लाभ के पद मामले पर हो सार्थक बहस 

आम आदमी पार्टी के 20 विधानसभा सदस्यों को अयोग्य घोषित करने से, दिल्ली का तापमान भले ही कम हो लेकिन राजनीति का पारा चढ़ गया है। आनन-फानन में किए गए इस निर्णय पर गरमा गरम बहस शुरू हो गई है। आप के सदस्यों के विरुद्ध इस कार्रवाई का कारण 19 जून 2015 को प्रशान्त पटेल के द्वारा राष्ट्रपति को दी गई शिकायत को बताया जा रहा है। यह मामला 10 नवम्बर 2015 को चुनाव आयोग के पास पहुंचा। उस समय पार्टी के अंदर विधानसभा सदस्यों को विभिन्न समितिओं का अध्यक्ष तथा संसदीय सचिव बनाने के खिलाफ आवाज़ उठी थी I पार्टी के कई संस्थापक सदस्यों ने सलाह दी थी कि इन पदों पर शुरू से जुड़े पार्टी के हितेषी सदस्यों को नियुक्त किआ जाये I परन्तु अरविन्द केजरीवाल, गोपाल राय, मनीष सिसोदिया तथा पी ऐ सी के दूसरे सदस्यों ने कोई धियान नहीं दिया और उन की आवाज़ दबा दी गयी I दिल्ली विधानसभा के 20 सदस्यों की सदस्यता समाप्त होने पर बीजेपी के वरिष्ठ नेता यशवंत ने ट्वीट किया  "आम आदमी पार्टी के 20  विधानसभा सदस्यों को अक्षम करने का फैसला प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत के खिलाफ है I कोई सुनवाई नहीं, उच्च न्यायालय के निर्णय का इंतज़ार नहीं, क्या यह बुरी तुग़लक़ शाही नहीं है ?"  "भाजपा के अन्य वरिष्ठ नेता शत्रुघन सिन्हा ने इस फैसले पर नाराज़गी ज़ाहिर करते हुए जल्द इंसाफ की उम्मीद जताई I राजग की सहयोगी शिव सेना ने आप के विधायकों की सदस्ता समाप्त किये जाने पर अपना विरोध दर्ज कराया है I जबकि कांग्रेस के अजय माकन इस पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा कि भाजपा और चुनाव आयोग ने एक प्रकार से आम आदमी पार्टी कि सहायता की है यदि यह निर्णय तीन सप्ताह पहले लिया जाता तो राज्यसभा चुनाव में यह 20 विधायक वोट नहीं देते I आम आदमी पार्टी की अल्का लांबा ने इसे राष्ट्रपति तेज़ी से लिया गया फैसला बताते हुए कहा कि उन्होंने हमारा पक्ष जानने कि भी कोशिश नहीं की I आप दिल्ली के अध्यक्ष और कैबिनेट म‌ंत्री गोपाल राय ने इस घटना को बदबख्ताना बताया उन्होंने कहा कि हमारे विधानसभा सदस्यों को राष्ट्रपति से मिलने का अवसर नहीं दिया गया I कई सामाजिक राजनैतिक हस्तियों ने चुनाव आयोग के इस फैसले को सरकार को खुश करने वाला बताया और कहा कि इस का समाज पर ख़राब असर पड़ेगा I क़ानून के जानकर इस पूरे मामले पर गंभीर चिंता व्यक्त कर रहे हैं I आप के अध्यक्ष और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने इस मामले पर अपनी पहली प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि ऊपर वाले ने शायद इसी दिन के लिए हमें 67 सीटें दी थीं I 20 सदस्यों की सदस्यता समाप्त होने के बाद भी हमारी सरकार का कोई असर नहीं पड़ेगा I उन्होंने बवाना की जनसभा में इस अन्याय के विरुद्ध साथ देने की अपील की वहीं उप मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया ने खुले पत्र में, इस मामले पर मूल प्रश्न उठाये I यह केवल दिल्ली का मुद्दा नहीं है, देश के विभिन्न राज्यों में विधानसभा के सौ से ज्यादा सदस्य लाभ के पदों पर काम कर रहे हैं I भाजपा की सरकार वाले अरुणाचल प्रदेश में 31 विधानसभा सदस्य संसदीय सचिव के पद पर काम कर रहे हैं I इसके विरुद्ध गोहाटी हाई कोर्ट का फैसला आने के बावजूद उसे यहाँ लागु नहीं किया I संविधान में संसद के लिए अनुच्छेद 102 , इसी प्रकार विधानसभाओं के लिए नियम मौजूद है I जिस के तहत किसी भी विधानसभा या संसद के सदस्य की नियुक्ति लाभ के पद पर नहीं की जा सकती I यदि कोई सदस्य ऐसी पोजीशन होल्ड करता है तो उसकी सदस्यता समाप्त हो जाएगी I सरकार के पास इससे  बचाओ की अथा शक्ति मौजूद है I वह जिस पद को चाहे क़ानून बना कर लाभ के पद की श्रेणी से बाहर कर सकती है I इस आशय के समाचार सम्पूर्ण देश से बराबर आते रहते हैं कि फलां फलां पोसिशन्स हाउस ऑफ़ प्रॉफिट की श्रेणी से बाहर कर दी गयी  हैं Iइसी के अंतर्गत नेता प्रतिपक्ष, अध्यक्ष निति आयोग, अध्यक्ष नेफेड, अध्यक्ष बंगाल औद्योगिक डेवलपमेंट कारपोरेशन, अध्यक्ष मौलाना आज़ाद फाउंडेशन, अध्यक्ष दलित सेना, अध्यक्ष अल्पसंखयक आयोग, अध्यक्ष वक़्फ़ बोर्ड, अध्यक्ष हज समिति आदि और सैकड़ों ऐसे पद हैं जो लाभ के पद की श्रेणी से बाहर हैं I आम आदमी पार्टी ने अपने 20 विधानसभा सदस्यों को  संसदीय सचिव बना दिया बाद में उन्हें मालूम हुआ कि दिल्ली के क़ानून के अनुसार केवल मुख्यमंत्री संसदीय सचिव रख सकता है . आप की गलती यह है कि उसने पहले संसदीय सचिव नियुक्त किया बाद में क़ानून बना कर उप -राज्यपाल को भेजा. तत्कालीन उप -राज्यपाल नजीब जंग उस पर हस्ताक्षर न करके राष्ट्रपति को उनकी राय के लिए भेज दिया I तत्कालीन राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी को उस पर हस्ताक्षर कर देने चाहिए थे किन्तु उन्होंने हस्ताक्षर करने से मना कर दिया I इस से केंद्र तथा राज्य के बीच सब कुछ ठीक न होने का पता चलता है . यह मामला जब उच्च न्यायालय पहुंचा तो उसने नियुक्तियों को  खारिज करते हुए अपने फैसले में लिखा क्यूंकि संसदीय सचिव बनाये जाने के विधेयक पर उप -राज्यपाल या राष्ट्रपति के हस्ताक्षर न होने से यह क़ानून नहीं बन सका इस लिए यह नियुक्तियां रद्द की जाती हैं सोचने का विषय यह है कि सदस्यों को लाभ के पद देने कि आवश्यकता क्यों होती है और क़ानून इस सम्बन्ध में क्या कहता है I संवैधानिक संशोधन के अनुसार 15% से अधिक सदस्यों को मंत्री नहीं बनाया जा सकता। सरकार अपने विधानसभा या संसद सदस्यों को व्यस्त रखने के लिए इस प्रकार के पद देती है I यह भी माना जाता है कि यदि विधानसभा या संसद सदस्यों को कोई पद दे दिया जायेगा तो वह हाउस में सरकार से कठिन प्रश्न नहीं पूछेंगे, सरकार की नीतियों या फैसलों