मीडिया के कैमरे के साथ जागता और सोता इंसानी ज़मीर
ज़रा कल्पना कीजे कि एक ऐसे मुल्क में जहां 30 करोड़ से अधिक लोग भुखमरी का शिकार हों वहां दूसरों की नक़्क़ाली में ख़ुशहाली का मंत्रालय क़ायम करने का क्या मतलब है।देश के अन्य हिस्सों में रोज़ाना भूख से ऐसी दर्जनों मौतें होती हैं लेकिन हुकूमत और समाज तब तक नहीं जागता जब तक मौतें अख़बारात के पन्नों पर जगह नहीं पाती हैं । फिर शुरू होता है बयान बाज़ी और सियासी इल्ज़ाम तराशियों का सिलसिला .
इसी हफ़्ते पूर्वी दिल्ली के मंडावली से एक ऐसी ही दर्दनाक ख़बर आई कि शदीद भूख से तीन बच्चीयों की मौत हो गई है । अब पुलिस टीम पूरे मामले की जांच कर रही है । दिल्ली के उप मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया कहते हैं कि ग़ुर्बत और बीमारी ने बच्चों की जान ले ली , चूँकि मामला दिल्ली का था और इस वक़्त संसद जारी है इसलिए वहां भी ये मसला बहस में आया ।
तक़रीबन 9 माह पूर्व झारखंड में इसी तरह की दिल-दोज़ घटना हुई थी जहां भूख से बेताब एक बच्ची भात भात कहती इंतिक़ाल कर गई थी ये घटना भी कई रोज़ तक मीडिया के पन्नों पर छाई रही और फिर लोग उस ख़ानदान की मदद के लिए बढे । तीसरा वाक़िया मुरादाबाद का है यहां इसी साल जनवरी में एक हादसा उस वक़्त पेश आया जब पूरा मुलक गणतंत्र दिवस की तैयारी कर रहा था ठीक इन्ही दिनों भूख से एक महिला की मौत हो गई थी । ख़बर आम होने के बाद सरकारी अमला हरकत में आया , तहक़ीक़ के आदेश दे दिए गए और फिर सियासी लीडरान के दौरों का सिलसिला शुरू हुआ पीड़ित परिवार की माली मदद के लिए लोग आगे आए ।तीनों घटनाओं में कुछ बातें एक जैसी हैं अव्वल ये कि तीनों घटनाओं में मौत की वजह भूख बनी , तीनों ख़ानदान इन्सानी आबादी में थे। तीनों अपने इर्द-गिर्द पड़ोसी रखते थे । लेकिन फिर भी उन्हें ऐसे दर्दनाक हालत से जूझना पड़ा । सोचने का मुकाम यह है कि किसी ने नहीं खबर ली. आखिर क्या वजह है कि मौजूदा इन्सानी समाज इस क़दर बेहिस हो गया है , पहले तो अपने आस-पास की कोई ख़बर नहीं रखता और बाद में ऐसे वाक़ियात पेश आने पर पीड़ित खानदान की बढ़ चढ़ कर माली मदद करने के लिए आगे आता है । जब तक जनता का ज़मीर मीडिया के कैमरे के साथ जागता और सोता रहेगा किसी भी इन्सानी समाज में ऐसे वाक़ियात नहीं थमने वाले । 125 करोड़ आबादी वाले भारत देश में क्या भारत देश में उस दिन सिर्फ वही तीन बच्चों ने ही भूख से दम तोड़ा था ? नहीं रोजाना बच्चे , बड़े सभी भूख की वजह से मौत के गाल में समा जाते है लेकिन मातम सिर्फ़ उनका ही हो पाता है जो ख़बर बनते हैं ।
मीडिया कर भी क्या सकता है ये मुम्किन ही नहीं कि इस तरह के सभी वाक़ियात ख़बर बन सकें। दरअसल मीडीया में आने वाले ये इक्का दुक्का वाक़ियात गरीबी मिटाने का दावा करने वाली हुकूमतों , समाजी तन्ज़ीमों को उनकी ज़िम्मेदारीयों का एहसास कराने का काम करते हैं ताकि आइन्दा कोई और भूख से मरने न पाए .लेकिन अभी कोई ऐसा कोई निजाम हिन्दुस्तानी समाज में नहीं बन सका है जिससे ऐसी मौतों पर क़ाबू पाया जा सके । जबकि ये मुम्किन है बस इस पर इन्सानी ख़िदमत के जज़बे से काम करने की ज़रूरत है ।किसी को कहीं जाने की ज़रूरत भी नहीं है आप जहां जिस आबादी में रहते हैं अपनी हैसियत के मुताबिक़ वहीं पर काम शुरू कर दें आपके लिए बेहतर है कि सबसे पहले अपने अपार्टमंट , मुहल्ले , पड़ोस और रिश्तेदारों पर क़रीबी नज़र रखें । आपके लिए आप के घर की महिलाओं की सक्रीय सहभागिता से पड़ोस के घरों के हालात मालूम करना आसान होगा। पहल तो करें फिर देखें . सबकी जरूरतों को अलग अलग जानने की कोशिश करें, सबकी ज़रूरतें अलग अलग हो सकती हैं किसी को राशन की ज़रूरत होगी , किसी ख़ानदान का कोई व्यक्ति किसी बीमारी से परेशान हो सकता है , किसी के लिए बच्चों के तालीमी खर्च में मुश्किल होगी , किसी घर में कोई बेटी शादी के इंतिज़ार में बैठी मिलेगी तो कोई बूढ़े माँ बाप अपने बच्चों की लापरवाई के सबब परेशान मिलेंगे। ये सभी काम प्राथमिकता की बुनियाद पर करने के हैं । अगर आपके पास ज़रूरतमंदों का डेटा होगा तो आप उनकी ख़ुद भी बेहतर मदद कर सकेंगे । आप जो कर सकते हैं कीजीए और दूसरों को भी इसी तर्ज़ पर काम करने की फ़िक्र दीजीए । समाज से गरीबी इसी सूरत में खत्म हो सकेगी ।

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