सब का साथ सब का विकास अब भी चुनौती
विचार विमर्श:- वर्तमान सरकार अपना अंतिम बजट प्रस्तुत कर चकी है I बजट ने किसी की उम्मीदों पर पानी फेरा तो कई के आँगन में जम कर बरसा I सत्ता पक्ष के लोगों, सरकारी एवं अर्ध सरकारी संगठनों के ज़िम्मेदारो ने बजट की प्रशंसा की तो विपक्ष कमियां खोजता दिखाई दिया। प्रधानमंत्री ने इसे किसानों, गरीबों, पिछड़े वर्गों का बजट बताते हुए नए भारत का निर्माण करने वाला बताया, जबकि पिछले बजट को सब के सपनों का बजट बताया था। इस बजट को वह सब का साथ सब का विकास वाला बजट नहीं कह सके I वैसे इस में देश के पहले नागरिक राष्ट्रपति से लेकर उसके अन्न दाता किसान, सब के लिए कुछ न कुछ है I अलबत्ता यह कुछ न कुछ, कुछ के लिए तुरंत उपलब्ध हो सकने वाली सौगात के रूप में है, और अधिकतर के लिए ऐसे वायदों के रूप में, जिन्हें सरकारें पूरा करने की तब तक चिंता करती हैं, जब तक उनसे प्रभावित होने वाले मतदाता के रूप में दिखाई दें I यही कारण है कि बहुत से लोग बजट को सब्ज़ बाग़ दिखाकर गुमराह करने वाला बता रहे हैं
बजट को देखने से पता चलता है कि राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, राज्यपालों और संसद सदस्यों के वेतन व भत्तों सम्बन्धी घोषणाओं को अमल में लाने के रास्ते में कोई बाधा नहीं आने वाली, लेकिन दस करोड़ परिवारों, अर्थात् 50 करोड़ लोगों को पांच लाख रुपये के कैशलेस इलाज की सुविधा, टीबी के रोगियों को पोषक पदार्थ मुहैया कराने के लिए 600 करोड़ रुपये का आवंटन, 24 नए मेडिकल कॉलेजों और अस्पतालों की स्थापना और जिला स्तरीय अस्पतालों को अपग्रेड करना, बेघरों को घर और नए परिवारों को बिजली उपलब्ध कराना, 2022 तक किसानों की आय दोगुनी करने, उनकी उपजों के लागत से डेढ़ गुने दाम दिलाने, दो हजार करोड़ रुपये से कृषि बाजार बनाने, पांच सौ करोड़ रुपये से ऑपरेशन ग्रीन चलाने और पशुपालकों तक को क्रेडिट कार्ड मुहैया कराने जैसी बजट घोषणाएं निस्संदेह गरीबों, बे- घरों, किसानों और ग्रामीण आबादी को लुभाने वाली हैं। लेकिन पड़ताल करने से अनुमान होता है कि इनकी स्थिति मतदाताओं से किए गए वादों से ज्यादा और कुछ नहीं।
एक वर्ष में सरकार कितना काम कर पाएगी यह समय बताएगा। वर्तमान में जो कार्य चल रहे हैं यदि वे पूर्ण हो जायें तो यह सरकार की बड़ी उपलब्धि मानी जाएगी। उदाहरण के लिए, 2014 में नरेंद्र मोदी ने संसद में अपने पहले भाषण में कहा था कि 70 वर्षों में कुछ नहीं हुआ। अब भी 18 हजार गांवो में बिजली नहीं है। उन्होंने उन गांवों तक बिजली पहुंचाने का संकल्प किया था। वर्तमान बजट में 1.75 करोड़ परिवारों को बिजली देने की घोषणा की गई है। सरकार ने दीन दयाल उपाध्याय ग्राम ज्योति योजना के तहत गांवों के विधुतीकरण का काम किया। इस की गति इतनी धीमी है कि गांवों के विधुतीकरण के लिए कई और साल दरकार होंगे। यह उस समय है जब 10 प्रतिशत लोगों को कनेक्शन देने पर पूरे गांव का विधुतिकरण होना मान लिया जाता है। रहा सवाल किसानों की आय को दोगुना करने का तो इस बजट से स्वामी नाथन आयोग की सिफारिशों पर अमल होता नहीं दिखाई दे रहा। सभी किसान संगठन स्वामी नाथन आयोग की सिफारिशों के क्रियान्वयन की मांग करते रहे हैं। सरकार ने 22 हजार ग्रामीण हाट को छोटी मंडियों का रूप देने का फैसला किया है। यह स्वागत योग्य है, लेकिन इन को बनाने या ऑपरेशन ग्रीन चलाने और क्रेडिट कार्ड जारी करने के लिए धन कहां से आयेगा बजट इस पर चुप्पी साधे है। क्या आने वाले दिनों में सरकार शिक्षा व स्वास्थ्य की तरह इन कार्यों के लिए भी सेस टेक्स लगाएगी ?
