राम रामचन्द्र और रामराज्य
डॉ सलीमुददीन
आम तौर पर जब किसी हिन्दू बुज़ुर्ग से मिलते हैं तो वो हाथ जोड़कर राम राम कहते हैं। जब किसी हिन्दू भाई का देहांत हो जाता है तो मुरदे के पीछे राम नाम सत्य - सत्य बोलो गत है यह बोलने का अर्थ मरने वाले को नहीं सुनाया जाता बल्कि प्रियजनों को बताया जाता है कि राम का नाम सत्य बाक़ी सब व्यर्थ है।
#राम, ईश्वर, गोड, रहीम रहमान का पर्यायवाची है।जो निराकार अजन्मा सारी श्रृष्टि को पैदा करने और चलाने वाला है ।
जैसे हमारे यहां अल्लाह का गुणवाचन नाम रहीम या रहमान है, जब हम कहेंगे अब्दुल रहमान अर्थात रहमान का बन्दा, अब्दुल्लाह अल्लाह का बंदा अब्दुल रहीम रहीम का बंदा, शम्शुर्रहमान रहमान का सूरज आदि।
इसी तरह जब बोला जाता है राम चन्द्र अर्थात राम का चांद
#कबीर ने कहाः राम का नाम ले द्रष्टि मइ रामचंद्र।।
भम बसिस्ट गुरू मन्त्र दानी।।
#अर्थ रामचंद्र जी ने भी राम के नाम से नज़र पाई और करोशिष्ट ने उन्हें ज्ञान दिया।।
ना जसरथ घर ओ तेरी आवा।
ना लंका का राऊ सतावा।।
#अर्थ हमारा राम अवतार नहीं है न तो उसने दशरथ के घर जन्म लिया और न लंका के राजा रावण को उसने सताया।
#तुलसीदास कहते हैं
आदि अंत कोउ जास न पावा।।
मत अनुमानी निगम इस गावा।।
#अर्थ इस के बारे में कल्पना न करो वो तो आदि है अनन्त है।
गांधी जी ने 28 अप्रेल 1946 में बड़ी प्यारी बात कही थी।
"मेरे राम मेरी प्रार्थनाओं को सुनने वाले वो ऐतिहासिक राम नहीं जो अयोध्या के राजा दशरथ के बेटे थे। मेरा राम सदा से और अजन्मा है जिसकी कोई मिसाल नहीं,
मैं केवल उसी की पूजा करता हूं" ।
"मुझे मार दिया जाए तब भी मैं राम और रहीम के नामों का जाप नहीं छोड़ूंगा जो मेरे लिए एक ही खुदा के दो नाम हैं"।
अखबार हरिजन 20 अप्रैल 1947 पेज 118, यह जय श्रीराम का नारा अशोक सिंघल साहब ने जिसको संघ ने एडोप्ट कर लिया था। वरना उससे पहले यह शब्द इतना प्रचलित नहीं था। और इसका प्रयोग भी केवल सत्ता तक पहुंचने का माध्यम बनाया गया।
#रामराज्य :-इसका अर्थ है हुकूमते इलाहिया अर्थात अल्लाह की हुकूमत या परमेश्वर की सत्ता,
गांधी जी के नज़दीक रामराज्य का मिसाली हुकूमत हज़रत उमर रज़ि की थी जो न्याय समानता, नैतिकता और आध्यात्मिक पर आधारित थी! गांधीजी के रामराज्य में राजा ग़रीब प्रजा सब बराबर थे।कानून सबके लिए बराबर था।
हम सब मुसलमान श्रीराम चन्द्र जी का बहुत अहतराम करते हैं।
परन्तु उनका समस्त जीवन दर्शन पूरी दुनिया के लिए अनुसरणीय इस लिए नहीं हो सकता क्यों कि वे ऐतिहासिक तौर पर मतभेद में घिरे नज़र आते हैं।मुमकिन है उन का काल ईश्वरीय सत्ता पर आधारित रहा हो परन्तु उसका कोई प्रमाण ऐतिहासिक रूप में किसी के सामने नहीं है। फिर जो घटनाऐं उनके काल में हुईं एक उदाहरण यह भी मिलता है कि उनके हाथों से धार्मिक तपस्वी शम्भुक जी का इस लिए वध किया गया क्योंकि वे शुद्र थे।(बाल्मीकि रामायण उतर कांड)
गांधीजी ने और स्पष्ट किया कि "रामराज्य से मेरी मुराद हिन्दू राज नहीं है। रामराज्य से अभिप्राय परमेश्वर की सत्ता है। मेरी नज़र में राम और रहीम एक ही हैं। रामराज्य का पुराना आदर्श निसंदेह एक सच्चा लोकतंत्र है जिसमें छोटे से छोटा व्यक्ति भी लम्बे चौड़े संघर्ष के बिना तत्काल न्याय पा सकता है "
(यंग इंडिया 19 सितम्बर 1929)
संघ ने अपने उद्देश्य के लिए गांधी दर्शन के राम को श्रीरामचन्द्र में परिवर्तन कर दिया।
रामराज्य का नारा देकर वर्णव्यवस्था को पुनः लागू करने का रास्ता साफ कर लिया है।
यदि रामचंद्र जी के आदर्श पर ही चलना चाहते हैं हमारे संघप्रमुख जी को रामचन्द्रजी की तरह विवाह करना चाहिए और मान्य योगी जी को भी।
इस बात से भारतीयों का एक बड़ा तबका अनभिज्ञ है।
आवश्यकता इस बात की है कि हम बिना पक्षपात के उन बिन्दुओं पर विचार करें जिससे देश के सभी नागरिकों का कल्याण हो समरसता, समानता, विश्वास, प्रेम, सद्भावना पैदा हो।
झूठ, कपट, जातिवाद, ऊंच नीच, द्वेष, असमानता, नफरतों से यह देश विश्व गुरु नहीं कहलाएगा। देश की ज़ीनत नागरिक होते हैं। यदि नागरिक असंतोष हों बेरोज़गार हों परेशान हों तो देश निम्न स्तर पर खड़ा हो जाता है। चाहे हम कितनी ही भौतिक सुख संसाधन में, विज्ञान टेक्नॉलजी में तरक्की कर लें। कभी सम्पन्न नहीं कहलाएंगे।
मेरे इस लेख से किसी को कोई ठेस पहुंची हो तो उसके लिए क्षमा चाहता हूं।

0 comments