केदार नाथ जी कितना कुछ कह गए : जैन शम्सी
"रह गए जूते"
सूने हाल में दो चकित उदास धूल भरे जूते मुँहबाए जूते जिनका वारिस कोई नहीं था
चौकीदार आया उसने देखा जूतों को फिर वह देर तक खड़ा रहा मुँहबाए जूतों के सामने सोचता रहा--
कितना अजीब है कि वक्ता चले गए और सारी बहस के अंत में रह गए जूते
उस सूने हाल में जहाँ कहने को अब कुछ नहीं था कितना कुछ कितना कुछ कह गए जूते सभा उठ गई अब कुछ नहीं था
केदारनाथ जी की कविता क्या थी। स्तूप के ऊपर बरगद , बरगद के ऊपर घर , घर के अंदर आदमी , आदमी के अंदर आत्मा और आत्मा के अंदर संसार। केदार नाथ जी की कविता एहि कहती है कि स्तूप को बचाना है तो संसार को बचाओ। किला को बचाना है तो उस मैले से जगह जगह से चिपटे हो चले कटोरे को बचाओ जिस में दाल न हो तो संसार में काल आ जाये। केदार नाथ की इस कविता के साथ ही उन को शत शत नमन !!सिर्फ़ हम लौट रहे थे इतने सारे लोग सिर झुकाए हुए चुपचाप लौट रहे थे उसे नदी को सौंपकर और नदी अंधेरे में भी लग रही थी पहले से ज्यादा उदार और अपरम्पार उसके लिए बहना उतना ही सरल था उतना ही साँवला और परेशान था उसका पानी
और अब हम लौट रहे थे क्योंकि अब हम खाली थे सबसे अधिक खाली थे हमारे कन्धे क्योंकि अब हमने नदी का कर्ज़ उतार दिया था न जाने किसके हाथ में एक लालटेन थी धुंधली-सी जो चल रही थी आगे-आगे यों हमें दिख गई बस्ती यों हम दाखिल हुए फिर से बस्ती में
उस घर के किवाड़ अब भी खुले थे कुछ नहीं था सिर्फ़ रस्म के मुताबिक चौखट के पास धीमे-धीमे जल रही थी थोड़ी-सी आग और उससे कुछ हटकर रखा था लोहा हम बारी-बारी आग के पास गए और लोहे के पास गए हमने बारी-बारी झुककर दोनों को छुआ
यों हम हो गए शुद्ध यों हम लौट आए जीवितों की लम्बी उदास बिरादरी में
कुछ नहीं था सिर्फ़ कच्ची दीवारों और भीगी खपरैलों से किसी एक के न होने की गंध आ रही थी
लेखक: जैन शम्सी (सीनियर पत्रकार)
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