जनता को कीड़ा-मकोड़ा समझने वाली भारतीय पुलिस

11 अगस्त, 1954 को दक्षिण-त्रावणकोर में तमिल-भाषी लोग एक शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे थे। उनकी मांगथी कि त्रावणकोर-कोचीन के तमिल बहुल हिस्से को मद्रास राज्य में शामिल किया जाए।
इन प्रदर्शनकारियों पर पुलिस ने अंधाधुंध फायरिंग की जिससे 4 लोगों की मौत हो गई और एक दर्जन से अधिक लोग घायल हो गए। उस समय त्रावणकोर में प्रजा सोशलिस्ट पार्टी (प्रसोपा) की ही सरकार थी। मुख्यमंत्री थे- पट्टम ताणु पिल्लै। प्रसोपा के महासचिव लोहिया खुद ही जेल में थे। यूपी में सिंचाई-जल कर (नहर रेट) बढ़ाने के खिलाफ सिविल नाफरमानी की वजह से यूपी सरकार ने उन्हें फर्रूखाबाद में गिरफ़्तार कर लिया था।
लोहिया ने जेल से अपनी ही पार्टी के मुख्यमंत्री पट्टम ताणु पिल्लै को टेलीग्राम भेजा और कहा कि न्यायिक जाँच बैठाइये और खुद इस्तीफा दीजिए। रिहा होने के बाद 28 अगस्त, 1954 को इलाहाबाद में लोहिया ने कहा- “आज़ाद भारत की सरकारों को चाहिए कि वह आम भारतीयों के जीवन की भी कीमत समझे, न कि उनपर गोली चलाए और उन्हें कीड़े-मकोड़े की तरह मार डाले।” लोहिया ने आगे कहा- "आज़ाद भारत में ऐसा कैसे हो सकता है कि पुलिस अपने ही लोगों पर, निहत्थे और निरीह लोगों पर गोलियाँ चलाए?"
प्रसोपा ने जयप्रकाश नारायण से कहा कि वे इस घटना के खिलाफ एक ड्राफ्ट-प्रस्ताव तैयार करें। जेपी ने अपने प्रस्ताव में मिलती-जुलती मांगें रखीं। लेकिन अंतिम प्रस्ताव में मुख्यमंत्री के इस्तीफे वाली बात पर अस्पष्टता रह गई। पुलिस-फायरिंग के मुद्दे पर मुख्यमंत्री के इस्तीफे वाली मांग को न तो खुद मुख्यमंत्री ने स्वीकारा और न ही पार्टी के चेयरमैन आचार्य कृपलानी ने। लोहिया जैसे अक्खड़ गांधीवादी सिद्धांतों के पक्के थे। उन्होंने पार्टी छोड़ दी। अगले साल 31 दिसंबर, 1955 और 1 जनवरी, 1956 के दौरान उन्होंने नई पार्टी ‘सोशलिस्ट पार्टी’ की स्थापना की। एक लाख किसानों के साथ प्रदर्शन किया। ‘मैनकाइंड’ नाम की पत्रिका निकालनी शुरू की। ये कैसे लोग थे! पुलिस-फायरिंग की घटना पर अपनी ही पार्टी के मुख्यमंत्री से इस्तीफा मांगते थे। अपने ही नेताओं के खिलाफ न्यायिक जाँच की मांग करते थे। और जनता के साथ अन्याय होते देख पार्टी और पद को लात मार देते थे। और आज उड़ीसा, झारखंड, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और अब तमिलनाडु समेत लगभग सभी राज्यों की सरकारें और पुलिस आज़ाद भारत के नागरिकों को कीड़े-मकोड़ों से अधिक नहीं समझती। धनशालियों का दरबान बनकर खड़ी सरकारें और पुलिस किसानों, आदिवासियों, महिलाओं और जनसामान्य को जब चाहे लाठी से पीटती है और गोलियाँ दागती है। गांधी और लोहिया का नाम जपनेवाली पार्टियाँ और उनके नेता आज क्या कर रहे हैं, वह हमसे छिपा तो नहीं ही है। साभार : https://satyagrah.scroll.in/…/tuticorin-sterlite-protest-po…

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