रिजवाना तबस्सुम : एक होनहार और निडर पत्रकार का अंत कैसे हुआ कौन है रिज़वाना की मौत का ज़िम्मेदार ?
रिज़वाना अपने अंतिम लेख में देश को एक बड़ा संदेश दे गईं

आज बात करेंगे एक युवा महिला पत्रकार की जो कि बनारस (वाराणसी) की रहने वाली थीं। कुछ दिनों पहले ही Youth Ki Awaaz के फेसबुक पेज के ज़रिये एक लेख पढ़ा। तारीख थी 3 मई 2020, लेख ऐसा कि मानो कोई दिल की गहराइयों से अपने शब्दों को एक माला में पिरो रहा हो।
उस लेखिका (रिज़वाना तबस्सुम) के लेख में एक निडर और एक लाचार पत्रकार होने और ना होने का एहसास हो रहा था। उस लेख में रिजवाना अपने डर से लड़ने का एहसास करवा रही थी, छोटी लेकिन एक निडर पत्रकार होने तथा स्टोरी ना मिलने और रुपये की व्यथा उस लेख में महसूस हो रही थी।
रिज़वाना अपने अंतिम लेख में देश को एक बड़ा संदेश दे गईं
रिज़वाना ने अपने लेख में बताया है कि जब वो बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में एक प्रोटेस्ट कवर करने गई थीं तब किस तरह से लोगों ने उन पर आपत्तिजनक कमेन्ट्स किए।
रिजवाना की बात देश के कोने-कोने तक पहुंचे शायद यही सोचकर उसने अपने मन की बात बता दी थी। यही महत्वपूर्ण बात थी, जो दुनिया से जाने से पहले उसने दुनिया को बतानी ज़रूरी समझी।

मैं कभी नहीं मिला रिज़वाना से लेकिन उनका लेख पढ़कर एहसास हुआ कि शब्दों का गुबार आपके दिल से तभी निकलता हैं जब चोट सीधा दिल और ज़मीर पर लगती है। अपने ही महाविद्यालय में डर लगने का एहसास कैसा होता है, यह रिजवाना ने बता दिया देश को और उस गुलाम मीडिया को कि गुमनाम पत्रकार होना कैसा होता हैं और कितना खतरनाक होता है?
इन सब से गिरकर रिजवाना के पहनावे यानी कि हिजाब पर फब्तियां कसने का एहसास केसा होता है? यह साझा करके रिज़वाना ने दिल को झकझोर कर रख दिया।
एक उभरते पत्रकार का अकस्मात चले जाना झकझोरता है
रिज़वना के जाने का कारण क्या रहा होगा यह नहीं पता है। वो विषय क्या रहा होगा जिसने रिज़वाना को इस दुनिया से जाने के लिए मजबूर कर दिया, नहीं पता। यकीनन उन्हें उकसाने वाले पर ज़रूर कार्रवाई होनी चहिए।
रिजवाना के फेसबुक प्रोफाइल को देखकर लगता है कि वो बहुत खुशमिजाज़ किरदार की रही होंगी। उनके आसपास के लोग उनसे बहुत प्यार करते होंगे तभी तो सब उनके हर महत्वपूर्ण दिन में हिस्सेदार बनते थे।
उनके बायो में लिखा है, “फॉलो करने वालों का स्वागत है, साभार नहीं देने वाले दूर रहें।” यह लाइन एहसास दिलाती हैं कि रिज़वाना एक खुले दिमाग की लड़की थी। वो आलोचना से नहीं डरती थी, बल्कि आलोचना और डर का सामना करना जानती थी।
कुछ भी हो यह तो तय है कि रिज़वाना ने अपने लेख के ज़रिये हम सभी के दिलों पर एक अमिट छाप छोड़ गईं।

