विवेकानंद को हिन्दू रूढ़िवादी संगठनों द्वारा हिंदूवादी संत की तरह प्रचारित किया जा रहा है ,जबकि सच्चाई इससे परे है

Written by Dr. Amrita Pathak

 

वर्तमान समय में स्वामी विवेकानंद को हिन्दू रूढ़िवादी संगठनों द्वारा हिंदूवादी संत की तरह प्रचारित किया जा रहा है जबकि सच्चाई इससे परे है. ठीक उसी तरह जैसे शिवाजी महाराज को हिन्दू आईकान बना कर देश में पेश करने की कोशिश की गयी और आज ऐसी ही कोशिश बाबा साहब भीमराव अम्बेडकर को लेकर भी कर रहे हैं. 2014 में जब से भारतीय जनता पार्टी की सरकार सत्ता में आई है तब से सांप्रदायिक हिन्दू रुढ़िवादी ताकतों नें भारतीय लोकतंत्र के आईडिया ऑफ़ इंडिया की संकल्पना पर प्रहार को तीव्र कर दिया है. वे देश में लोकतान्त्रिक, धर्मनिरपेक्ष, समाजवाद जैसे संवैधानिक मूल्यों को दरकिनार कर मनुस्मृति व् जाति आधारित व्यवस्था को मजबूत करने का काम कर रही है. कभी धार्मिक गतिविधि के नाम पर, कभी लव जिहाद तो कभी घर वापसी के नाम पर देश के अल्पसंख्यकों पर प्रहार कर रही है. दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि सरकारी मशीनरी का उपयोग भी अब संवैधानिक मूल्यों को ख़त्म करने के लिए तेजी से किया जा रहा है. 

स्वामी विवेकानंद का जन्म 12 जनवरी 1863 को बंगाल में हुआ था. उनके बचपन का नाम नरेंद्र दत्त था. 12 जनवरी को राष्ट्रीय युवा दिवस के रूप में भारत में 1985 से मनाया जाता है. विवेकानंद बचपन से धार्मिक प्रवृति के थे लेकिन वो सिर्फ़ एक हिन्दू संत ही नहीं थे जैसा की संघ परिवार व् हिन्दू संगठनों द्वारा उन्हें दिखाने की कोशिश की जा रही है. इससे इतर विवेकानंद एक आधुनिक, वैज्ञानिक व् भौतिकवादी सोच रखने वाले व्यक्तित्व थे. यही कारण है कि विवेकानंद के विचार से राजनीतिक अराजनीतिक हर तरह की सोच को मानने वाले लोग प्रभावित होते रहे हैं. 

कट्टरतावाद के विरोधी लोगों को आईकान के रूप में पेश करने की संघ परिवार व् बीजेपी सरकार की पुरानी आदत रही है या यूँ कहें कि यह उनकी जरुरत भी रही है जो सत्ता में आने के बाद ज़ोर पकड़ चुकी है. संघ व् कट्टरवादी विचारधारा के लोगों ने विवेकानंद को सिर्फ एक बुद्धिजीवी हिन्दू संत के रूप में ही प्रचारित किया है जबकि वो इस सोच से परे एक विशाल व्यक्तित्व रखने वाले प्रखर मानवीय मूल्यों के उपासक थे. पिछले 5 सालों में देश भर में कई तर्कशील विचारकों जिन्होनें संघ के हिंदूवादी एजेंडे को समाज में लागू करवाने के खिलाफ़ मुहीम छेड़ रखी थी उनकी हत्या करवा दी गयी. जिनमें डॉ नरेंद्र दाभोलकर जो समाज से अंधविश्वास को ख़त्म करने की कोशिश में प्रयासरत थे, गोविन्द पानसरे जिन्होंने शिवाजी महाराज को कट्टरवादी ताकतों के हिंदूवादी एजेंडे से निकाल कर शिवाजी के जीवन का सच और जनता के प्रति उनके सौहार्दपूर्ण व्यवहार को समाज के सामने उजागर किया. ऐसे विचारक सहित कई प्रगतिशील लेखकों बुद्धिजीवियों की हत्या करवा दी गयी. यह जाहिर करता है कि ऐतिहासिक सच को समाज के सामने न आने देने की संघ की कोशिश किस हद तक जारी है. 

