“कस्तूरबा गाँधी विद्यालय की लड़कियों से नहीं मिलती तो ज़िंदगी में बहुत कुछ सीखना रह जाता”

By India Fellow Social Leadership Program

मुझे कस्तूरबा गाँधी बालिका विद्यालय से जुड़े लगभग 4 महीने हो गए हैं। पहले दिन जब मैं आंचल, प्रिया, स्मृति और ममता के साथ विद्यालय गई थी, तब बच्चियों का उत्साह देखकर मैं भी सकारात्मक उर्जा से भर गई थी।

वे बाहर से आए व्यक्तियों को बहुत स्नेह और सम्मान देते हैं। कई बार मन में आया कि क्या वहा रुक सकती हूं? क्या उन्हें और जानने का मौका मिल सकता है? क्योंकि जब भी किसी सेशन के दौरान गई, तब उनसे बात करने का ज़्यादा मौका नहीं मिला।

 तस्वीर, फोटो साभार- Flicker

पहली बार कस्तूरबा विद्यालय में रुकने का मौका मिला

खैरा गाँव के कस्तूरबा विद्यालय में अध्यापकों से थोड़ी बहुत बातचीत होने लगी थी। कुछ दिन पहले उन्होंने कहा आप हमारे साथ रुक सकती हैं। फिर पिछले महीने 2 अक्टूबर 2019 को वहां पहली बार रुकने का मौका मिला। i-Saksham के स्कूल कार्यक्रम का एक हिस्सा होने के नाते मैंने सोचा था कि कुछ बातों का खास ध्यान रखूंगी। जैसे,

  • बच्चियों को बेहतर जानना
  • उनका आपसी सम्बन्ध समझना और
  • शिक्षक व बच्चियों के एक दूसरे के प्रति स्वभाव पर ध्यान देना।

इन सारी बातों के साथ एक और बात मुझे अच्छे से याद थी, “make friends in your community” यानी कि अपने समुदाय में दोस्त बनाओ। इस पर मेरी मेंटर अनुपमा हमेशा ज़ोर देती हैं।

यह सब सोच कर मैं वहा अपनी साथी स्मृति के संग पहुंच गई। उस दिन स्मृति का स्कूल में सेशन था लेकिन जब हम पहुंचे तो हमने अलग ही माहौल पाया। दुर्गा पूजा में ज़्यादा दिन नहीं बचे थे, जिस वजह से कुछ बच्चियों के अभिवाभाक उन्हें ले जाने आये थे। सभी बच्चियों का पढ़ने में मन कम और मज़े करने में ज़्यादा था। स्मृति ने उस हिसाब से एक गतिविधि प्लान की।

विनीता से मेरी पहली मुलाकात

मैंने अध्यापकों के साथ कुछ वक़्त बिताया। दोपहर का 12 बज रहा होगा, हम सभी बैठे गपशप कर रहे थे और एक दूसरे को बता रहे थे कि दुर्गा पूजा के लिए बाज़ार से तथा ऑनलाइन क्या खरीददारी की गई। अचानक मैंने एक हलचल महसूस की।

सभी टीचर्स एक लड़की को, जो अभी-अभी आई थी, उसको देखकर बोल रहीं थी कि “बड़ी सुंदर लग रही हो”, “साड़ी अच्छी लग रही है, किसने दी? ससुराल वालों ने?”

प्रतीकात्मक तस्वीर

मैं बस उसे देख रही थी। उसने बैंगनी रंग की चमचमाती साड़ी पहनी थी। हाथ में चूड़ी, माथे पर लाल बिंदी, आंखों में काजल, मांग नारंगी सिंदूर से भरी और चेहरे पर शर्मीली मुस्कान थी। उसने आते ही सभी के पैर छुए और जब मेरी तरफ बढ़ी तो मैंने हड़बड़ाते हुए कहा,

अरे, आप यह क्या कर रही हैं? मेरे पैर क्यों छू रही हैं?

मेरे चेहरे से साफ़ झलक रहा था कि मैं जानना चाहती थी यह है कौन? तभी संगीता मैम ने कहा,

अरे यह विनीता है, यही कस्तूरबा में पढ़ती थी, अब इसकी शादी हो गई है। आज यहां अपनी बहनों को पूजा के लिए ले जाने आयी है।

उसकी आयु कुछ 16-17 वर्ष होगी। मुझे थोड़ा अजीब सा महसूस हुआ और उसके बारे में और जानने की जिज्ञासा हुई। वह शायद सोच रही थी कि आज बहनों को ले जाने मिलेगा या नहीं। वह दरवाज़े के पास खड़ी थी, मैं उसके पास गई। हम दोनों एक दूसरे को बस एक मुस्कान के साथ एक टक देख रहे थे, फिर मैंने उससे पूछा कि क्या आपने अपनी मर्ज़ी से शादी की?

