प्रधानमंत्री मोदी के 5 वर्षीय कार्यकाल की समीक्षा 

2019 के लोकसभा चुनाव के लिए मतदान आरंभ हो चुके हैं। यानी इस सरकार के पांच साल का कार्यकाल लगभग खत्म हो चुका है।इसलिए यह महत्वपूर्ण है कि भारतीय लोग उन वादों पर विचार विमर्श करें और समीक्षा करें कि हमारा वोट जिस अधार पर हमसे लिया गया था उसको पूरा किया गया या नही? क्या सत्ता पक्ष ने अपने वादों के 10% वादे को भी पूरा किया?
2014 को याद करें जब हर तरफ "हर हर मोदी घर घर मोदी" का नारा ज़ोरों पर था। जब भारतीय लोग बेहतर बदलाव चाहते थे, क्योंकि वह केंद्र में एक "भ्रष्ट पार्टी" से उकता चुके थे, और ऐक बेहतर परिवर्तन चाहते थे। भाजपा और मोदी के भाषणों के अनुसार, भारत दुनिया भर में एक आदर्श देश बनने जा रहा था। हर जगह उत्साह का माहौल था। "मोदी मोदी" हर वर्ग की ज़बान पर था।
कांग्रेस मुक्त का नारा लोकप्रिय हो रहा था, लोकसभा चुनाव से पहले मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ के विधानसभा चुनावों में भाजपा के "कांग्रेस मुक्त भारत" के नारे के कारण लोगों ने भाजपा को बहुमत दे दिया था । इसलिए, लोकसभा चुनाव में भी लोगों ने उन्हें सुना और आँख बंद करके उनके वादों पर भरोसा किया और उम्मीद की कि भारत अब अमेरिका, चीन और जापान जैसे देशों के साथ विकास के क्रम में खड़ा होगा। क्योंकि उनसे वादा किया गया था कि "अच्छे दिन आने वाले हैं", देश के युवाओं को आश्वासन दिया गया था कि हर साल आपको "दो करोड़ नौकरियां" दी जाएंगी। गरीबों और किसानों के हितों की बात की गयी थी। भारतीय सेना के ऐक बलिदान पर "दुश्मन के सौ सिर लाने" की बात की गयी थी। इसलिए लोगों ने भाजपा को अपना बहुमूल्य वोट दिया और भाजपा को पूर्ण बहुमत से जीत दिलाई।
युवा पांच साल से अच्छे दिन की प्रतीक्षा कर रहे थे। लेकिन उन्हें क्या मिला? उन्हें मिला "मैं भी चौकीदार " का नारा, उन्हें "पाकिस्तान मुर्दाबाद का नारा" मिला।
अब, एक मिनट विचार करें कि लोगों को इन नारों से क्या फायदा हुआ ? क्या उनकी अर्थव्यवस्था सही हुई ? क्या मंहगाई की दर में गिरावट आई? बैंकों ने गरीबों का तरह तरह से पैसा काटना शुरू कर दिया। क्या लोगों को रोजगार मिला? नहीं! बिलकुल नहीं
एनएसएसओ(NSSO) के आंकड़ों के अनुसार, पिछले 45 वर्षों में भारत में बेरोजगारी की दर सबसे अधिक है, जबकि सरकार अपने अधिकांश भाषणों में रोजगार देने की बात करती है । हमें नहीं पता कि उसने अपने डेटा में कौन सी नौकरी गिनाई है।
अब उन वादों का संछेप मे हम नज़र डालते हैं कि क्या 10% वादा भी पूरा किया गया या नही?
