कार्टून को ही अपनी दुनिया बना लेने वाले एक कार्टूनिस्ट की कहानी
|||||||
Head To Head:- जब मैं छोटा बच्चा था तो आम बच्चों की तरह मुझे भी कार्टून देखने , कॉमिक्स पढ़ने का बहुत शौक था। मैं घर से दूर बाजार में किराये पर मिलने वाले कॉमिक्स लाता था उनको घंटो अपनी आगोश में लिए पढ़ता रहता था। उन्हीं में खोया अपनी दुनिया बसाये इस कायनात से दूर किसी और ही दुनिया में चला जाता था।
R K lakshman का कार्टून Times of India में रोज छपता था मगर इतवार को एक स्पेशल एडिशन छपता था जिसे लेने मैं साईकल चला के दूर तक जाता और खरीद कर लाता फिर घंटो उन्हें ध्यान से देखता पढ़ता और समझने की कोशिश करता रहता था।
कार्टून बनाना कैसे सीखा या ये ख्याल कहाँ से आया दिमाग मे तो इसके बहुत सारे जवाब है। पहला जवाब यह है कि मेरे अब्बू भी बहुत अच्छे कार्टूनिस्ट थे मगर यह बात न उनको पता थी न दुनिया वालों को। अब्बू किसी भी चीज़ को चुटकियों में तस्वीर में उतार देते थे। हम भाई बहन जब जिद्द करते थे तो वो कागज़ कलम ले कर यूँ ही चलते चलते कोई भी तस्वीर बना के हमें थमा देते थे और हम लोग एक दम खामोश और संतुष्ट।
फिर दूसरी चीज जिसे कह सकते है कि कार्टून बनाने की कला या रुचि मेरे अंदर पैदाइशी ही थी या यूं कह ले मेरे खून में थी। मैं बचपन से ही ड्राइंग में बाकी बच्चों से बहुत आगे था। यहाँ तक के जब मैं छटी क्लास में था तो इंटर तक के बच्चे मुझसे ड्राइंग बनवाने आते थे।
जैसा बाकी मुस्लिम समाज में है वैसे ही मेरे घर में भी कार्टून बनाने को हराम समझा जाता था तो घर से तो कभी इस बात के लिए प्रेरणा नहीं मिली कि कार्टून को अपना रोजगार बनाऊं इसी वजह से आप लोग देखते होंगे कि मैं आज भी कार्टून फ्री टाइम में बनाता हूँ जबकि पेट पालने के लिए कोई और काम करता हूँ। यह भी मेरी जिंदगी का एक अजीब ही इत्तेफ़ाक़ है।
आप लोगों ने एक बात नोट की होगी हम बच्चों को जिस काम से ज्यादा रोकते हैं वो घूम फिर के उसी काम को करते है मेरे साथ भी कुछ यूं ही हुआ। मुझे हमेशा मेरे परिवार , रिश्तेदार, आस पड़ोस, समाज ने जिस काम से रोका आज वोही मुझे उसी काम के लिए जानता है या यूं कहें उसी काम से मेरी थोड़ी बहुत जितनी भी पहचान है सब उसी से है।
मैं हमेशा से सत्ता पक्ष द्वारा मुसलमानों और दलितों पर किये जा रहे अत्याचार से चिंतित रहता था या यूं कहें मीडिया के रवैये से दुखी था क्योंकि मीडिया हमेशा से गोदी मीडिया रहा है जो मज़लूमों की आवाज़ नहीं उठाता था तो मैं बचपन से ही इस मुद्दे पर आर्टिक्ल लिखता और अखबारों में भेजता था मगर कभी छपता नहीं था फिर एक दिन एक जानने वाले साहब ने कहा के तुम अपने दिल का दर्द आर्टिकल से ज्यादा बेहतर कार्टून से प्रकट कर सकते हो तो तुम कार्टून बना के भेजो तो मैंने कार्टून बना के भेजना शुरू किया मगर उम्मीद मुताबिक वह भी नहीं छपा। तो मेरी उम्मीद की किरण एक दम बुझ गयी थी।
फिर वहां के कुछ लोकल अखबारों ने मेरे कार्टून छापने शुरू किये तो मेरे अंदर काम करने की एक नई लगन पैदा हुई। फिर कार्टून बनाने का सिलसिला जो शुरू हुआ वो आज तक थमने का नाम नहीं लिया है जिसकी इन्तेहाँ अब यह है कि मैं रोजाना कोई न कोई कार्टून जरूर बनाता हूँ।
