलने के लिए कुछ भी नहीं कर रही है. इसके विपरीत केंद्र सरकार की पार्टी द्वारा नागरिकों और कंपनियों से चुनावी बॉन्ड के जरिए उगाही और राजनीतिक छापों से विपक्ष को डराने के हथकंडों अपनाकर सरकार ने भारत की कर प्रशासन व्यवस्था की जो भी विश्वसनीयता और प्रतिष्ठा बची थी, उसे भी खत्म कर दिया है.”
जयराम रमेश ने दावा किया कि प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से यही संदेश जाता है कि अगर कोई व्यक्ति या कंपनी, भाजपा चुनाव अभियान कोष में मोटा चंदा दे दे, तो उसके द्वारा की गई किसी भी स्तर की कर चोरी को छुपा दिया जाएगा.
ज्ञात हो कि यह पेपर इंटरनेशनल एसोसिएशन ऑफ रिसर्च इन इनकम एंड वेल्थ की आय और संपत्ति की समीक्षा के मई 2025 संस्करण में प्रकाशित हुआ था. सबसे अमीर परिवारों में जाने पर, संपत्ति के मुकाबले रिपोर्ट की गई आय का सापेक्ष हिस्सा और भी कम हो जाता है.
2021 फोर्ब्स की सबसे अमीर भारतीयों की सूची में सूचीबद्ध एक परिवार के लिए, अध्ययन का अनुमान है कि आय संपत्ति का मात्र 1/12वां हिस्सा है. सिंह कहते हैं कि यह संभवतः करों से बचने के लिए आय छिपाने का संकेत है.
इसका परिणाम एक विरोधाभासी कर संरचना रहा है, जहाँ प्रभावी आयकर दरें वास्तव में व्यक्ति के अमीर होने पर कम हो जाती हैं. डेटा विसंगतियों को सामने लाता है: अर्थात्, जबकि इक्विटी शेयरों के स्वामित्व में वृद्धि से आय के साथ-साथ संपत्ति में भी तुलनीय वृद्धि होती है, कृषि भूमि और वाणिज्यिक संपत्ति के स्वामित्व में वृद्धि से अनुपात कम हो जाता है.
रिपोर्ट बताती है कि ये निष्कर्ष भारतीय आय असमानता के पहले से ही भयावह आकलन को और भी बदतर बना सकते हैं. पिछले साल वर्ल्ड इनइक्वैलिटी लैब द्वारा प्रकाशित एक शोधपत्र में भारत के शीर्ष 1% आय वालों के पास मौजूद संपत्ति का हिस्सा 40.1% और आय का हिस्सा 22.6% बताया गया था. सिंह लिखते हैं कि ये निष्कर्ष असमानता की सीमा को कम करके आंकते हैं.

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