भ्रष्टाचार :-
इन पांच-वर्षीय सरकार पर विचार करें, तो पता चलेगा कि जो सरकार भ्रष्टाचार और भ्रष्टाचार को दूर करने की बात करके सत्ता में आई थी, आज उसे राफेल घोटाले में शामिल होने का दोषी माना जा रहा है। अगर राफेल के सौदे के बारे में बात करें तो यह स्पष्ट है कि जिस जहाज की कीमत 2014 से पहले 526 करोड़ थी, वर्तमान सरकार 2016 में लगभग 1600 करोड़ करोड़ में खरीद रही है, जो स्पष्ट रूप से ऐक भ्रष्टाचार है।
इस सरकार के कार्यकाल में भ्रष्टाचार के कई उदाहरण मौजूद हैं, जो स्पष्ट रूप से नज़र आता है कि इस सरकार ने भी भ्रष्टाचार बड़े पैमाने पर कर के जनता को मुर्ख बनाया है. लेकिन राफिले का मामला सबसे बड़ा मामला था, जिसमे 30 हजार करोड़ का घोटाला हुआ । यही कारण यह है कि सरकार अपने काले करतूतों के रहस्यों को छुपाने के लिए संयुक्त संसदीय समिति (JPC) का गठन नहीं किया है। फिर भी, इस मामले से संबंधित कुछ मुद्दे सर्वोच्च न्यायालय के अधीन हैं। जिसका हम इंतजार कर सकते हैं।
आतंकवाद:-
यदि इस सरकार का आतंकवाद की समस्या पर विश्लेषण करते है, तो यह ज्ञात होगा कि इस सरकार में अब तक सबसे ज़्यादा आतंकी घटनाओं में वृद्धि हुई है।
वर्ष 2014 और 2018 में आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, 176 प्रतिशत आतंकवादी घटनाएं बढ़ी हैं( 14:फरवरी, 2019, इंडिया ) जम्मू-कश्मीर में हर महीने लगभग 11 सैनिक मारे गए हैं।
भारतीय सेना के अनुसार, 2014 में 222 आतंकवादी घटनाएं हुईं। वर्ष 2015 में 208, 2016 में 322,2017 में 342 में, और 2018 में 614 आतंकवादी घटनाएँ हुई हैं । इस डेटा से समझ सकते हैं है कि आतंकवादी घटनाओं मे किस तरह से वृद्धि हुई? हालांकि हमारे प्रधान मंत्री अभी भी अपने भाषण में घोषणा करते हैं कि नोट बंदी से आतंकवाद और आतंकवादियों की कमर टूट गयी।
अब प्रधानमंत्री के उन दावों का भी विश्लेषण किया जाना चाहिए जो उन्होंने कहा था कि हमारी लड़ायी कश्मीर के लिए है कश्मीरी लोगों से नही। सरकारी आंकड़ो के मुताबिक 2013 से 2018के बीच, घाटी में 1318 लोग मारे गए हैं।जिसमे 138 वे कश्मीरी हैं, जो बिल्कुल निर्दोष थे, जो कुल मौतों का 10.49% है। इस शहादत मे 338 भारतीय सेना हैं , जिनके कारण हम अपनी छत के नीचे चैन से में सोते हैं। बाक़ी मौत मे आतंकवादी शामिल हैं जिनसे हमे कोई मतलब नहीं।
मौतों पर विचार करें कि क्या 478 जानें देश के लिए इतनी सस्ती हैं?। जब उनकी माताएं अपने बच्चों की मौत की खबर सुनती होंगी तो क्या उनकी ममता नहीं चीख उठती होगी ? प्रधान मंत्री कहाँ गयी आपकी बात कि हमारी लड़ाई कश्मीरियों से नहीं है। तो क्या ये हत्याएँ जो हुई वो हमारे देश के सम्मानीय नागरिक नहीं थे? प्रधानमंत्री जी! हिंसा से लोग हिंसक होते हैं। आप सभी समझते हैं कि भारतीय सेना के आंकड़ों के अनुसार, कश्मीरी युवाओं ने पिछले दस वर्षों में सबसे ज्यादा जिहादी संगठन ज्वाइन किया है। इसलिए सभी जागरूक लोग मानते हैं। कश्मीर समस्या का हल बंदूक से नहीं निकाला जा सकता है, इसके लिए जनता का विश्वास हासिल करना और उनका दिल जीतना होगा। हालांकि, यह केवल घाटी की मौतों का उल्लेख कर रहा है। ।
मीडिया की आजादी:-
मीडिया को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता है। यह जनता की बातों को सत्ता के कानों तक पहुंचती है। सरकार की गलत नीतियों को उजागर करते हुए उसका तख्ता पलट करने में अपना सहयोग देती है।
