करोडों की मस्जिद और उपयोग चौबीस घंटों में केवल तीन घंटे; रुकें,सोचें और फैसला करें

मस्जिदों को बस नमाज़ पढ़ने की ही जगह न बनाये वहाँ ग़रीबो के खाने का इंतज़ाम हो, डिप्रेशन में उलझे लोगो की काउसंलिंग हो, उनके पारिवारिक मसलों को सुलझाने का इंतज़ागम हो, मदद मांगने वालो की मदद की जाने का इंतेज़ाम हो। जब दरगाहों पर लंगर चल सकते हैं तो मस्जिदों में क्यों नहीं, और दान करने में मुस्लिमों का कहां कोई मुकाबला है, हम आगे आएंगे तो सब बदलेगा।
मस्जिदों में एक शानदार लाइब्रेरी हो। जहाँ पर इस्लाम की हर किताब के साथ-साथ दूसरे मज़हब की किताबें भी पढ़ने को उपलब्ध हों। ई-लाइब्रेरी भी ज़रूर हो। बहुत हो गये मार्बल, झूमर, एसी और कालीनों पर खर्च अब उसे बंद करके कुछ सही जगह पैसा लगायें समाज या कौम के पढ़े लिखे लोगों का इस्तेमाल करें
डॉक्टरों से फ्री इलाज़ के लिए कहें मस्जिद में ही कही कोई जगह देकर, वकील, काउंसलर, टीचर आदि को भी मस्जिद में अपना वक्त देने को कहें और यह सुविधा हर धर्म वाले के लिए बिलकुल मुफ्त हो। इसके लिए लगभग सभी लोग तैयार हो जाएंगे, जब दुनिया के सबसे बड़े और सबसे व्यस्त सर्जन डॉ मुहम्मद सुलेमान भी मुफ्त कंसल्टेशन के लिए तैयार रहते हैं, तो आम डॉ या काउंसलर क्यों नही होंगे? ज़रूरत है बस उन्हें मैनेज करने की। Image result for masjid e nabvi

सभी काम 1400 साल पहले मदीना  की मस्जिदे नबवी में होते थे

इमाम की तनख्वाह ज्यादा रखे ताकि टैलेंटेड लोग आये और समाज को दिशा दें। मदरसों से छोटे छोटे कोर्स भी शुरू करें कुछ कॉररेस्पोंडेंस से भी हों .  ट्रस्ट के शानदार हॉस्पिटल और स्कूल खोले जहाँ सभी को ईमानदारी और बेहतरीन किस्म का इलाज और पढ़ने का मौका मिले, बहुत रियायती दर पर . इनमे से एक भी सुझाव नया नहीं है,सभी काम 1400 साल पहले मदीना में होते थे,हमने उनको छोड़ा और हम बर्बादी की तरफ बढ़ते चले गए और चलते जा रहे हैं। रुकें,सोचें और फैसला करें  

0 comments

Leave a Reply