सरकार ने पर्यावरण में आ रहे बदलावों को देखते हुए, हर खेत को पानी देने पर जोर दिया है। वर्तमान में, खेती योग्य 50 फीसद हिस्सा असिंचित है। जिसमें सिंचाई सुविधा होने से फसलों की उत्पादकता बढ़ाई जा सकती है। वित्त मंत्री अरुण जेटली ने बजट में सिंचाई के महत्व को सरकार की प्राथमिकता बताई है। इस के लिए नदियों को आपस में जोड़ने की योजना है। भूजल से खेती की सिचाई करने वाले किसानों को सौर ऊर्जा के प्रयोग करने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है। तापमान की वृद्धि के चलते खेती से होने वाली आय में भारी कमी होने का संदेह है। आंकड़ों के अनुसार कुल कृषि क्षेत्र में 15 से 18 प्रतिशत और असिंचित क्षेत्र में 25 से 28 प्रतिशत तक की कमी के संकेत हैं। किसान सिचाई की राशनिंग से गुस्से में हैं।
स्वास्थ्य एवं शिक्षा के लिए सेस 3 से बढ़ा कर 4% प्रतिशत कर दिया है। इस वृद्धि का प्रभाव स्वास्थ्य, शिक्षा से लेकर सभी क्षेत्रों पर पडने वाला है। इससे पहले मोदी सरकार स्वच्छ भारत के लिए भी उपकर लगा चुकी है। जिसके कारण जनता की जेब से पैसा तो गया, लेकिन भारत अभी भी स्वच्छ नहीं हो पाया है। वर्तमान बजट में यह गुंजाइश निकाली गई है कि नवोदय विद्यालयों के तर्ज पर एस.सी., एसटी, के लिए एकलव्य मॉडल आवासीय स्कूल शुरू किये जाएगें। ये विद्यालय बीस हजार आदिवासी आबादी वाले क्षेत्रों में भी बनाये जाएंगे। इन विद्यालयों में दाखिला लेने वाले बच्चों का पूरा खर्च सरकार उठाएगी। अभी आदिवासी इलाकों में सरकारी विद्यालयों, छात्रावासों, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों की दुर्दशा देनिये है। स्कूलों में शिक्षक नहीं हैं, जिसके कारण कई स्कूलों को मिला दिया गया है। स्वास्थ्य केंद्रों में डॉक्टर नहीं हैं हॉस्टलों की स्थिति खराब है ऐसे में इस नए प्रस्ताव पर बहुत उम्मीदें नहीं बांधी जा सकतीं। बेहतर होता आदिवासियों को एकलव्य तक सीमित करने के बजाय मुख्य धारा में लाने के लिए ठोस कदम उठाये जाते।
दस करोड़ परिवारों को स्वास्थ्य सुविधाएं प्रदान करने को लेकर ढिंढ़ोरा पीटा जा रहा है कि यह दुनिया की सबसे बड़ी स्वास्थ्य योजना है अमेरिकी राष्ट्रपति ओबामा कैरियर की तरह जबकि हमारे पड़ोसी देश, चीन ने अपनी 95% आबादी को स्वास्थ्य सुविधा प्रदान कर रखी है। बाकी बची आबादी को भी कवर करने का काम चल रहा हैं।
सरकार की इस योजना से विदेशी बीमा कंपनियों के लिए भारत के दरवाजे खुलेंगे। दस करोड़ परिवारों को इसका कितना लाभ होगा यह तो समय आने पर पता चलेगा लेकिन बीमा कंपनियों को काम दिलाने के एवज कुछ लोगों की जेबें जरूर भर जायेंगी। सरकारी अस्पतालों का रोगियों के प्रति व्यवहार से कौन वाकिफ नहीं ? रहा सवाल निजी अस्पतालों का तो उनका पूरा ध्यान पैसा बनाने पर है। उनकी लापरवाही के दसियों उदहारण मौजूद हैं। हालांकि 1.5 लाख स्वास्थ्य और आरोग्य केंद्र बनाने से जन स्वास्थ्य में सुधार की संभावना है।