लेकिन यह तब संभव है जब मीडिया अपने अस्तित्व को ना बेची हो । और स्वतंत्र और तटस्थ होते हुए जनता की एक आवाज बन गई हो ।
जब हम भारतीय मीडिया की 2014 के बाद समीक्षा करते हैं, तो ऐसा लगता है कि यह अपनी अस्तित्व को बीच कर सरकार की गोद में जा बैठी है। लोकतंत्र के लिए चौथा स्तंभ मानी जाने वाली मीडिया आज लोकतंत्र के लिए सबसे बड़ा खतरा बन गयी है। अफलातून (polato) ने अपने "आदर्श राज्य" से कवियों को निकाल देने को कहा था, क्योंकि वे लोगों के नैतिकता को भ्रष्ट कर देत। लेकिन मेरा मानना ​​है कि अगर कोई आज के दौर में एक "आदर्श राज्य" की अवधारणा को प्रस्तुत करता है, तो उसे अपने राज्य से मीडिया के अस्तित्व को समाप्त करना होगा। क्योंकि भारतीय मीडिया ने जिस तरह से देश और राष्ट्र के पीड़ित लोगों के मस्तिष्क को गन्दा किया है वह उल्लेख से परे है।
इस सरकार ने अपने पूरे कार्यकाल में मीडिया पर पूर्ण रूप से कब्जा कर के सिर्फ उन्ही खबरों को प्रसारित करवाया जिससे उसको लाभ मिल सके । लेकिन अगर कोई निष्पक्ष एंकर ने उनके झूठ का पर्दा फाश किया तो उसके मालिकों पर पीएमओ ने दबाव डाल कर एंकर को हटा दिया।
आज हमारा देश जिस स्थिति से गुजर रहा है, वह भारतीय लोकतंत्र का सबसे बुरा और सबसे काला दौर है। इतिहास के पन्नों में हमारे इन हालात को दर्ज किया जाएगा कि जब पूरी दुनिया तकनीक के क्षेत्र में नए नए आविष्कार कर रही थी तब हम" चौकीदार " बने फिर रहे थे। इतिहास अपने काली कलम से ये भी लिखेगी कि जब उत्तर कोरिया हाइड्रोजन बम और हांसांग - 15 बना रही थी तब हम हिंदुस्तानी मंदिर मंदिर और मस्जिद मस्जिद करते हुए अपने बीच नफरत के बीज बो रहे थे। यह भी लिखा जाएगा कि जब अन्य देश राष्ट्रीयता के नाम पर एकजुट हुए थे, तब हमने अपने देश के लोगों को गौ रक्षा के नाम पर मार रहे थे ।
जब हमारी आने वाली पीढ़ियां YouTube के तह खानों में जाएंगी, तो हमारे शव से पूछेंगी कि आपने हमारे उज्ज्वल भविष्य के लिए क्या किया? क्या आपने हमारी अच्छी शिक्षा निर्धारित की? आपने एक अच्छा अस्पताल बनवाया था? तो हमारे मृतक शरीर उन पीढ़ियों को जवाब देंगे कि हमने आपको प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कुर्सी बचाने के लिए "चौकीदार" बनाया था । हम जवाब देंगे कि हम आपको भारत से एक विशेष धर्म को खत्म करने के लिए दंगायी बनाया था ।जिसमे हमारे देश की "देश भक्ति", मीडिया ने बहुत मदद की थी । वह शाम होते ही" हिंदू मुस्लिम" के विषय पर चर्चा करने लगती थी ताकि देश की वास्तविक समस्याओं की ओर किसी का ज़हन ना जाए। यही कारण है कि बुध्दिजीवीयों के अलावा किसी ने नहीं पूछा कि गैस और तेल की कीमतों में इतनी वृद्धि कैसे हुई ? उनका मक़सद यह भी था कि कोई यह नहीं सोचने लगा कि हमारे बच्चों के स्वास्थ्य के लिए अस्पताल कहाँ हैं? और अच्छे स्कूल और विश्वविद्यालय कहाँ हैं जो अपने देश के विकास के लिए अनुकूल हों , जिससे हमारे प्रधानमंत्री की कुर्सी भंग होजाए।
सरकारी एजेंसियां:-
अब, इस पांच-वर्षीय कार्याकाल में, उन एजेंसियों पर ध्यान केंद्रित करते हैं जो भारत में केंद्र सरकार के अधीन होते हुए भी स्वतंत्र और लोकतांत्रिक हैं!
