स्‍मोकिंग करने वाले कोरोना मरीजों को रिकवरी में लग रहा ज्‍यादा समय : विशेषज्ञ

मुंंबई: 

कोरोना महामारी के इस दौर में कई अस्पताल ऐसे 40-50% मरीज़ देख रहे हैं जो धूम्रपान करते हैं या धूम्रपान की वजह से उनके लंग्स, पहले से ही काफी प्रभावित हो चुके हैं. तम्बाकू का सेवन करने वालों की न सिर्फ़ रिकवरी में देर लग रही है बल्कि पोस्ट कोविड की तकलीफ़ भी इनमें ज़्यादा है. दूसरे शब्‍दों में कहें तो धूम्रपान, गुटखा और तंबाकू का अधिक सेवन करने वालों में कोरोना का असर, सामान्‍य मरीजों की तुलना में ज़्यादा नजर आ रहा है. लायंस क्लब अस्पताल, मुंबई डॉ. सुहास देसाई कहते हैं, 'स्मोकर्स में ये बीमारी आमतौर पर सीवियर फ़ॉर्म में पायी जा रही है. हमारे पास 35 साल के युवा मरीज़ आए थे, वे स्‍मोंकिंग करते हैं, इनका सीटी स्कोर 18/25 था. उनका लंग इन्वॉल्व्मेंट काफ़ी दिखाई दे रहा है. इनमें साथ ही Chronic obstructive pulmonary disease (COPD) के लक्षण भी हैं.' दूसरी ओर, स्‍मोकिंग नहीं करने वाले कोविड मरीजों में Chronic obstructive pulmonary disease(COPD) के साइन नजर नहीं आते. Pneumonitis भी कम मात्रा में दिख रहा है. इसको हम Ground Glass Opacities बोलते हैं. तो इनमें ये कम मात्रा में पाया गया है.

विशेषज्ञ कहते हैं कि तम्बाकू शरीर में ACE2 रिसेप्टर्स बढ़ाता है.शरीर में इसकी जितनी मात्रा बढ़ती है, संक्रमण का खतरा भी उतना ही बढ़ता जाता है.कोविड मरीज़ों में तम्बाकू, ऑक्‍सीजन का लेवल भी कम करता है, इससे ICU-वेंटिलेटर की जरूरत बढ़ती है. भाटिया हॉस्पिटल के CEO डॉ. राजीव बौधनकर बताते हैं,' ACE2 एंज़ाइम स्मोकर्स में बढ़ जाता है. कोविड वायरस इसके माध्यम से शरीर में एंट्री करता है. स्मोकर्स में ACE2 ज़्यादा मात्रा में bronchial के अंदर होते हैं, जहां से इसकी एंट्री होती है. दूसरी बात यह है कि स्मोकर्स के अंदर कार्बन मोनोआक्सायड ज़्यादा होता है, यानी ऑक्‍सीजन की मात्रा इनमें कम होती है. इसलिए रिस्क ज़्यादा होता है.' टाटा हॉस्पिटल के ओंकोलोजिस्ट, डॉ प्रभाष ने भी इस तरह की राय दी. उन्‍होंने कहा, ओवरऑल जो मरीज़ स्मोकिंग कर रहे हैं इनमें तकलीफ़ ज़्यादा है, इसको हम लोग रिलेटिव रिस्क बोलते हैं जो 1.3 होता हैं स्मोकर्स को नॉन स्‍मोकर्स की तुलना में वेंटलेटर की ज्‍यादा ज़रूरत पड़ती है. धूम्रपान करने वालों में पोस्ट कोविड की तकलीफ़ ज़्यादा है और रिकवरी धीमी.'

फ़ोर्टिस हॉस्पिटल के हेड-सर्जिकल ऑंकॉलॉजी डॉ अनिल हेरूर ने भी माना कि स्मोक करने वालों में रिकवरी में भी देरी होती है क्‍योंकि उनके लंग्स पहले से ही अफ़ेक्टेड होते हैं, इसलिए इनके ठीक होने में नॉन स्मोकर्स से ज़्यादा समय लगता है. उन्‍होंने कहा, 'स्मोक करने से ब्लड क्लॉट होता है हार्ट अटैक का ख़तरा भी रहता है कोविड में भी ये ख़तरा बरकरार है, दोनों के साथ आने से इफ़ेक्ट्स मल्टिप्लाई होते हैं.'कई अस्पतालों में 40-50% कोविड मरीज़ स्मोकर्स हैं. Wockhardt हॉस्पिटल के कंसल्‍टेंट फिजीशियन डॉ प्रीतम मून के अनुसार, 'टोबेको (तंबाकू) का सेवन करने वाले कोविड मरीज़ क़रीब 50% की संख्या में अस्पताल आते हैं.

फ़ायब्रोसिस ज़्यादा होने की वजह से इनमें संक्रमण फैलने के चांसेस होते हैं, इनमें क़रीब 15% लोग सीरियस हुए हैं.'एशियन कैन्सर इंस्‍टीट्यूट के डायरेक्‍टर डॉ दीपक पारिख कहते हैं, ' काफ़ी मरीज़ आते हैं और कहते हैं हमने स्मोकिंग कम कर दी है. मैं उनको एक ही चीज़ कहता हूं कि आप मुझे ये ऐसे बता रहे हैं कि पहले में 10 फ़्लोर से नीचे कूदता था और अब दूसरे फ़्लोर से कूद रहा हूं. आप इसे ना रोककर रिस्क बढ़ा रहे हैं.' साफ शब्‍दों में कहें तो ऐसा कोई अस्पताल या डॉक्टर नहीं, जो धूम्रपान करने वालों में कोविड का कम असर देख रहे हों, धूम्रपान से कोविड में फ़ायदे जैसी कोई भी भ्रामक स्टडी और फ़ॉर्वर्ड पर क़तई भरोसा ना करें..

 

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