जानिए क्या होती है जमानत और जमानत कितने प्रकार की होती है ? what is bail ?
दोस्तों अक्सर आपने Bail या जमानत शब्द सुना होगा ,हम में से बहुत से ऐसे दोस्त होंगे जिन्हें अभी तक ये पता नहीं होगा कि जमानत क्या होती है ? और जमानत कितने प्रकार की होती है ? तथा किस अपराध में जमानत मिलती है और किस अपराध में जमानत नहीं मिलती ?
अगर आपको झूठे केस में फंसाया जा रहा है या आपने कोई अपराध किया है और पुलिस आपको गिरफ्तार करने जा रही है तो क्या जमानत बिना कोर्ट जाये पुलिस थाने से भी मिल सकती है ? या फिर कोर्ट जाकर ही जमानत मिलेगी और अगर कोर्ट से जमानत मिलेगी तो कोर्ट से जमानत कैसे मिलेगी ? जमानत लेने के लिए जमानती को गारंटी के तौर पर क्या क्या देना होता है ? तथा किन शर्तों को पूरा करना होता है ? ये ऐसे बहुत सारे सवाल हमारे दिमाग में घूमते हैं तो आज हम आपको इन्हीं सारे सवालों के जबाव देने की कोशिस करेंगे.
आईये तो सबसे पहले हम जानते हैं कि जमानत क्या होती है ?
अगर किसी व्यक्ति ने कोई अपराध किया हो या फिर उसे झूठे केस में फंसाया जा रहा हो और वो व्यक्ति या तो पुलिस द्वारा गिरफ्तार कर लिया गया हो या गिरफ्तार होने वाला हो तो इस दशा में जेल जाने से बचने के लिए या फिर जेल से बाहर आने के लिए पुलिस या कोर्ट से आदेश लेने की प्रक्रिया को ही जमानत कहते हैं .
अब सवाल जमानत कितने प्रकार की होती है ?
जमानत 3 प्रकार की होती है
1. जमानतीय अपराध में Bail
2. अजमानतीय अपराध में bail
3. अग्रिम जमानत या एन्टीसिपेट्री बेल
जमानत के अनुसार अपराध
1. Bailable Offence (जमानती अपराध)
2.Non Bailable Offence (गैर जमानती अपराध)
3. Anticipatory Bail (अग्रिम जमानत)
1. Bailable Offence (जमानती अपराध) – भारतीय दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 2 के अनुसार – ज़मानती अपराध से अभिप्राय ऐसे अपराध से है जो –
- (क) प्रथम अनुसूची में ज़मानती अपराध के रूप में दिखाया गया हो , या
- (ख) तत्समय प्रविर्त्य किसी विधि द्वारा ज़मानती अपराध बनाया गया हो , या
- (ग) गैर-ज़मानती अपराध से भिन्न अन्य कोई अपराध हो।
- (क) जमानतीय नहीं हैं, एवं
- (ख) जिसे प्रथम अनुसूची में ग़ैर-ज़मानती अपराध के रूप में अंकित किया गया है, वे ग़ैर-ज़मानती अपराध हैं।
- (1) अपनी गाड़ी की आर. सी.
- (2) रजिस्टर्ड जमीन के पेपर या जमीन की फर्द
- (3) बैंक की F.D
- (4) इंद्रा विकास पत्र
- (5) सरकारी नोकरी होने पर 3 महीने से कम पुरानी Pay Slip तथा ऑफिस आई. कार्ड. की कॉपी इत्यादि पर कोर्ट के बताये मूल्य के अनुसार हो तो जमानत की प्रतिभूति के लिए उपयुक्त है |
- सबसे पहले अपनी एप्लीकेशन में ये जरुर लिखे की शिकायतकर्ता ने आपके खिलाफ ये झूठी F.I.R क्यों करवाई इसका कारण जरुर बताये क्योंकि कोर्ट आपको दोषी समझती है कोर्ट को ये बताना बहुत ही जरूरी होता है कि आपके खिलाफ ऐसा क्यों किया गया है|ताकि कोर्ट का सबसे पहले ये विचार सही हो सके कि हो सकता है कि F.I.R पूरी तरह से सच्ची नही है
- दूसरा आप के खिलाफ जो F.I.R हुई है उसमे से कमियाँ निकाले कि किस तरह से वह F.I.R. झूठी है जैसे कि कोई आप पर सडक दुर्घटना का आरोप लगाता है तो आप ये देखे कि आप की कार अगर आगे नही टकराई है तो लाजमी है की दूसरे ने ही आकर आप को टक्कर मारी है | अगर आपने टक्कर मारी होती तो आपकी गाड़ी का अगला हिस्सा उससे टकराता दूसरा जैसे कोई आप पर मार पिटाई का आरोप लगाये तो अपने जखम भी मेडिकल रिपोर्ट के साथ कोर्ट में दिखाए की अगर आपने उसे अपने साथियों के साथ मिल कर बुरी तरह पीटा था तो आपको चोट भी तो चोट लगी है वो कैसे लग सकती है इसका मतलब पहले लड़ाई उसने ही आप को पीट कर शुरू की थी | इसके लिए आप सी सी टी वी कैमरे की भी कोई रिकोर्डिंग हो तो उसका सहारा ले सकते हो आप अपनी लोकेशन मोबाइल द्वारा भी इसका सहारा ले सकते हो
- गिरफ्तारी होने बाद जांच एजेंसी को छोटे अपराधो में 60 दिनों में तथा जघन्य अपराधो में 90 दिन में कोर्ट में चार्जशीट दाखिल करनी होती है। इस दौरान चार्जशीट दाखिल न किए जाने पर सीआरपीसी की धारा-167 (2) के तहत आरोपी को जमानत मिल जाती है। वहीं 10 साल से कम सजा के मामले में अगर गिरफ्तारी के 60 दिनों के भीतर चार्जशीट दाखिल न किया जाए तो आरोपी को जमानत दिए जाने का प्रावधान है