 राकेश अस्थाना और आलोक वर्मा के मामले को याद कीजिए कि जिस एजेंसी पर लोग आंख मूंद कर यह मांग करते थे कि हमारी जांचसीबीआई से कराई जाए, आज उसी विभाग के दो वरिष्ठ अधिकारियों पर रिश्वतखोरी का आरोप है।
आरबीआई के मामले को याद करके उर्जित पटेल के इस्तीफे के कारण पर ग़ौर करें! नोटबंदी के मुद्दे पर बगैर किसी -भेदभाव के विचार करें, तो मालूम होगा जैसा कि क् सूचना के अधिकार RTI के ज़रिए यह रहस्यों खुला कि यह आरबीआई की मंजूरी के बिना निर्णय लिया गया था। आईआरबीआई ने उस वक़्त तक इस पर निर्णय नहीं लिया था! आईआरबीआई ने इसकी मज़ूरी नोट बंदी के 38 दिन बाद दिया।
इस तरह से सभी एजेंसियां चाहे वे ईसी हों या ईडी सभी पर दबाव डाल कर इस सरकार ने अपने स्वयं के कर्तव्यों के अनुसार काम करवाया! उन्होंने संस्थानों की स्वतंत्रता छीन ली!
स्वतंत्र भारत के इतिहास में, जनवरी 2018 में एक घटना हुई जब सुप्रीम कोर्ट के चार सबसे वरिष्ठ जज ने बाहर आकर कहा कि "सुप्रीम कोर्ट में जो हो रहा है वह सही नहीं है" 'लोकतंत्र खतरे में है', '' सुप्रीम कोर्ट काम नहीं कर पा रही है '' ये सभी वह लोग कह रहे थे जो दूसरों को न्याय देते हैं, जो उत्पीड़ित लोगों की सुनते हैं। सलाम हो ऐसे न्यायाधीशों पर जिन्होने ऐसे अवसर पर विरोध जताया। उन्होंने स्वयं कहा कि हम ऐसा इसलिए कह रहे हैं ताकि आने वाली पीढ़ियां हमें क्षमा कर सकें कि जो हुआ उसमें हम शामिल नहीं थे।
किसानों की आत्महत्या:-
सरकार ग़रीबी का दावा करती है और खुद को गरीबों का मसीहा बनाती है। वह भारत से गरीबी हटाने की बात करता है, जबकि उसी सरकार में ज्यादातर किसानों ने आत्महत्या की है। चाहे वह महाराष्ट्र या तमिलनाडु का किसान हों ? चाहे वह मध्य प्रदेश का गरीब किसान हो या राजस्थान, यूपी और बिहार का किसान हो, सभी ने सरकार से निराश होकर ने अपने जीवन का उपहार दे दिया!
