नई दिल्ली : ( एशिया टाइम्स )पुलिस के भेष में बचपन में अपने दरवाज़े पर बहुरूपिया देख आप भी ज़रूर डर के मारे छुप गए होंगे लेकिन जामिया नगर के युवा फोटोग्राफर मोहसिन जावेद को जब पिछले दिनों इंदिरा गाँधी नेशनल सेंटर में तीन दिवसीय बहुरूपिया फेस्टिवल में शिरकत का मौक़ा मिला तो उन्हों ने बिना डरे बहुरूपियों के अनेकों रूप को कमरे में क़ैद कर लिया . इस सालाना फेस्टिवल में देश भर से ७० बहुरूपियों ने शिरकत की और इस आदिकाल के आर्ट का सुन्दर प्रदर्शन किया.
पेश है फोटो फीचर रिपोर्ट
A Behrupiya is taking a selfie at National Behrupiya Festival, By Mohsin Javed
A Behrupiya dressed as Mahatma Gandhi talking to people at National Behrupiya Festival, By Mohsin Javed
A Behrupiya is getting ready at National Behrupiya Festival, By Mohsin Javed
Sadanand Ramchandra Gavankar aged 59, a farmer by profession dressed as Idol at National Behrupiya Festival
By Mohsin Javed
A Behrupiya is getting ready at National Behrupiya Festival, By Mohsin Javed
A Behrupiya dressed as Mahatma Gandhi talking to people at National Behrupiya Festival, By Mohsin Javed
Children with Behrupiya who is dressed as Mahatma Gandhi at National Behrupiya Festivel, By Mohsin Javed
A behrupiya artist who's portraying the role of Hindu god Hanuman at National Behrupiya Festival, By Mohsin Javed
A Behrupiya dressed as Mother Teresa at National Behrupiya Festival, By Mohsin Javed
Behrupiyas dressed as Tribe at National Behrupiya Festival, By Mohsin Javed
People enjoying the National Behrupia Festival, By Mohsin Javed
A portrait of an angry Behrupiya at National Behrupiya Festival, By Mohsin Javed
आखिर में नारायण बारेठ की बी बी सी की यह रिपोर्ट ज़रूर पढ़ें
भारत में बहुरूप धारण करने की कला बहुत पुरानी है. राजाओं-महराजाओं के समय बहुरूपिया कलाकारों को हुकूमतों का सहारा मिलता था. लेकिन अब ये कलाकार और कला दोनों मुश्किल में है.
इन कलाकारों का कहना है कि समाज में रूप बदल कर जीने वालों की तादाद बढ़ गई है. लिहाजा बहरूपियों की कद्र कम हो गई है.
इन कलाकारों में हिंदू और मुसलमान दोनों हैं. मगर वे कला को मज़हब की बुनियाद पर विभाजित नहीं करते. मुसलमान बहरूपिया कलाकार हिंदू प्रतीकों और देवी-देवताओं का रूप धारण करने में गुरेज़ नहीं करता तो हिंदू भी पीर, फ़कीर या बादशाह बनने में संकोच नहीं करते.
अब्दुल हमीद दिल्ली में कई वर्षों से इस कला को प्रोत्साहित करते रहे हैं. वो कहते है, “ये कला बहुत बुरे दौर से गुज़र रही है. मेरे ख़्याल से सबसे ज़्यादा बहरूपिया कलाकार राजस्थान में ही हैं. पूरे देश में कोई दो लाख लोग हैं जो इस कला के ज़रिए अपनी रोज़ी-रोटी चलाते हैं.”
राजस्थान के सीकर के यासीन को ये फ़न अपने पुरखों से विरासत में मिला है. वो बड़े मन से इस कला का प्रदर्शन करते हैं. लेकिन उनके तीनो बेटों ने इससे हाथ खींच लिया है. बेटों का कहना है कि ‘इस कला की न तो कोई कद्र करता है और ना ही इसका कोई भविष्य है.’
यासीन कहते हैं, “हमें पुरखों ने बताया था कि बहरूपिया बहुत ही ईमानदार कलाकार होता है. राजाओं के दौर में हमारी बड़ी इज़्जत थी. हमें ‘उमरयार’ कहा जाता था. हम रियासत के लिए जासूसी भी करते थे. राजपूत राजा हमें बहुत मदद करते थे और अजमेर में ख्वाज़ा के उर्स के दौरान हम अपनी पंचायत भी करते थे. आज हर कोई भेस बदल रहा है. बदनाम हम होते हैं. लोग अब ताने कसते हैं कि कोई काम क्यों नहीं करते.”
ज़्यादातर बहरूपिया कलाकार बड़े मंचो से वंचित रहते हैं. वे फ़ुटपाथ पर अपना मजमा लगाते हैं और लोगों का मनोरंजन करते हैं. मगर पंजाब के बहरूपिया कृष्ण इससे अलग हैं. कृष्ण को ये कला यूरोप और अमरीका तक ले गई.
कृष्ण स्पैनिश और फ्रेंच की नक़ल कर लेते हैं. वो अब तक क़रीब एक दर्जन भर देशों में अपने हुनर का प्रदर्शन कर चुके हैं. लेकिन भारत में इस कला के कद्रदान के मामले में कृष्ण और यासीन के नज़रिए में कोई अंतर नहीं हैं.
कृष्ण का कहना है, ''हमारे समुदाय से कई परिवार अब इस कला से हट गए हैं. क्या करें पेट तो भरना ही होगा.”
कृष्ण कहते हैं कि बहरूपिया के 52 रूप है. जो भय पैदा कर दे वो ही बहरूपिया है. कृष्ण ने गुजरात में हिंसा का वो दौर देखा है ‘जब बस्तियां मज़हब की हदों में बंट गई थीं और सियासत या तो शरीके-जुर्म थी या फ़रार हो गई थी.’ मगर ये बहरूपिया कलाकार बस्तियों में भाईचारे का पैगाम बाँटते रहे.
अहमदाबाद के बहरूपिया बंसीलाल मोहनलाल कहते हैं, “हम इस कला को ज़िंदा रखना चाहते हैं. हम हिंदू भेस धारण कर मुस्लिम बस्तियों में जाते हैं और प्रेम और भाईचारे का संदेश देते हैं.”
नए नए रूप धारण करने के चलन का ज़िक्र महाभारत में भी है. महाभारत में भगवान कृष्ण के कई रूप धारण करने की बात है और उन्हें छलिया भी कहा गया.
मगर अब जैसे भारत में 60 साल की कहानी रुख़ से नक़ाब हटने का किस्सा बन गई हो. कभी किसी धार्मिक हस्ती का चेहरा बेनकाब होता है तो कभी किसी नेता का.
दौसा ज़िले के बहरूपिया अशोक तो सारा दोष ही नेताओं के सर मढ़ते हैं. कहते हैं कि जब सारा समाज ही भेस बदल रहा तो हमें कोई क्यों पूछेगा, नेता ही सबसे बड़े लिबास बदलने वाले हैं.
ये कलाकार जब अपना हुनर दिखाते हैं और दावा करते हैं कि वे ही असली बहुरूपिए हैं तो तमाशबीन चक्कर में पड़ जाते हैं. उन्हें लगता फिर वो कौन हैं जो ऊँचे मुकाम और मंचो पर बैठे हैं.
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