भारत में तुर्की और अज़रबैजान का बहिष्कार लेकिन चीन और अमेरिका पर ख़ामोशी क्यों?
नई दिल्ली | भारत और पाकिस्तान के बीच हाल ही बढ़े तनाव और युद्ध की स्थिति के दौरान पाकिस्तान को तुर्कीए और अज़रबैजान द्वारा खुलेआम समर्थन दिए जाने के जवाब में भारत में अब इन दोनों देशो के बहिष्कार का राष्ट्रव्यापी आह्वान ज़ोर पकड़ रहा है. एक मज़बूत कूटनीतिक और आर्थिक कदम के तहत भारत सरकार ने देश के कई प्रमुख हवाई अड्डों पर ग्राउंड-हैंडलिंग संचालन का काम कर रही एक तुर्की कंपनी के लाइसेंस रद्द कर दिए हैं.
जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, जामिया मिलिया इस्लामिया और मौलाना आज़ाद राष्ट्रीय उर्दू विश्वविद्यालय सहित कई प्रमुख भारतीय विश्वविद्यालयों ने भी तुर्की संस्थानों के साथ शैक्षणिक कार्यक्रमों और सहयोग प्रोग्रामों को निलंबित करने की घोषणा की है.
वहीं दूसरी तरफ भारत सरकार और तुर्की का विरोध कर रहे निजी समूह चीन और अमेरिका के मामले में बिल्कुल ख़ामोश हैं, जबकि यह दोनों देश भी भारत पाक के सशस्त्र संघर्ष के दौरान पाकिस्तान के पक्ष में आए थे.
EaseMyTrip और Ixigo जैसे प्रमुख ऑनलाइन ट्रेवल प्लेटफॉर्म द्वारा यात्रा की सलाह जारी की गई है, जिसमें भारतीय पर्यटकों से तुर्की और अज़रबैजान की यात्रा करने से बचने का आग्रह किया गया है. मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, ऑपरेशन सिंदूर के बाद तुर्की और अज़रबैजान के लिए भारतीय पर्यटकों द्वारा कोई नई बुकिंग नहीं की जा रही है और दोनों देशों के लिए पहले से की गई बुकिंग्स को लगभग रद्द कर दिया गया है.
भाजपा सांसद प्रवीण खंडेलवाल के नेतृत्व में अखिल भारतीय व्यापारी परिसंघ (CAIT) ने भी तुर्की और अज़रबैजान के साथ व्यापार और वाणिज्यिक संबंधों का पूर्ण बहिष्कार करने की घोषणा की है. ट्रेड लीडर्स के एक राष्ट्रीय सम्मेलन के बाद इस निर्णय की घोषणा की गई, जिसमें देश भर से 125 व्यापारिक प्रतिनिधियों ने भाग लिया था.
CAIT ने दोनों देशों से जुड़े सभी आयात और निर्यात को रोकने का संकल्प लिया है और भारतीय फिल्म उद्योग और कॉर्पोरेट क्षेत्र से तुर्की और अज़रबैजान में फिल्मों या प्रचार सामग्री की शूटिंग से बचने की अपील की है.
इसके अलावा, कुछ ट्रैवल एजेंसियों द्वारा दोनों देशों के लिए सामूहिक और व्यक्तिगत यात्रा योजनाओं को रद्द करने का आग्रह किया गया है.
बड़े पैमाने पर दोनों देशों का किया जा रहा बहिष्कार तुर्की और अज़रबैजान के साथ भारत के आर्थिक और सांस्कृतिक संबंधों में एक महत्वपूर्ण बदलाव को दर्शाता है, जो भारत की संप्रभुता और सुरक्षा हितों के संबंध में राष्ट्र की विदेश नीति के सख्त रुख का संकेत देती है.
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, भारत तुर्की के साथ कुछ व्यापार संबंध बनाए रखे हुए है, क्योंकि देश को उसका निर्यात उसके आयात से अधिक है. बिजनेस स्टैंडर्ड की रिपोर्ट के अनुसार, 2024-25 वित्तीय वर्ष के अप्रैल से फरवरी की अवधि के दौरान, तुर्की को भारत का निर्यात $5.2 बिलियन तक पहुँच गया, जबकि आयात $2.84 बिलियन रहा.