सच बताऊँ तो यह सवाल करते वक्त मैं उम्मीद कर रही थी कि विनीता को इससे ठेस ना पहुंचे। विनीता इधर-उधर देखते हुए कहने लगी,

दीदी बहुत मन था पढ़ने का पर मम्मी ने शादी करा दी लेकिन अभी आगे पढ़ रहे हैं, ससुराल ठीक है।

उसने बताया कि उसका कस्तूरबा का सफर कैसा रहा और बातों ही बातों में उसके जाने का समय हो गया। उस वक्त मेरे मन में बहुत सारे ख्याल चल रहे थे। बाल विवाह हमारे समाज के कुछ हिस्सों में अभी भी आम बात है जबकि यह चिंता का विषय होना चाहिए।

लड़कियों के लिए आज भी जीवन आसान नहीं

कुछ और अविभावकों से बात करके पता चला कि उनके गाँव में विद्यालय ना होने के कारण उन्होंने अपनी बच्चियों को यहां छोड़ा है। वे सभी दूर-दूर से आए थे।

कुछ लड़कियों की माँ ने अपनी दिनचर्या बताई जिससे पता चला कि प्रातः पांच बजे से रात तक वे बस काम करती हैं। कभी खेती, कभी घर-परिवार। इन सब के बीच उन्हें कभी खुद के लिए कुछ करने या सोचने का वक्त ही नहीं मिलता है। जब उन्हें बताया कि उनकी बेटियां यहां कितनी मेहनत से रह व पढ़ रही हैं, तब उनके चेहरे की मुस्कान देखने लायक थी।

काफी लड़कियां जाने वाली थी, तो हम सबने मिल कर डांस किया, खेल खेले, YouTube में राइम देखी और ध्यान किया। ध्यान के बाद जब उनसे पूछा कि “आपके मन में क्या चल रहा था?”, तब सभी शांत थे। मैंने देखा कि वे एक दूसरे को कुछ बोल रहे हैं, तो लगा कि कुछ तो साझा करना चाहते हैं।

फिर उनसे पूछा,

आप में से किन-किन का कुछ बोलने का मन था पर किसी कारण से आपने अपने मन की बात नहीं रखी? आप हाथ खड़े कर सकते हैं, मैं आगे कुछ सवाल नहीं करूंगी।

कुछ ने हाथ उठाए। हमने उनसे अपने स्थान पर खड़े होने का आग्रह किया और बैठी बच्चियों से पूछा कि अगर हमारे कुछ साथी कुछ बोलना चाहते हैं, तो हमें क्या करना चाहिए। उन्होंने कहा चलिए एक बार फिर कोशिश करते हैं। ये अपनी जगह खड़े होकर अपनी बात कह सकती हैं।

हम सभी ने एक-एक साथी को बोला “you can do it”,“तुम यह कर सकती हो”। हम यह लगातार बोलते रहे और एक-एक कर बच्चियां आगे आकर अपने मन की बात हम सभी के साथ रखती गईं। यह सभी के लिए एक अच्छा मोमेंट था।

प्रतीकात्मक तस्वीर, फोटो साभार- Flicker

सोने से पहले ललिता से बातें

रात होने लगी थी, हम सभी ने खाना खाया और सभी सोने की तैयारी में लग गए। यहां सभी लड़कियां अपने सारे काम खुद करती हैं। सुबह 5 बजे से इनका दिन शुरू होता है और रात 10 बजे तक सभी सो जाते हैं।

सोने से पहले मुझे ललिता से बात करने का मौका मिला। वह आगे चलकर अपने माता-पिता का नाम रौशन करने और ज़िन्दगी में कुछ बड़ा करने का सपना देखती है। वह अभी कक्षा 8 में है और उसे पढ़ने का बहुत शौक है, इतना कि एक बार उसने ध्यान से पढ़ने के लिए रात का खाना भी नहीं खाया।

ललिता नियमित रूप से डायरी लिखती है। अब अंग्रेज़ी में भी लिखने लगी है और यह बताते वक्त उसके चेहरे पर अलग ही उत्साह था। सुबह हुई और मेरे जाने का वक्त आ गया पर इस एक दिन में बहुत कुछ देखने, सुनने, सुनाने और सीखने को मिला। यह मेरी कम्यूनिटी के साथ पहली रात थी।

 

 

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