एक आंसू भी हुकूमत के लिए खतरा है
तुमने देखा नहींआंखों का समंदर होना
दलितों और अल्पसंख्यकों में डर का माहौल :-
यह बात जग ज़ाहिर है कि जैसे ही यह सरकार भारत में आई, जगह-जगह भीड़ के हमले की बात आने लगी! वे एक विशेष जाति और धर्म के लोगों को अपना निशाना बनाते और मौत के घाट उतार देते ।दादरी,झारखंड राजस्थान आदि की घटनाओं को याद कीजिए कि कैसे भीड़ ने अल्पसंख्यकों वा दलितों की हत्या की। इन घटनाओं में "भगवा आतंकवादियों" ने लोगों को पीटा और कानून को अपने हाथ में लेकर इसका मजाक में बना डाला ।.
देखो गे तो हर मोड़ पे मिल जाएंगी लाशें
ढूंढो गे तो इस शहर मे क़ातिल ना मिलेगा
वास्तव में, हम कह सकते हैं कि जो समस्याएं देश की विकास के लिए सहायक थीं, सरकार उसको नज़रअंदाज़ करके हिन्दुओ को मुसलमानों से लड़ा कर और उनमें उन्माद फैला कर अपने सत्ता की रोटी सेंकती रही ।
वह अपनी सरकार की विफलता के लिए पाकिस्तान, मुस्लिम और नेहरू को ज़िम्मेदार ठहराती रही। लेकिन भारत के निर्दोष लोग उनके दोहरे चेहरे की पहचान नहीं कर सके। आज भी, ये लोग सरकार की विफलता को नजरअंदाज करके "उनके लिए काम कर रहे हैं। और" मै भी चौकीदार "में शामिल हो कर उनके लिए नारे लगा रहे हैं। लेकिन अगर यही अपने परिवार की अर्थव्यवस्था, रोजगार, स्वास्थ्य के लिए अस्पताल, बच्चों की अच्छी शिक्षा में वृद्धि सस्ते स्कूलों और कॉलेजों आदि की समस्याओं पर विचार करें तो वे इन से दुखी हो जाएं गे और फिर इस अत्याचारी और झूठी सरकार को जड़ से उखाड़ फेंकने का संकल्प ले लेंगे । लेकिन, नहीं करेंगे! क्योंकि कार्ल मार्क्स ने कहा था कि धर्म एक ऐसा अफीम है जिसे किसी को भी पिला कर मदहोश किया जा सकता है। मोदी ने इसी अफीम को भारतीय नागरिको को पिला रक्खा है , लेकिन जब भी नशे में धुत्त लोगों के सर से इस नशे का खुमार उतरेगा , उसी समय, सरकार की कुर्सी हिलने लगे गी।
कुछ समय बाद जब भी हम ठंडे दिमाग से सरकार के काम-काज की समीक्षा करेंगे तो हमारे हाथ में निराशा के अलावा कुछ भी हासिल नहीं होगा। अब सरकार हर मोर्चे पर असफल है । DEMONITIZATION हो या जीएसटी सभी की विफलताएं सामने आ चुकी हैं। यही कारण है कि अब ये "उपलब्धियां" भाषणों से गायब हैं।
कुर्सी है, तुम्हारा ये जनाज़ा तो नहीं है
कुछ कर नही सकते तो उतर क्यों नही जाते
अब आचार संहिता लागू हो गई है। इसके कारण राजनीतिक सभाओं और भाषणों का दौर शुरू है जिसमे सरकार अपनी तमाम असफलताओं को विपक्ष के सर दे रही है। इसलिए भारतीय लोगों को बार-बार इस पर विचार करने की ज़रूरत है । आवश्यकता है उन झूठे चेहरों को पहचानने की जो अपना असली चेहरा चुनाव के बाद दिखाते हैं। ऐसे ही चेहरों के बारे में निदा फाज़ली ने कहा था :
हर आदमी में होते हैं दस बीस आदमी
जिस को भी देखना हो कई बार देखना
इसलिए, बहुत सोच-विचार, बेहतर और संगठित योजना के साथ जनता को इस बार मतदान करना होगा।

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