इसके विपरीत, अज़रबैजान के साथ भारत के व्यापार संबंध सीमित और काफी हद तक प्रतीकात्मक बने हुए हैं. अखिल भारतीय व्यापारी परिसंघ (CAIT) के अनुसार, इसी अवधि के दौरान अज़रबैजान को भारतीय निर्यात $86.07 मिलियन था, जबकि आयात केवल $1.93 मिलियन था. नतीजतन, भारत और अज़रबैजान के बीच व्यापार में किसी भी तरह की बाधा या निलंबन का दोनों पक्षों पर ज़्यादा प्रभाव नहीं पड़ेगा.
यहां एक अहम सवाल यह उठता है कि क्या हम उन देशों पर व्यापार और वाणिज्यिक प्रतिबंध लगा कर सही कर रहे हैं जिन्होंने भारत पाकिस्तान के हालिया तनाव के बीच पाकिस्तान का समर्थन किया था? अगर हम इस उसूल पर चलते हैं तो फिर चीन का भी इसी तरह बहिष्कार किया जाना चाहिए था. चीन न केवल पाकिस्तान को हथियार और गोला-बारूद की आपूर्ति करता है, बल्कि खुद को पाकिस्तान का “सदाबहार दोस्त” भी कहता है.
हाल ही में भारत-पाकिस्तान के बीच हुए सशस्त्र संघर्ष के दौरान, चीन ने एक आम घोषणा की थी कि अगर भारत की कार्रवाइयों से उसकी क्षेत्रीय अखंडता को खतरा होता है, तो वह पाकिस्तान की संप्रभुता की रक्षा करेगा. चीन की इस चेतावनी में यह धमकी छुपी हुई थी कि अगर भारत ने पाकिस्तानी क्षेत्र के किसी भी हिस्से पर कब्ज़ा किया, तो वह सैन्य हस्तक्षेप पर विचार कर सकता है.
राजनीतिक बयानों से हटकर भी अगर देखें तो भारत-पाक संघर्ष में पाकिस्तान द्वारा इस्तेमाल किए गए सैन्य उपकरण, जिसमें लड़ाकू विमान और मिसाइल शामिल हैं, की आपूर्ति बड़े पैमाने पर चीन द्वारा की गई थी. रिपोर्टों के अनुसार, चीन पाकिस्तान की लगभग 80% रक्षा आवश्यकताओं को पूरा करता है. जब भारत के खिलाफ़ शत्रुतापूर्ण कार्रवाइयों का प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से समर्थन करने वाले देशों को दंडित करने या उनके व्यापारिक बहिष्कार की बात आती है तो उक्त तथ्य हमारी विदेश नीति की स्थिरता और प्रभावशीलता के बारे में गंभीर सवाल खड़े करते है.
हमें लद्दाख में चीन की कार्रवाइयों को भी नहीं भूलना चाहिए, जहाँ चीनी सैनिकों ने भारतीय सैनिकों के साथ झड़प की थी और 2020 में भारतीय क्षेत्र के कुछ हिस्सों पर कब्ज़ा कर लिया था. इस आक्रामकता और सीमा विवाद के बावजूद, भारत और चीन के बीच व्यापार न केवल जारी रहा है, बल्कि बढ़ा भी है. पिछले पाँच वर्षों में चीन के साथ सरकारी और निजी दोनों तरह के कारोबार में वृद्धि हुई है.
अंतरराष्ट्रीय न्यूज़ एजेंसी रॉयटर्स के अनुसार, संयुक्त राज्य अमेरिका के बाद चीन भारत का दूसरा सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है. वित्तीय वर्ष 2024-25 में, भारत और चीन के बीच द्विपक्षीय व्यापार 118.4 बिलियन डॉलर तक पहुँच गया, जिसमें भारत का व्यापार घाटा 99.2 बिलियन डॉलर था. इसका मतलब है कि चीन से किया जा रहा आयात भारत के किए जा रहे निर्यात से कहीं अधिक है.