बजट में नौकरी पेशा लोगों के लिए कुछ खास नहीं है। अभी तक नौकरी पेशा को परिवहन भत्ता 19200 रूपये और चिकित्सा व्यय 15000 यानि 34200 रुपये पर कोई कर नहीं लगता था I अब इस 34200 रुपये के फायदे के बदले 40 हज़ार की मानक कटौती की छूट मिलेगी I इस से टेक्स में करीब तीन सौ रुपये का फ़ायदा होगा। लेकिन सेस के नाम पर इससे अधिक उनका टेक्स कट जायेगा I इसी प्रकार मध्य वर्ग को कैपिटल गेन के रूप में 10 फीसद टेक्स देना होगा I कॉर्पोरेट के कर में पांच प्रतिशत की कमी की गई है I उज्जवला योजना के तहत निशुल्क गैस कनेक्शनों के लक्ष्य को पांच करोड़ से बढ़ा कर आठ करोड़ करना सरकार का सराहनीये कदम है, लेकिन इसे और अधिक कारगर बनाया जा सकता है I अभी इस योजना से कई परिवार वंचित हैं
इसका कारण योजना का युक्ति संगत नहीं होना है I तेल कंपनियों के पास तथाकथित जरूरतमंद लोगों की सूची होती है जिन्हें वे कनेक्शन उपलब्ध कराते हैं। यह सूची कहां और कैसे तैयार होती है इसमें पारदर्शिता नहीं है। महिला और बाल विकास बजट में भी वृद्धि हुई है। ईपीएफ में महिलाओं की भागीदारी 8 प्रतिशत कर दी गई है और गरीब गर्भवती महिलाओं के लिए गर्भ के दौरान अच्छे खान पान के लिए छः हज़ार रूपये का प्रावधान किया गया है I वृद्धि अल्पसंख्यक बजट में भी हुई है, लेकिन बहुत मामूली केवल 505 करोड़ रुपये। अब यह 4700 करोड़ रूपये हो गया है, जिसमें 2453 करोड़ रुपये शैक्षिक रूप से मजबूत करने के लिए उन सात योजनाओं के लिए रखे गये हैं जो इसी वर्ष शुरू की जा रही हैं। अल्पसंख्यकों का बजट उन की संख्या और सच्चर समिति की सिफारिशों के मुताबिक आगे लाने के लिए बेहद कम है। यह बजट अल्पसंख्यकों के लिए ही नहीं दलितों के लिए भी निराशाजनक रहा है।
गांव, गरीब, किसान, स्वास्थ्य और महिलाओं पर बजट में जोर देने के कारणों पर विचार करने से अनुमान होता है कि यह बजट आने वाले चुनाव को सामने रखकर तैयार किया गया है। यूपी के निकाय और गुजरात विधानसभा चुनावों में यह बात साफ तौर पर सामने आई थी कि मध्यम वर्ग या शहरी क्षेत्र के लोगों ने भाजपा का साथ दिया लेकिन ग्रामीण इलाकों में उसे विफलता का सामना करना पड़ा। सरकार ने इस वर्ग को बजट के माध्यम से साधने की कोशिश की है। दुनिया के सबसे अधिक युवा भारत में हैं। एक करोड़ युवाओं को वार्षिक रोज़गार देने के वादे पर भाजपा 2014 में युवाओं के वोट प्राप्त कर चुकी है I पांच वर्षों में भी एक करोड़ नौजवानों को नौकरी मिलने की संभावना नहीं है, नौकरियां घटने और छटनी के समाचार बराबर मिल रहे हैं I केवल रेलवे में 2014 से अब तक दो लाख नौकरियां कम हो चुकी हैं I रोज़गार न मिलने से युवाओं में निराशा है I बजट के माध्यम से सरकार नौजवानों की बड़ी संख्या को अच्छा जीवन देने के लिए ठोस कदम उठा सकती थी I जिसमें सरकार विफल रही है। शायद यही कारण है कि युवाओं को सांप्रदायिकता में उलझाने की कोशिश की जा रही है। युवा शक्ति का उपयोग करके देश को बहुत आगे ले जाया जा सकता था I किन्तु उचित योजना के अभाव के कारण ही ग्रामीण, गरीब और पिछड़े वर्गों को बजट के द्वारा साधने की कोशिश की गई है। देश के सामने सब का साथ सब का विकास अब भी चुनौतीपूर्ण है।

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