मोदी मैजिक का घटता जनाधार
गुजरात: गुजरात में अपनी कमज़ोरियों के कारण कांग्रेस भले ही बाज़ी नहीं पलट पायी, लेकिन मतदाताओं ने पिछली बार से डेढ़ दर्जन ज़्यादा सीटें देकर साफ कर दिया है कि वे ‘अपने’ प्रधानमंत्री के ‘कांग्रेस मुक्त भारत’ के आह्वान को कान नहीं दे रहे|
जनादेशों को हमेशा सरल रेखा में नहीं समझा जा सकता. प्रतिद्वंद्वी पार्टियां हर हाल में जीतने को आतुर हों और किसी भी लोकतांत्रिक मूल्य के सिर पर पाद-प्रहार से परहेज न कर रही हों, तब तो और भी नहीं.
लेकिन न्यूज चैनलों ने नेताओं को इन्हें सरल रेखा में ही समझने व समझाने की ऐसी लत लगा दी है कि गुजरात व हिमाचल प्रदेश विधानसभा चुनावों के नतीजों के भाजपा के पक्ष में नजर आते ही, कई महानुभाव इस निष्कर्ष पर पहुंच गये हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का जादू बरकरार है और राहुल गांधी की पदोन्नति भी कांग्रेस की हार के सिलसिले को तोड़ने में नाकाम रही है.
बेहतर होता कि वे नतीजों के पक्ष-विपक्ष का सम्यक विश्लेषण करते और मतदाताओं के उन संकेतों को संयत होकर समझते, जो उन्होंने इन चुनावों में भिड़ी दोनों ही राष्ट्रीय पार्टियों को एक जैसे भाव से दिए हैं.
हिमाचल प्रदेश में, हम जानते हैं कि 1985 से ही मतदाता हर पांच साल पर सत्ता परिवर्तन करते और भाजपा के बाद कांग्रेस तो कांग्रेस के बाद भाजपा को अपनाते रहे हैं. शायद इसीलिए कांग्रेस ने यह मानकर भाजपा को वाकओवर-सा दे रखा था कि यह उसकी बारी और सारी शक्ति गुजरात में झोंक रही थी.
इस लिहाज से देखें तो हिमाचल से इस बार की उसकी बेदखली रूटीन है, प्रधानमंत्री के पराक्रम, लहर या जादू का नतीजा नहीं. ऐसा होता तो भाजपा राज्य में 2014 के लोकसभा चुनाव में हासिल उपलब्धि को दोहरा देती, जब उसने 53.85 प्रतिशत मत हासिल कर राज्य की चारों सीटें अपने नाम कर ली थीं.
प्रधानमंत्री और उनकी सरकार का पराक्रम तो उनके गृहराज्य गुजरात में भी कोई चमत्कार नहीं कर पाया है, लोकसभा चुनाव के उनके करिश्मे में जिसके तथाकथित माॅडल के प्रचार का भी कुछ कम रोल नहीं था.
वहां कांग्रेस को खत्म मानकर उन्होंने अपनी पार्टी के अध्यक्ष अमित शाह के साथ मिलकर डेढ़ सौ से ज्यादा विधानसभा सीटें जीतने का लक्ष्य निर्धारित कर रखा था. लेकिन वह ‘मोदी लहर’ का मिथ गढ़े जाने से पहले 2012 में हुए विधानसभा चुनावों में हासिल सीटों की संख्या भी नहीं छू पायी.
ठीक है कि वह अपना किला, सरकार या कि लाज बचाने में कामयाब रही, लेकिन किसे नहीं पता कि इसके पीछे प्रधानमंत्री का लोकसभा चुनाव जैसा करिश्मा नहीं, विकास के महानायक के ऊंचे आसन से नीचे उतरकर, दूसरे शब्दों में कहें तो ‘पुनर्मूषकोभव’ की गति को प्राप्त होकर, फिर से हिंदुत्व के उसी कीचड़ में लथपथ होना और ‘इस्लामोफोबिया’ फैलाने पर उतरना है, अपने प्रधानमंत्रित्व के शुरुआती बरसों में जिससे वे सायास परहेज बरत रहे थे.
कृष्ण प्रताप सिंह [Thewire.com]

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