डॉ दत्ताप्रसाद दाभोलकर की किताब “Retionalist, scientific, socialist Vivekanand” में विस्तार से शोध कार्यों के साथ स्वामी विवेकानंद की जिन्दगी के सच और समाज के प्रति उनकी सोच को प्रमाण के साथ उजागर किया गया है. जिसे साभार के साथ लिख रही हूँ. 

संयुक्त राज्य अमेरिका में हुई सर्वधर्म परिषद् की बैठक में विवेकानंद नें भारत की तरफ से प्रतिनिधित्व किया. यह इंटरफेथ सम्मेलन 11 सितंबर, 1893 को शुरू हुआ था जो 17 दिन तक चला.  यहां 11 सितंबर को उद्घाटन दिवस पर उनका पांच मिनट का भाषण है. यह असम्बद्ध रूप में भी सामने आता है. हालाँकि, इन 17 दिनों के दौरान विवेकानंद बार-बार जो कह रहे थे, वह बोस्टन इवनिंग ट्रांसक्रिप्ट के 30 सितंबर के अंक में प्रकाशित है. यह खबर उनके प्रतिनिधि ने 23 सितंबर को भेजी थी. उसने कहा: ‘विवेकानंद के भाषण आकाश की तरह चौड़े हैं. उनके पास एक सर्वदेशीय धर्म की दृष्टि है जिसमें सभी धर्म शामिल हैं.'' 

तर्कशील व् वैज्ञानिक विवेकानंद: स्वामी विवेकानंद वैज्ञानिक सोच रखने वाले असाधारण पुरुष थे. वे कहते थे :
“We do not recognize such a thing as miracles... Most of the strange things which are done in India and reported in the foreign papers are sleight‐of‐hand tricks or hypnotic illusions. They are not the performances of the wise men.”

सर्वधर्म परिषद् के 28 सितंबर को अपनी समापन टिप्पणी में उन्होंने कहा, ''सभी धर्म एक हैं. आध्यात्मिकता पवित्रता, मन की पवित्रता, और दया सभी धर्मों का आधार है. मेरा मानना है कि सभी धर्मों के झंडे पर जल्द ही लिखा जाएगा - कोई संघर्ष नहीं. एक दूसरे की मदद करें. एक-दूसरे को आत्मसात करें. नष्ट मत करो. झगड़ा मत करो. दोस्ती चाहते हैं मुझे शांति चाहिए.''

विवेकानंद की ऐसी समझदारी के कारण, हिंदू धर्म ने विवेकानंद को पूरी तरह से खारिज कर दिया था. उन्होंने 20 जून, 1894 को हरिदास बिहारीलाल देसाई को एक पत्र भेजकर अपना दुख व्यक्त किया है. अपने पत्र में वे कहते हैं, मुझे अमेरिका आए नौ महीने हो चुके हैं. हालांकि, शंकराचार्य, हिंदू संगठनों और हिंदू भाइयों ने अमेरिकी लोगों को यह स्पष्ट करने के लिए कोई प्रयास नहीं किया है कि मैं अभी भी हिंदुओं का प्रतिनिधि हूं. इसके उलट, ये लोग अमेरिकी लोगों से कह रहे हैं कि मैं एक झूठ हूं.

8 मार्च 1895 को दिए अपने भाषण में उन्होंने कहा था कि:
“I look upon miracles as the greatest stumbling‐blocks in the way of truth.”

जाति पर विवेकानंद की राय: 
17 सितंबर, 1889 को पूज्यपाद को एक पत्र में उन्होंने कहा, "मुझे विश्वास है कि हमारे देश की प्राचीन राय के अनुसार जाति व्यवस्था वंशानुगत मानी जाती है, और स्पार्टन्स ने शूद्रों पर अत्याचार किया क्योंकि उन्होंने दासों पर अत्याचार किया और अमेरिकियों ने नीग्रो पर अत्याचार किया,कर रहे हैं. "वेद ब्रह्मज्ञ ऋषियों की वाणी है. इस संबंध में, हमारे ऋषि सर्वज्ञ हो गए. तो आज के विज्ञान का क्या जो उन्हें सरल नियमों से अनभिज्ञ बनाता है? उनका सूर्य सिद्धांत बताता है कि पृथ्वी त्रिकोणीय है और वासुकी के सिर पर है. इससे उनके ज्ञान को नकारे बिना अज्ञानता से छुटकारा नहीं मिलेगा''.

