जातिवादी मानसिकता विपक्ष की एकता के लिए बाधक तो नहीं!
मार्क्सवाद के अनुसार भी पूँजीवाद के बाद का दौर समाजवाद का है तो फिर वामपंथी और समाजवादी एक साथ क्यूँ नहीं आ रहें हैं!
कहीं दोनों तरफ से विचारधारा की धारा को जातिवाद रूपी चट्टान ने रोक तो नहीं रखा है!
यहाँ "लोहे को लोहा काटने" वाला मुहावरा उल्टा पर जाएगा बल्कि एक लोहा दूसरे लोहा पर धार ही चढ़ाएगा! और उसी जातिवाद रूपी धारदार हथियार से ग़रीब, मज़दूर, किसान, एवं शोषित, वंचित, दलित और मुसलमान को आपस में लड़ाकर उनके अधिकार को टुकड़ों में काटा जाएगा!
किसी भी चुनाव से पहले उपजे फतिंगा रूपी नेताओं के फड़फड़ाहट से सावधान रहने की आवश्यकता है!
किसी विशेष जाति में जन्म लेना मनुष्य के अधिकार क्षेत्र से बाहर की बात है पर अपने ही जाति के लोगों का हमेशा बचाव और गुणगान करना एक स्वघोषित बुद्धिमान को कुपढ़ बुद्धिजीवी बनने की प्रक्रिया में लगा देता है!
दल बदल रूपी राजनैतिक कैंसर ने हर दल को अन्दर से जकड़ लिया है! अब समस्या यह हो गई है कि एक दल से छलांग लगाकर दूसरे दल में नेतागिरी कर रहे दलालों को यह हज्म ही नहीं हो रहा है कि सारे विपक्षी दल एक साथ जमीनी स्तर पे आपस में जुड़कर काम करे! इसीलिए छुटपुँजिऐ नेताओं ने अभी से ही आपस में विवाद की चिंगारी लगाना प्रारम्भ कर दिया है!
मसलन केरल में कांग्रेस और वामदल कैसे साथ आएंगे; वहीं पश्चिम बंगाल में TMC और Left का कैसा गठबंधन होगा! जातिवाद, परिवारवाद और क्षेत्रवाद का क्या होगा?
इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि हाल के दिनों में विपक्ष के नेताओं के इर्द गिर्द सैद्धांतिक से ज़्यादा व्यवहारिक लोगों ने घेराबंदी कर रखा है! जिनसे नैतिकता की कामना व्यर्थ है! यही स्वघोषित नेतागण जिस आम को खाते हैं, ख्याति पाने के लिए उसे ही खट्टा बताते हैं! मतलब अपने दल या संगठन के लिए काम धाम साढ़े बाईस, और किसी पे कोई भी लांछन लगा के अपना अस्तित्व बनाए रखना ही कुछ लोगों का दिनचर्या हो गया है ताकि आने वाले दिनों में किसी तरह बेरोजगारी दूर हो जाए! जबकि योग्यता से अधिक का लालच मनुष्य को चमचालय का शिष्य बनाता है, जहाँ के गुरु अपने शिष्यों का ताउम्र दोहन करते रहते हैं!
#राज्यमूलमिन्द्रियजम:

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