- एफ.आई.आर दर्ज होने के बाद आमतौर पर गंभीर अपराध में जमानत नहीं मिलती। यह दलील दी जाती है कि मामले की छानबीन चल रही है और आरोपी से पूछताछ की जा सकती है। एक बार चार्जशीट दाखिल होने के बाद यह तय हो जाता है कि अब आरोपी से पूछताछ नहीं होनी है और जांच एजेंसी गवाहों के बयान दर्ज कर चुकी होती है, तब जमानत के लिए चार्जशीट दाखिल किए जाने को आधार बनाया जाता है। लेकिन अगर जांच एजेंसी को लगता है कि आरोपी गवाहों को प्रभावित कर सकते हैं तो उस मौके पर भी जमानत का विरोध होता है क्योंकि ट्रायल के दौरान गवाहों के बयान कोर्ट में दर्ज होने होते हैं
- अगर चार्जशीट दाखिल कर दी गई हो तो जमानत केस की मेरिट पर ही तय होती है। केस की किस स्टेज पर जमानत दी दिया जाए, इसके लिए कोई व्याख्या नहीं है। लेकिन आमतौर पर तीन साल तक कैद की सजा के प्रावधान वाले मामले में मैजिस्ट्रेट की अदालत से जमानत मिल जाती है
- अगर आप पर पहले कोई अपराधिक रिकोर्ड नही है तो वो भी बेल लेने का कारण हो सकता है आप बेल के लिए अपनी टैक्स Return या अपने पर आश्रित परिवार के लोगो या अपनी कम उम्र का सहारा ले कर भी Bail ले सकते है
- बेल या जमानत लेने में सबसे बड़ी बाधा पुलिस यानि (आई. ओ.) व सरकारी वकील होते है अगर वे आपकी बेल का ज्यादा विरोध नही करे तो भी कोर्ट आपको Bail देने का मन बन सकता है अब इन लोगो को विरोध करने से कैसे रोके ये मुझे आप लोगो को समझाने की जरूरत नही है
- कोर्ट में बैठे जज साहब भी इन्सान ही होते है और हर जज साहब का अपराधी को देखने का नजरिया अलग होता है अगर कोई जज साहब अपराधियों को Bail देने में कुछ ज्यादा रियायत देते है तो ऐसे जज साहब का समय आने पर ही Bail लगाये अन्यथा कुछ दिन ठहर कर ले | क्योकि जमानत न मिलने से तो अच्छा है कुछ दिन ठहर कर ही जमानत ले ली जाये |
- जैसे की उपर बताया गया है कि जज साहब भी इंसान होते है उसी प्रकार से Bail लेने के लिए हमेशा जज साहब का मूड देखे की कोर्ट बेल के बारे में क्या सोच रही है तथा किस प्रकार से किस बात या पॉइंट को ज्यादा पसंद करती है तो उसी प्रकार से ही आप जज साहब को समझाये मेरे कहने का मतलब ये है की Bail या जमानत मिलना या नही मिलना ये 80 प्रतिशत तक आपके वकील साहब पर निर्भर करता है कि वे किस प्रकार से कोर्ट को प्रभावित कर पाते है और Bail ले पाते है इसलिए हमेशा अच्छे व समझदार वकील साहब को ही बेल का काम सौंपें |
- बेल देने का आखिरी फैसला अदालत का ही होता है ऐसे में मामला अगर गंभीर हो और गवाहों को प्रभावित किए जाने का अंदेशा हो तो चार्ज फ्रेम होने के बाद भी जमानत नहीं मिलती। ट्रायल के दौरान अहम गवाहों के बयान अगर आरोपी के खिलाफ हों तो भी आरोपी को जमानत नहीं मिलती। मसलन रेप केस में पीड़िता अगर ट्रायल के दौरान मुकर जाए तो आरोपी को जमानत मिल सकती है | लेकिन अगर वह आरोपी के खिलाफ बयान दे दे | तो जमानत मिलने की संभावना खत्म हो जाती है। कमोबेश यही स्थिति दूसरे मामलों में भी होती है। गैर जमानती अपराध में किसे जमानत दी जाए और किसे नहीं, यह अदालत तय करता है और इसको तय करने का कोई स्टिक कानून नही है ये पूरी तरह से जज साहब के विवेक पर ही निर्भर करता है |
- जब भी आप कोर्ट जाये जो भी आपके मेडिकल के पेपर है आप के पास है उसे साथ ले कर जाये व दिखा कर बेल या जमानत का विरोध करे
- कोर्ट में पूछे जाने वाले सवालों के जवाब बहुत ही शालीनता व समझ से दे ताकि कोर्ट को ये लगे की आप सही है
- हमेशा कोर्ट में अपराधी के बाहर आने पर स्वय व बाकि गवाहों व सबूतों को प्रभावित होने का आरोप लगाये की अपराधी Bail या जमानत ले कर उसका दुरूपयोग कर सकता है
- अगर कोर्ट अपराधी को बेल दे भी दे तो आप ऊपर की कोर्ट में उसकी बेल ख़ारिज करवाने की एप्लीकेशन लगा सकते है
- सरकारी वकील व पुलिस यानि आई. ओ. पर पूरी नजर रखे अगर वे अपराधी की तरफदारी करे या उसका बेल होने में साथ दे तो आप उनकी शिकायत कर के इन्हें बदलवा भी सकते है |
- ज्यादा अच्छा हो की आप बेल या जमानत का विरोध करने के लिए अपने वकील साहब अपोइन्ट कर ले तो ज्यादा अच्छा हो

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