22 अगस्त, 1892 को दीवानजी को भेजे गए एक पत्र में उन्होंने कहा, "उन पुजारियों, जिनकी 400 पीढ़ियों ने नहीं देखा कि वेद क्या हैं, वे आज राष्ट्र को वेद पढ़ा रहे हैं!" भगवान, मेरे देश को इन राक्षसों से बचाओ जो ब्राह्मणों के रूप में मेरे देश में चलते हैं.

20 अगस्त, 1893 को विवेकानंद इंटरफेथ सम्मेलन के लिए संयुक्त राज्य अमेरिका पहुंचे. सम्मेलन में केवल तीन सप्ताह का समय बचा था. पेरुमल को लिखे एक पत्र में, विवेकानंद कहते हैं, “कोई भी अन्य धर्म मनुष्य की महिमा को हिंदू धर्म के समान कठिन नहीं बताता है. दुनिया का कोई भी धर्म गरीबों और निचली जातियों पर उतना अत्याचार नहीं करता जितना कि हिंदू धर्म करता है”.

इंटरफेथ सम्मेलन में विवेकानंद को आश्चर्यजनक सफलता मिली. हालाँकि, छह महीने बाद, 19 मार्च, 1894 को, उन्होंने अपने दोस्त शशि को एक पत्र भेजा - जो रामकृष्ण का पसंदीदा था - जिसे रामकृष्णनंद कहते हैं - वराहनगर मठ में, शूद्रों की मंदिर तक कोई पहुंच नहीं है. हालांकि, मंदिर में महिलाओं को देवदासी के रूप में नृत्य करने के लिए बनाया जाता है. वह कौन सा धर्म है जो गरीबों का दुख दूर नहीं करता, जो आदमी को देवता नहीं बनाता है? क्या हमारा धर्म 'धर्म’ नाम के लायक है? पिछले दो हज़ार सालों से, इस देश के महान वैज्ञानिक इस बात पर चर्चा कर रहे हैं कि क्या बायीं तरफ या दाईं ओर पानी पीना है, और क्या गंध लंबवत या क्षैतिज है. अगर वह देश नहीं बिगाड़ेगा तो और क्या होगा? इस देश में अधिकांश लोग आधे-नग्न और आधे-खाए हुए हैं. इस देश में दस से बीस लाख भिक्षु और कुछ लाख शिक्षित लोग गरीबों का खून चूस रहे हैं. यह कौन सा देश है, या नरक? यह कैसा धर्म है, या यह शैतान का तांडव है?'

उन्होंने 3 मार्च, 1894 को सिंगारवेलु मुदलियार को एक पत्र में कहा. “धर्म सामाजिक मामलों में हस्तक्षेप करता है, यह धर्म की सबसे बड़ी गलती है. धर्म को सामाजिक नियमों का कर्ता होने का कोई अधिकार नहीं है. धर्म का संबंध केवल आत्मा से है, उसे सामाजिक क्षेत्र में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए. अब तक की तबाही का एकमात्र कारण यह है कि धर्म ने सामाजिक मामलों में हस्तक्षेप किया है”. दो उदाहरण महत्वपूर्ण हैं. सहमति आयु कानून पर चर्चा करते हुए, विवेकानंद ने ब्रह्मानंद को एक पत्र भेजा जिसमें कहा गया कि ent आठ साल की लड़की की शादी तीस साल के घुड़सवार से हो रही है. इस शादी को लेकर माता-पिता खुश हैं. और यदि हम इसका विरोध करते हैं, तो रोना 'हमारे धर्म को डुबो रहा है' है. काश, उन लोगों के लिए जो अपनी बेटियों को युवावस्था में पहुंचाने से पहले ही मां बनने की जल्दी में हैं, और जो लोग इसके लिए वैज्ञानिक स्पष्टीकरण देते हैं, उनका धर्म क्या है? कुछ का कहना है कि बाल विवाह मुस्लिम हमलावरों से लड़कियों की रक्षा के लिए बनाया गया था. अरे, हम कितने झूठ बोलने वाले हैं? मैंने सभी गुरुसूत्रों और ब्राह्मणों को बहुत ध्यान से पढ़ा है. जब वह युवा हो तो लड़की से शादी करने का आदेश है. सभी टिप्पणीकारों ने इसकी गवाही दी है. यह उसे छोड़ने और आगे बढ़ने का समय है.”

