फासीवादों के चेहरे पर सद्भावना का तमाचा
लेकिन बंगाल में आबादी का समीकरण और उनकी सामाजिक दशा देख कर लगता है कि योगी जी का ये फ़ार्मुला फ़ेल है। यहाँ मामला बिलकुल अलग है। यहाँ मालदा और मुर्शिदाबाद में मुसलमानों की आबादी 60% से ज़्यादा है मगर यहाँ कभी दंगा नहीं होता और यहाँ हिन्दू भाई मुसलमानों के बीच ख़ुद को सुरक्षित पाते हैं तथा उन्हें मुसलमानों के बीच रहने में कोई असुविधा नहीं है।
यहाँ मुसलमानों का प्रतिशत ज़्यादा है शायद इसी लिए दंगें न के बराबर होते हैं। दंगा न होने का क्रेडिट साम्यवादी बंधु लेते हैं जो कि बिलकुल ग़लत है। इसमें कम्युनिस्ट भाइयों का कोई योगदान नहीं। क्योंकि मुसलमान सामाजिक व आर्थिक रूप से भले ही पीछे हैं या सरकारों द्वारा पीछे धकेल दिए गए हैं मगर फिर भी उनमें इतनी दीनी समझ है कि दूसरे धर्म व आस्था का सम्मान करते हैं और पड़ोसी या साथ रहने वाला जो भी हो उसकी इज़्ज़त और हिफ़ाज़त को सर्वोपरी रखते हैं।दूसरी तरफ़ आबादी अधिक होने के बावजूद मुसलमानों की आर्थिक व सामाजिक दशा दंगों में होने वाले नुकसान से भी कहीं अधिक है। ऐसे में किसी विशेष धर्म की आबादी से डराने का फ़ार्मुला यहाँ व्यर्थ साबित होता है मगर दूसरी तरफ़ ये प्रश्न भी खड़ा करता है कि क्या आबादी का आँकलन दंगों से या डर से ही होगा? क्या किसी आबादी की तुलना विकास की दृष्टि से नहीं की जानी चाहिए? इन सभी फ़ार्मूलों को देखकर यही समझ आता है कि चाहे योगी जी का मुस्लिम आबादी पर अद्भुत अनुभव हो या साम्यवादी बंधुओं की इंक़लाबी राजनीतिक विचारधारा, सभी समान नज़र आती है। देश के विकास के लिए ये अनुभव और विचारधाराएँ कितनी महत्वपूर्ण हैं इसका अंदाज़ा आप ख़ुद लगा सकते हैं। लेखक:- मसीहुज़्ज़मा अंसारी

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