मुफ़्त बिजली: एक बेहतर क़दम
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मनुष्य की आवश्यकताओं में रोटी कपड़ा और मकान का स्थान बुनियादी सुविधाओं में आता है। लेकिन दिल्ली के सांस घोंटू वातावरण में, जहाँ ग़रीब इंसान एक छोटी सी झुग्गी या एक कमरे के फ़्लैट में सपरिवार रहता है, वहां सांस लेने के लिए बिजली के एक अदद पंखे की ज़रूरत होती है। अर्थात दिल्ली में रोटी से भी पहले सांस की आवश्यकता है। क्योंकि जनसंख्या घनत्त्व अधिक है, और रहने का स्थान कम है। सामान्यतः एक कमरे में पूरे परिवार के साथ वह कम आमदनी वाले लोग रहते हैं, जो बाहर के राज्यों से आकर यहां मजदूरी करते हैं।
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Tarique Hussain Rizvi[/caption]
एक मज़दूर की एक दिन की आमदनी ब-मुश्किल तमाम चार सौ से पांच रुपए होती है, जिसे हम दिहाड़ी कहते हैं। मज़दूरी रोज़ मिलेगी ऐसा भी ज़रूरी नही है। औसत दस हज़ार रुपए कमाने वाला दिहाड़ी मज़दूर कमरे का किराया, किचन के खर्च में इतना टूट जाता है, कि दूसरे खर्च पूरे करने के लिए उस को बगलें झाँकनी पड़ती हैं।
Tarique Hussain Rizvi[/caption]
एक मज़दूर की एक दिन की आमदनी ब-मुश्किल तमाम चार सौ से पांच रुपए होती है, जिसे हम दिहाड़ी कहते हैं। मज़दूरी रोज़ मिलेगी ऐसा भी ज़रूरी नही है। औसत दस हज़ार रुपए कमाने वाला दिहाड़ी मज़दूर कमरे का किराया, किचन के खर्च में इतना टूट जाता है, कि दूसरे खर्च पूरे करने के लिए उस को बगलें झाँकनी पड़ती हैं।
ऐसे में रोटी से भी महत्त्वपूर्ण मद का खर्च यानी बिजली पर खर्च होने वाले अगर किसी के पांच- सात सौ रुपए बच जाते हैं, तो यह कल्याणकारी राज्य की मनोदशा को परिभाषित करता है। इसी को ध्यान में रखते हुए केजरीवाल सरकार ने बिजली के दो सौ यूनिट तक खर्च करने वाले परिवारों को मुफ़्त बिजली उपलब्ध करवाने का निर्णय लिया है।हालांकि भारत में मुफ़्त सामान और सेवाएं बांटने से फायदा कम नुकसान ज़्यादा हुआ है। ऐसा भी देखने में आया है कि बड़ी बड़ी बिलिं्डगों के मालिकों के पास ग़रीबी रेखा से नीचे का कार्ड उपलब्ध है, और सचमुच का ग़रीब 30 रुपए किलो वाला चावल खरीदने पर मजबूर है। राज्य सरकारों को कई मर्तबा अपने ख़ज़ानों को दिवालिया घोषित करना पड़ा किसानों के क़र्ज़ माफ कर के। फ्री की राजनीति अपनाने में कोई हर्ज नही है, अगर उपलब्ध संसाधन के समानुपात में खर्च किया जाए। मुम्बई दिल्ली नोएडा सब से ज़्यादा टैक्स की अदायगी करने वाले शहर हैं, लेकिन यदि मुंबई की बरसात मुम्बई को बहा ले जाए, दिल्ली में एमसीडी कर्मचारियों को कई कई महीने का वेतन ना मिले, कम बजट ज़्यादा खर्च की दुहाई दी जाए, तो ऐसी स्थित में मैट्रो, बिजली या किसी अन्य सुविधा को मुफ़्त करने से पहले राज्यों की आमदनी के स्रोत ढूंढने की आवश्यकता है।
कँही ऐसा भी ना हो कि एक वर्ग को सुविधा देने के लिए दूसरे वर्ग को नया इकोनॉमिक्स मॉड्यूल हाथ में पकड़ा दिया जाए, आप को याद होगा प्रति दो महीने के बाद आने वाला बिजली का बिल शीला दीक्षित के ज़माने में हर महीने किया गया, और फिर बिल सायकिल अट्ठाइस दिन की भी कर दी गई, यह ठीक उसी तरह का टेलर प्लान बनाया गया था जिस तरह लालू प्रसाद यादव ने ग़रीब-रथ ट्रेन में साइड में उपलब्ध दो की जगह 3 बर्थ कर दी थी।उस टेलर प्लान से आम जनता का फायदे की जगह नुकसान ही हुआ। इस बार भी सरकार यह ध्यान रखे कि दस प्रतिशत लोगों को लाभ पहुंचाने में नब्बे प्रतिशत लोगों का नुकसान ना हो जाए। एक संवेदनशील सरकार की ज़िमेदारी है कि ज़रूरतमंद को उस का हिस्सा पहुंचाया जाए, लेकिन ईमानदारी के साथ।

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