रिजवाना के लेख के कुछ अंश
- जब आप पूरी ईमानदारी के साथ पत्रकारिता कर रहे होते हैं तो कई लोग आपके खिलाफ हो जाते हैं और आपके काम में मुश्किलें आने लगती हैं।
- इन बच्चों ने कहा है कि इस लड़की से कहिए यहां से चली जाए, नहीं तो इसके साथ कुछ हो जाएगा। आप प्लीज़ यहां से चली जाइए, हम नहीं चाहते कोई दिक्कत हो।
- बीएचयू मेरे घर से करीब 14 किलोमीटर दूर है। वहां जाने में करीब एक घंटे का वक्त लगता है, किराया लगता है उसके बाद अगर आपका काम ना हो तो आप मायूस होते हैं।
- एक फ्रीलान्स जर्नलिस्ट को स्टोरी पर ही पैसे मिलते हैं और उसे इतने पैसे नहीं मिलते कि वो एक स्टोरी के लिए जाए और वापस आए फिर दूसरी स्टोरी के लिए जाए और बिना स्टोरी के वापस आए।
- वाकई में जवाब मुश्किल है और उन लोगों के लिए तो ज़्यादा मुश्किल है, जो ग्रामीण क्षेत्रों में लगातार ग्राउंड रिपोर्टिंग कर रहे हैं।
रिज़वाना जाते-जाते हमें तमाम विषयों पर सोचने के लिए विवश कर गईं
रिज़वाना पर कसी गई फब्तियां ना केवल समाज की बुरी दशा को व्यक्त करती हैं, बल्कि हमारी सकीर्ण मानसिकता को भी उजागर करती है। रिज़वाना हमें छोड़कर भले ही चली गईं हो लेकिन जाते-जाते हमारे लिए बहुत से सवाल खड़े कर गईं। वो यह भी बता गईं कि मौजूदा वक्त में ज़मीनी स्तर पर पत्रकारों की क्या हालत है।
मैं बड़े पत्रकारों की बात ना करके उनकी बात कर रहा हूं जिनकी वजह से छोटी-छोटी खबरें हम तक पहुंचती हैं। जो मेन स्ट्रीम मीडिया का पार्ट ना होकर अपनी छोटी सी दुनिया से हमारे लिए बड़ी-बड़ी खबरें निकाल कर लाते हैं।
रिज़वाना की मौत का ज़िम्मेदार कौन?
रिज़वाना की मौत एक जांच का विषय है जिसका फैसला न्यायपालिका करेगी लेकिन हमारे समाज के लिए एक सवाल हमेशा रहेगा कि पत्रकार बनने वाली लड़कियां हिंसा और भद्दे कमेंट्स का शिकार क्यों होती हैं?
क्या इंसानों द्वारा बनाया गया सभ्य सामाज एक महिला पत्रकार की इज़्जत करना नहीं जानता या वो इज़्जत भी धर्म देख कर करता है।

लिंग के आधार पर भेदभाव सभ्य समाज के लिए ज़हर है
कानून से पहले हमारे समाज को अपनी आने वाली पीढ़ी को यह बताना होगा कि हमारे लिए महिलाओं की क्या अहमियत है? किसी से लिंग के आधर पर भेदभाव करने की शिक्षा कोई धर्म या ईश्वर नहीं देता है।
इसकी शुरुआत स्कूल और घर से करनी होगी। संकीर्ण मानसिकता को खत्म करने के लिए हमें फिर से पीछे जाना होगा ताकि बढ़ते समाज में महिलाओं के प्रति सम्मान को बढ़ावा मिल सके।
यकीनन रिज़वाना लौटकर नहीं आ सकती हैं लेकिन उनका आखरी लेख हमारे लिए सीख के समान है। 4 मई 2020 को रिजवाना तबस्सुम ने आत्महत्या कर ली, जो बहुत दुःख की बात थी हम सभी के लिए। कारण कुछ भी रहा हो, हमने एक होनहार और निडर पत्रकार को खो दिया।
Courtesy: https://www.youthkiawaaz.com/2020/05/story-of-freelance-journalist-rizavana-tabassum-hindi-article/


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