समाज का कचरा:फेसबुकिये झोलाछाप लेखक
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आजकल फेसबुक व्हाट्सप ट्विटर पर जहां समाज और देश के लिए सकारात्मक गतिविधियों में खुल कर जुड़ते हैं,अपनी जागरूकता दिखाते हैं,वहीं इस शख़्स केदारनाथ जैसे लोग भी हैं,जो दिल्ली में हिंदी साहित्य के नामोँ में शुमार होने और सस्ती लोकप्रियता पाने के लिए किस हद तक गिर सकते हैं,इसकाअन्दाज़ा भी हम आपनहीं लगा सकते हैं।
केदारनाथ खुद को शब्दों का मसीहा कहता है और इसी नाम से फेसबुक आई डी चला रहा है।इसने कुछ अपने जैसे लोगों का एक ग्रुप बना रखा है,जो दिल्ली में सभी जगह होने वाली गोष्ठियों और सम्मेलनों में जाते हैं।

शराब पीकर लाइव करना और मस्तराम स्तर की अनाम कहानियों के जरिये अपनी कुंठा निकाल कर यह शख्स खुद को मंटो का दूत कहता फिरता है। हालही में इनकी लिखी एक कहानी चस्पा कररहा हूँ,जो एक बेबाक मशहूर नवोदित लेखिका को ईर्ष्यावश बदनाम करने के लिए लिखी गयी है।जैसा दुनिया का दस्तूर है,वैसेही नाम बदल कर इन्होंने न एक महिला के चरित्र का तमाशा बनाकर सबका हुजूम इकट्ठा करने की कोशिश की बल्कि इस्लाम को भी अपनी गन्दीसोच के दायरे में खड़ा कर दिया है।
यह पोस्ट शब्द मसीहा केदारनाथ की आई डी से दिनांक 7 मार्च शाम 4:40 पर पोस्ट की गई है,जिसमें छोटी गुमनाम कहानी की शक्ल में इस्लाम को बदनाम किया गया है।
इस कहानी में इस आदमी की घिनौनी सोच दिखती है,जिसके हिसाब से इस्लाम मर्दों को अपनी सगी बहन के अलावा हर औरतको गलत नज़रिये से देखने और इस्तेमाल करने की छूट देता है।
इस इंसान को न इस्लाम की पाकीज़गी का इल्म है और न इस्लाम में औरतों को नवाज़ी गयी इज्ज़त का।इस कहानी के जरिए इसने इस्लामकी गलत तस्वीर सबके सामने रखने की हिमाक़त की है और औरत के किरदार को बेइज्ज़त किया है।क्या इसका धर्म और कर्म इसे यही सिखाता है?

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