निरंकुष डाॅक्टर पर लगे क़ानून का अंकुष!

|

आम आदमी प्राइवेट अस्पताल में जाते हुए उस तरह कंपकंपाता है, जैसे कसाई की छुरी देख कर बकरा घबराता है। सरकारी अस्पतालों की उदासीनता के चलते ना चाहते हुए भी प्राइवेट अस्पताल में जाना ही पड़ता है। पिछले हफ़्ते प्रसिद्ध साप्ताहिक समाचार पत्र के वरिश्ठ लेखक मोहम्मद असग़र की बेटी को खाँसी, ज़ुकाम की शिकायत हुई तो जामिया नगर के एक अस्पताल में दाखिल कराना पड़ा, भर्ती करते वक़्त उन्होंने एक दिन का खर्च दो हज़ार रुपए बताया, पूरे चैबीस घण्टे पूरे भी नहीं हुए थे, यह कह कर बच्ची को डिस्चार्ज कर दिया कि बच्ची की हालत सीरियस है, उन के पास बच्चों का वेंटिलेटर नही है। और 22 घण्टे की फीस का बिल बना दस हज़ार रुपए। वह खड़े अपने हालात पर रो रहे थे, एक तरफ़ उनकी गोद में न्यूमोनिया की मरीज़ बेटी थी, दूसरी तरफ़ बिना इलाज के दस हज़ार रुपए उनसे लूट लिए गऐ। बच्ची की हालत अगर ऐसी थी कि वह एक रात भी उसे ढंग से नहीं रख सकते थे तो उन्होंने बच्ची को एडमिट ही क्यों किया था, ज़ाहिर है, पैसे की उगाही के लिए। अभी कुछ दिन पहले गुरुग्राम के एक मशहूर अस्पताल में डेंगू के इलाज के लिए एक हफ्ते में अट्ठारह लाख रुपए का बिल बना दिया गया था।
उस लिहाज़ से तो वह कम ही लुटे थे। अब वह अपनी बच्ची को लेकर दिल्ली के मशहूर कलावती अस्पताल ले गए, वहां डॉक्टर की बात सुन कर कलेजा मुंह को आ गया, डॉक्टर साहब ने फ़रमाया कि बच्ची को तुरन्त वेंटीलेटर की ज़रूरत है, हमारे पास वेंटीलेटर पांच साल की उम्र तक के बच्चे के लिए हैं, यह बच्ची साढ़े पांच साल की है। इसलिए कोई वेंटीलेटर खाली नही है।
हाथ से बलून फुला सकते हो, तो एडमिट करवा दो, लेकिन उस में फेफड़ा फट सकता है। बेहतर यह है कि किसी प्राइवेट अस्पताल में ले जाओ। अब कौन ले जाए, कहाँ ले जाए, बिना पैसे के, कैसे ले जाए। ऐसी स्थित में एक विकल्प यह निकल कर आता है, कि पहले से ही परिवार के लोगो का हेल्थ इंष्योरेंस करवा लिया जाए। लेकिन इंश्योरेंस कंपनी और प्राइवेट अस्पतालों की मिलीभगत या फिर यूं कहिए कि टेलर-प्लान इलाज की शर्तों को इतना जटिल बना देते हैं कि जिस बीमारी का इलाज हमें करवाना है, वह रिस्क कवर में नही आता, और जो इलाज हम ने करवा लिया उस का भारी भुगतान हमें अपनी फटी जेब से ही करना होगा। असप्तालो में साधारण मरीज़ का रेट कार्ड अलग है, पैनल हॉस्पिटल का रेट कार्ड अलग है, और इंश्योरेंस लिए हुए मरीज़ों का रेट कार्ड अलग है।

0 comments

Leave a Reply