मिल्लत के स्वयंघोषित डरपोक रहनुमा

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जनता दरबार:- बटला हाउस एंकाउंटर के बाद देश मेँ जब कुछ निर्दोष मुस्लिम युवाओं की गिरफ्तारियाँ होने लगीं तो मिल्लत के रहनुमा से लेकर मुस्लिम युवा सभी मायूस और सहमे हुवे थे। एलेक्ट्रोनिक मीडिया से लेकर प्रिंट मीडिया सब एक ही भाषा, एक ही स्क्रिप्ट पर काम कर रहे थे (कुछ एक मीडिया हाउस को छोड़ कर)। एक ख़ास क़ौम को कटघरे मेँ खड़ा किया जा रहा था। उस के पढ़े लिखे युवाओं को निशाना बनाया जा रहा था। फ़ासीवाद अपने भयावह रूप मेँ सामने था। ऐसे मेँ कुछ उलेमा, समाज सेवी, पत्रकार बंधु स्थिति से निपटने के लिए सामने आते हैं और जाँच की माँग करते हैं। उस वक़्त के प्रधानमंत्री कहते हैं की अगर पुलिस की जाँच होगी तो उसका मनोबल गिर जाएगा। पुलिस का मनोबल बढ़ाने के लिए मुस्लिम युवाओं का मनोबल गिराया जा रहा था। लोगों के संघर्ष से धीरे-धीरे स्थिति सामान्य हुई और खौफ़ का माहौल कम हुआ मगर गिरफ्तारियाँ अब भी जारी थीं और कुछ वर्षों तक लगातार जारी रहीं।
ऐसे वक़्त मेँ मिल्लत के रहनुमा होने का दम भरने वालों का ये कर्तव्य था कि वो अपने ख़ानकाहों से बाहर आयें और मिल्लत के जवानों मेँ कॉन्फ़िडेंस पैदा करें, उन्हें मायूसी से बाहर निकालें, उन्हें हौसला दें, उन्हें उम्मीद की रौशनी दिखाएँ और साथ ही जो गिरफ़्तार बेक़सूर नौजवान हैं उनके लिए क़ानूनी लड़ाई लड़ें। कुछ उलमा, और तंजीमेँ ये काम कर भी रही थीं मगर उनमेँ सलमान नदवी शामिल नहीं थे।
यहाँ तक कोई मसला नहीं था, शामिल न हों तो भी ठीक है मगर उस से आगे बढ़ कर सलमान नदवी साहब मुस्लिम संगठनों और उसके नौजवानों को आतंकी बताने मेँ व्यस्त थे। कई बार इन्होंने मुस्लिम तंज़ीमों के नौजवानों को जो समाज मेँ प्रेम और सौहार्द के लिए काम करते हैं उन्हे आतंकी और तशद्दुद पसंद कहने मेँ परहेज़ नहीं किया। क्या ऐसे लोगों को मिल्लत का रहनुमा कहेंगें आप? जब मुल्क में निर्दोष मुस्लिम युवाओं की गिरफ़्तारी का दौर हो उसमें ऐसी बातें कह कर मिल्लत का क्या भला करना चाहते हैं ? या किसे फ़ायदा पहुँचाना चाहते हैं? आप के अवसरवादी आँसू क्या इसका जवाब देंगें?
ख़ालिद मुजाहिद और तारिक क़ासमी को न्याय दिलाने के लिए लखनऊ में रिहाई मंच ने महीनों तक धरना दिया मगर मुस्लिम युवाओं के इंसाफ़ के लिए सलमान नदवी कुछ ही दूरी पर रहते हुवे भी कभी नहीं पहुँचे या कोई सहानुभूति के शब्द भी नहीं बोले। मुज़फ़्फ़रनगर के दंगों पर पीड़ितों को न्याय दिलाने में भी सलमान नदवी का कोई रोल हमने नहीं देखा।
ऐसे में अचानक बाबरी मस्जिद पर बयान देकर आप किसको गुमराह करना चाहते हैं सलमान साहब? नदवा के भोले भाले छात्रों के सामने रोकर अपनी ग़लतियों और मक्कारियों को नहीं छिपा सकते। आप की तक़रीरें बहुत अच्छी होती हैं मगर हम इस से बहलने वाले नहीं हैं। आप क़ौम के बड़े उलेमा हैं तो सवाल होगा ही। हम तो पूछेंगें कि आख़िर आप किस deal के तहत सामने आए हैं ? -मसीहुज़्ज़मा अंसारी

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