जारी है...............(पहली कड़ी)
लेखक:- अंसार इमरान की कार्टूनिस्ट यूसुफ मुन्ना से हुई बातचीत पर आधारित
R K lakshman का कार्टून Times of India में रोज छपता था मगर इतवार को एक स्पेशल एडिशन छपता था जिसे लेने मैं साईकल चला के दूर तक जाता और खरीद कर लाता फिर घंटो उन्हें ध्यान से देखता पढ़ता और समझने की कोशिश करता रहता था।
कार्टून बनाना कैसे सीखा या ये ख्याल कहाँ से आया दिमाग मे तो इसके बहुत सारे जवाब है। पहला जवाब यह है कि मेरे अब्बू भी बहुत अच्छे कार्टूनिस्ट थे मगर यह बात न उनको पता थी न दुनिया वालों को। अब्बू किसी भी चीज़ को चुटकियों में तस्वीर में उतार देते थे। हम भाई बहन जब जिद्द करते थे तो वो कागज़ कलम ले कर यूँ ही चलते चलते कोई भी तस्वीर बना के हमें थमा देते थे और हम लोग एक दम खामोश और संतुष्ट।
फिर अब्बू जमात से जुड़ गए और so called मुस्लिम समाज के रवैये की तरह कार्टून बनाना हराम हो गया।
फिर दूसरी चीज जिसे कह सकते है कि कार्टून बनाने की कला या रुचि मेरे अंदर पैदाइशी ही थी या यूं कह ले मेरे खून में थी। मैं बचपन से ही ड्राइंग में बाकी बच्चों से बहुत आगे था। यहाँ तक के जब मैं छटी क्लास में था तो इंटर तक के बच्चे मुझसे ड्राइंग बनवाने आते थे।
जैसा बाकी मुस्लिम समाज में है वैसे ही मेरे घर में भी कार्टून बनाने को हराम समझा जाता था तो घर से तो कभी इस बात के लिए प्रेरणा नहीं मिली कि कार्टून को अपना रोजगार बनाऊं इसी वजह से आप लोग देखते होंगे कि मैं आज भी कार्टून फ्री टाइम में बनाता हूँ जबकि पेट पालने के लिए कोई और काम करता हूँ। यह भी मेरी जिंदगी का एक अजीब ही इत्तेफ़ाक़ है।
आप लोगों ने एक बात नोट की होगी हम बच्चों को जिस काम से ज्यादा रोकते हैं वो घूम फिर के उसी काम को करते है मेरे साथ भी कुछ यूं ही हुआ। मुझे हमेशा मेरे परिवार , रिश्तेदार, आस पड़ोस, समाज ने जिस काम से रोका आज वोही मुझे उसी काम के लिए जानता है या यूं कहें उसी काम से मेरी थोड़ी बहुत जितनी भी पहचान है सब उसी से है।
मैं हमेशा से सत्ता पक्ष द्वारा मुसलमानों और दलितों पर किये जा रहे अत्याचार से चिंतित रहता था या यूं कहें मीडिया के रवैये से दुखी था क्योंकि मीडिया हमेशा से गोदी मीडिया रहा है जो मज़लूमों की आवाज़ नहीं उठाता था तो मैं बचपन से ही इस मुद्दे पर आर्टिक्ल लिखता और अखबारों में भेजता था मगर कभी छपता नहीं था फिर एक दिन एक जानने वाले साहब ने कहा के तुम अपने दिल का दर्द आर्टिकल से ज्यादा बेहतर कार्टून से प्रकट कर सकते हो तो तुम कार्टून बना के भेजो तो मैंने कार्टून बना के भेजना शुरू किया मगर उम्मीद मुताबिक वह भी नहीं छपा। तो मेरी उम्मीद की किरण एक दम बुझ गयी थी।
फिर वहां के कुछ लोकल अखबारों ने मेरे कार्टून छापने शुरू किये तो मेरे अंदर काम करने की एक नई लगन पैदा हुई। फिर कार्टून बनाने का सिलसिला जो शुरू हुआ वो आज तक थमने का नाम नहीं लिया है जिसकी इन्तेहाँ अब यह है कि मैं रोजाना कोई न कोई कार्टून जरूर बनाता हूँ।
जारी है...............(पहली कड़ी)
लेखक:- अंसार इमरान की कार्टूनिस्ट यूसुफ मुन्ना से हुई बातचीत पर आधारित

0 comments