विवेकानंद अपने शिष्यों को संयत शब्दों में कहते हैं कि धर्म को अपनी सीमा में रहना चाहिए. उन्होंने 24 जनवरी 1894 और 19 नवंबर 1894 को मद्रास में अपने शिष्यों को पत्र लिखे. दोनों पत्रों में, उन्होंने कहा, "केवल एक चीज है जो जीवन, विकास और खुशी के लिए आवश्यक है." वह विचार और आचरण की स्वतंत्रता है. यदि यह नहीं है, तो राष्ट्र, मानव या मानव जाति का पतन अवश्यम्भावी है. सभी को यह तय करने का अधिकार होना चाहिए कि क्या खाएं, क्या पहनें, कौन शादी करें, अगर यह दूसरों को नुकसान नहीं पहुंचाता है.
मई 1896 में अल्बर्टा को लिखे एक पत्र में, वे कहते हैं, “मैं जल्द ही भारत जा रहा हूं. मैं देखना चाहता हूं कि क्या मैं वहां अपना काम जारी रख सकता हूं. हिंदुस्तान निष्क्रिय और पौराणिक लोगों की एक बड़ी भीड़ है. सभी पुराने निर्जीव अनुष्ठान सिर्फ पुरानी भोली मान्यताएं हैं. उसे जिंदा रखने की जहमत क्यों? वहां मैं कुछ नया शुरू करना चाहता हूं. यह सरल, लेकिन शक्तिशाली होगा.”

इस तरह की सोच रखने वाले विवेकानंद जब जनवरी 1897 में भारत लौटे तो वैद्यों और संतों के द्वारा तिरस्कार का सामना करना पड़ा क्यूंकि वो समंदर के रस्ते से भारत आए थे. विवेकानंद जब कोलकाता पहुँचे, तो बंगवासी’ ने लिखा .. यह आदमी एक शूद्र है. उन्हें संन्यास लेने का कोई अधिकार नहीं है. ' मंदिर के पुजारियों ने उन्हें बाहर का रास्ता दिखा दिया. विवेकानंद को अपमानित होना पड़ा और उन्हें कहीं और श्री रामकृष्ण जयंती मनानी पड़ी. 14 सितंबर, 1899 को लिखे ख़त में उन्होंने इसका जिक्र किया. 

जब विवेकानंद ने बेलूर मठ की स्थापना की, तो देश में एक भी अमीर व्यक्ति या उपनिवेशवादी ने एक भी रुपये की मदद नहीं की. सारा पैसा उनके लंदन के दोस्त हेनरीटा एम मुलर से आया था. बेलूर मठ के सदस्य होने के दौरान धर्म, पंथ, जाति, लिंग और राष्ट्रीयता को ध्यान में नहीं रखा गया था. बेलूर मठ का मानना था कि सभी लोग समान हैं. तो यह मठ नहीं है; ऐसा मठ मौजूद नहीं हो सकता यह मान कर इसे विवेकानंद का विश्राम गृह घोषित कर दिया गया.

39 साल की उम्र में विवेकानंद की अचानक मृत्यु हो गई. उनकी मृत्यु के बाद दूसरे दिन, कोलकाता के किसी भी समाचार पत्र ने उनकी मृत्यु की ख़बर को प्रकाशित नहीं किया. बेलूर मठ ने शोक जुलूस में शामिल होने के लिए कोलकाता उच्च न्यायालय के दो न्यायाधीशों को बुलाया था, दोनों ने इनकार कर दिया. श्री रामकृष्ण की मृत्यु कोलकाता नगर निगम में दर्ज है, लेकिन विवेकानंद की नहीं.

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