दिल्ली और अन्य प्रमुख शहरों के थोक बाज़ारों में भी जाने पर पता चलता है कि खिलौनों और रसोई के बर्तनों से लेकर इलेक्ट्रॉनिक्स समानों तक के क्षेत्र में चीन में बने उत्पादों का बोलबाला है. नतीजतन, कई छोटे भारतीय निर्माताओं ने अपनी इकाइयां बंद कर दी हैं और इसके बजाय सस्ते चीनी उत्पाद बेचने का विकल्प चुना है जो कीमत में अधिक प्रतिस्पर्धी हैं. इन तथ्यों को देखते हुए तो लगता है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आत्मनिर्भर भारत के नारे के उलट, भारत चीन पर अधिक निर्भर होता जा रहा है.
पाकिस्तान के साथ तनाव जारी रहने के दौरान, चीन ने अरुणाचल प्रदेश में 27 स्थानों के नाम बदलकर अपनी विस्तारवादी हरकतें और बढ़ा दी. इनमें 15 पहाड़, पाँच कस्बे, चार पहाड़ी दर्रे, दो नदियाँ और एक झील शामिल हैं, जिससे पिछले आठ वर्षों में नाम बदले गए स्थानों की कुल संख्या 92 हो गई है.
चीनी, तिब्बती या संकर रूपों में ये नए नाम, इस क्षेत्र पर बीजिंग के व्यापक दावे का हिस्सा हैं। हालाँकि भारत सरकार ने पुष्टि की है कि अरुणाचल प्रदेश भारत का अभिन्न अंग है, लेकिन चीन की भारतीय क्षेत्रों पर की गई कब्जे की कारवाइयों पर बहुत कम सार्वजनिक प्रतिक्रिया आई, कोई बहिष्कार अभियान नहीं चलाया गया और ना ही चीन के खिलाफ कोई विरोध किया गया, जैसा तुर्की और अज़रबैजान के मामले में किया जा रहा है.
संयुक्त राज्य अमेरिका ने भी हालिया के संकट के दौरान खुलकर और पूरी तरह से भारत का समर्थन नहीं किया बल्कि अमेरिका ने अपने बयानों में बार-बार भारत और पाकिस्तान को एक साथ रखा. अमेरिका ने कश्मीर मुद्दे को भी बार-बार उठाया, जबकि यह जानते हुए भी कि भारत कश्मीर पर किसी तीसरे पक्ष की मध्यस्थता का दृढ़ता से विरोध करता है.
15 मई को क़तर में एक सैन्य अड्डे पर बोलते हुए, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने भारत और पाकिस्तान के बीच युद्धविराम के लिए अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो की प्रशंसा की और यहाँ तक कि दोनों देशों के नेताओं के बीच एक रात्रिभोज बैठक आयोजित करने का सुझाव भी दिया. ऐसी टिप्पणियां न सिर्फ कूटनीतिक दृष्टि से अनुचित थीं बल्कि इन्हें भारत के लिए अपमानजनक भी माना गया.
इसके अलावा, ट्रंप ने सार्वजनिक रूप से एप्पल के सीईओ टिम कुक से भारत में विनिर्माण इकाई स्थापित न करने का आग्रह किया, जो कि भारत विरोधी कदम है. भारत विरोधी इन उकसावों के बावजूद, भारत में कोई आक्रोश अमेरिका के खिलाफ नहीं देखा गया. व्यापार निकाय भी चुप रहे, और कोई आधिकारिक विरोध या बहिष्कार का आह्वान भी नहीं किया गया.
इससे एक बुनियादी सवाल उठता है कि हमारी प्रतिक्रियाओ में यह दोहरापन क्यों है? क्या यह सिर्फ़ इसलिए है क्योंकि अमेरिका और चीन शक्तिशाली देश हैं? क्या तुर्की और अज़रबैजान जैसे देश, जिन्हें भारत से ज़्यादा मुखर आलोचना का सामना करना पड़ा है, सिर्फ़ इसलिए निशाना बनाए जा रहे हैं क्योंकि वे आर्थिक या सैन्य रूप से उतने ताकतवर नहीं हैं?
ऐसी दोहरे मापदंडों वाली नीतियों पर गहन चिंतन की ज़रूरत है ताकि हमारे राष्ट्रीय हितों को परिभाषित और संरक्षित किया जा सके.
courtesy:hindi.indiatomorrow.net

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