आखिर क्यों गरीब तबके के लिए बुरा रहा साल 2020?
By Imran Khan i
ज़िन्दगी में कभी ऐसे मोड भी आते हैं जिनसे बच कर निकलना हमारे बस की बात नहीं होती। यह साल गुज़रता चला गया। हमारी ज़िन्दगी का ऐसा साल पहली बार आया जिसमें न तो कोई उमंग थी और न ही कोई ख्वाहिश।
क्या 2020 अकाल का वर्ष था?
जनवरी 2020 से दिसंबर 2020 तक गुज़रे साल ने झकझोर कर रख दिया। शाहीन बाग की आंदोलनकारी महिलाओं के लिए अकाल का महीना था जनवरी। साल की शुरुआत नागरिकता कानून में संशोधन के खिलाफ 2019 से जारी विरोध प्रदर्शनों के बीच हुई। उस समय दिल्ली के विधानसभा चुनाव भी करीब थे। इसलिए यह विरोध प्रदर्शन बड़ा सियासी मुद्दा बन चुके थे।
जनवरी माह में ही डब्ल्यूएचओ ने वर्ष 2020 को नर्स और दाई वर्ष घोषित किया। तब किसे पता था कि वाकई यह वर्ष नर्सों और दाइयों और डॉक्टरों की सेवा लेने वाला वर्ष बन जायेगा।
विश्व में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तब चिंता बढ़ गयी जब ऐसी स्तिथि आई जिसमें अमेरिका और ईरान के बीच कभी भी युद्ध हो सकता है। ऐसा तब हुआ जब बगदाद में अमेरिकी हमले में ईरानी सेनाध्यक्ष जनरल कासिम सोलेमानी शहीद किए गए। जिन्होंने ISIS और कई लड़ाकों को धूल चटाई थी।
जनवरी माह के अंत में भारत में कोरोना वायरस का पहला मरीज केरल में सामने आया जिसको देखते हुए सरकार चिंतित हो गयी और स्वास्थ्य मंत्रालय एक्शन मोड में आ गया। हालांकि हवाई अड्डों पर स्क्रीनिंग जनवरी मध्य से ही शुरू की जा चुकी थी।
दंगों की आग में झुलसती दिल्ली की फरवरी
इसी माह में साल का निरर्थक बजट पेश किया गया। जिसमें विकास का नाम कागज़ों पर तो मौजूद था, मगर वास्तविकता से कोसों दूर।
शाहीन बाग में आंदोलनकारियों के लिए सुप्रीम कोर्ट ने एक समिति बनाई। मगर वहां के लोगों ने एक भी बात नहीं सुनी और सीएए कानून वापस लेने की मांग पर अड़े रहे। फरवरी में ही भारत की ओर पूरे विश्व की निगाहें गड़ गयीं जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भारत की यात्रा पर आये और अहमदाबाद में नमस्ते ट्रंप कार्यक्रम में हिस्सा लिया। विश्व के सबसे बड़े स्टेडियम में हुए इस कार्यक्रम में लाखों लोगों ने ट्रंप का अभिवादन किया।
दिल्ली आने पर उनका स्वागत कपिल मिश्रा द्वारा सुनियोजित तरीके से दंगों के साथ हुआ। 23 फरवरी 2020 से 29 फरवरी 2020 तक चले इस दंगे में बहुत से लोगों की हत्या की गई जिसमें मुस्लिम समुदाय के लोग अधिक थे। अपनी जान बचाने के लिए कुछ मुसलमानों ने भागने की कोशिश की मगर वह नाकामयाब रहे। उनके गुप्तांगों को निशाना बनाया गया। यहां फरवरी के अंत तक कई घरों के चिरागों का भी अंत हो गया।
देश का मार्च महीना और लॉकडाउन का असर
मार्च में बड़ी राजनीतिक हलचल तब हुई जब ज्योतिरादित्य सिंधिया कांग्रेस से इस्तीफा देकर भाजपा के हो गए। मार्च महीने में जैसे-जैसे कोरोना वायरस की रफ्तार तेज होती जा रही थी वैसे-वैसे चीन से खबरें और वायरस ज़ोरों से फैल रहा था।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश को संबोधित करते हुए कोरोना वायरस महामारी की गंभीरता से देश को अवगत कराया। इसी के साथ ही उन्होंने 22 मार्च को जनता कर्फ्यू का आह्वान किया और इसके दो दिन बाद ही उन्होंने देश में 21 दिनों के संपूर्ण लॉकडाउन की घोषणा कर दी। जिसे बाद में आगे बढ़ाया गया।
प्रधानमंत्री ने सार्क देशों के प्रतिनिधियों के साथ भी ऑनलाइन बैठक कर कोरोना वायरस महामारी से निजात दिलाने के उपायों पर चर्चा की और सहयोग बढ़ाने के मार्ग सुझाये। प्रधानमंत्री ने देश के सभी राज्यों के मुख्यमंत्रियों के साथ भी वीडियो कांफ्रेंसिंग के माध्यम से चर्चा की जो कि जून महीने तक जारी रही।
मार्च महीने में मध्य प्रदेश में सप्ताह भर चले राजनीतिक घटनाक्रम में कमलनाथ की सरकार गिर गयी और शिवराज सिंह चौहान ने एक बार फिर मध्य प्रदेश की सत्ता संभाली।
मार्च के बाद ज़िन्दगी ने अपना नक्शा ही बदल दिया
अप्रैल माह की शुरुआत में केंद्रीय सरकार ने कोरोना वायरस का ठीकरा मुसलमानों पर फोड़ दिया। जिसमें जमाती मुख्य मुद्दा बने। इसका असर तो ऐसा हुआ कि हमारे आस पड़ोस के लोग भी हमसे कतराने लगे। हम को ऐसा लगने लगा हमने ही कोरोना फैलाया हो।
बहरहाल, लॉक डाउन की मार गरीब तबके को ज़्यादा पड़ी। अप्रैल में देश ने आजादी के बाद का सबसे बड़ा पलायन तब देखा जब महानगरों से गरीब लोगों का पलायन शुरू हुआ। बहुत ही हृदयविदारक दृश्य था। सरकार ने तब भी कान में रूई ठूसी हुई थी और आंखों में अमानवता का चश्मा भी पहन लिया।
इसके बाद क्या? गरीब और गरीब हो गया। सभी प्रकार की आपदाओं ने गरीबों का गला घोंट दिया। मिडिल क्लास और हाई मिडिल क्लास के लोगों ने जो झेला वो बहुत कम था। मगर जो गरीब किसानों और मजदूरों ने झेला वो वाकई में काफी दर्दनाक रहा।
जाते-जाते भी ये साल सर्द हवाओं में किसानों के अरमानों को कुचल रहा है। देश में सियासत अपना नंगा नाच दिखाती है और भुगतता बस गरीब है।

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