में कमियां नहीं निकालेंगे उन्हें सरकार में अपनी भागीदारी का एहसास रहेगा I जबकि पार्टी विहिप के विरुद्ध कोई भी सदस्य नहीं जा सकता यदि कोई सदस्य विहिप का उल्लंघन करता है तो उसकी सदस्यता समाप्त हो जाएगी I हाउस ऑफ़ प्रॉफिट के मामले में सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय सर्वसम्मत नहीं हैं I उदाहरण के तौर पर ज्या बच्चन केस में न्यायालय ने कहा कि कोई वेतन लिया या नहीं लिया इसके कोई अर्थ नहीं, क्या पैसे लिए जा सकते थे, यदि पैसे के लेन-देन की संभावना है तो यह लाभ का पद माना जायेगा इसका नाम कुछ भी हो, मानदेय,  वाहन खर्च, यात्रा भत्ता या कुछ और, यहीं 2014 के केरल हज कमेटी के मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा की आउट ऑफ़ पॉकेट खर्चा लिया गया तो यह लाभ के पद की श्रेणी में नहीं आएगा और सदस्यता समाप्त नहीं होगी I आम आदमी पार्टी अदालत में इसी मामले को आधार बनाएगी I निर्वाचन आयोग ने आम आदमी पार्टी के सदस्यों की अयोग्यता के मुद्दे को जिस प्रकार निबटाया उस से कई तरह की शंकाएं पैदा होती हैं I आप का कहना था कि संसदीय सचिवों को जो नियुक्ति पत्र दिया गया था उस में वेतन न मिलने की बात साफ तौर पर लिख दी गयी थी I हमारे सदस्यों ने सरकारी कोष से एक रुपया भी नहीं लिया I संसदीय सचिवों की नियुक्ति को उच्च न्यायालय ने पहले दिन ही रद्द कर दिया था I जब नियुक्ति हुई ही नहीं तो उनकी सदस्यता कैसे जा सकती है I चुनाव आयोग ने इस मामले पर लम्बी सुनवाई की किन्तु अंत में जो सिफारिशें तैयार कीं उन पर आम आदमी पार्टी को अपनी बात कहने का अवसर नहीं दिया गया आयोग की ओर से कहा गया कि यदि आप कुछ कहना चाहे तो  लिखित जवाब दे, अगर पार्टी लिख कर नहीं देती है तो यह माना जाएगा कि उसे इस संबंध में कुछ नहीं कहना । चुनाव आयोग ने आप सदस्यों को अयोग्य ठहराने के लिए 120 पेज की सिफारिश तीनों आयुक्तों के हस्ताक्षर के साथ शनिवार को राष्ट्रपति को भेजी, जिस पर रविवार को राष्ट्रपति ने हस्ताक्षर कर दिये उसी दिन विधि मंत्रालय ने अधिसूचना जारी कर दी । इस जल्दबाज़ी से किसी बात के रहस्य में होने की शंका होती है । क्योंकि 1978 में हुए 44 वें संवैधानिक संशोधन और 1982 के औघोगिक विवाद कानून में हुए संशोधन की अधिसूचना आज तक जारी नहीं हो सकी । तो फिर आम आदमी पार्टी के सदस्यों को अयोग्य घोषित करने में इतनी तेजी क्यों दिखाई गई? यह सोचने का प्रश्न है । वह तो उच्च न्यायालय ने चुनाव आयोग को सुनवाई पूरी होने तक उप चुनाव की तारीख का ऐलान  करने से रोका है, नहीं तो अब तक शायद आयोग चुनाव की अधिसूचना जारी कर चुका होता । समय आ गया है जब लाभ के पद मामले पर सार्थक बहस हो ताकि राजनैतिक पार्टियों की आपसी खींचतान के कारण किसी विधानसभा या संसद सदस्य की सदस्यता खतरे में न पड़े।    

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