हिन्दू ,सिख ,इसाई ,जैन , धर्म के  धर्मगुरु बताएं उन्हों ने अब तक  देश में  ‘सांप्रदायिक सौहार्द’ के लिए  कितनी जनसभा  की है ?

|

क्या सांप्रदायिक सौहार्द सिर्फ मुसलमानों की ज़रुरत है ?

देश में आज़ादी के बाद से एक लम्बे अरसे से मुसलमान ‘सांप्रदायिक सौहार्द’ अर्थात गंगा जमुनी तहज़ीब को बचाने के लिए ,संविधान बचाओ देश बचाओ , आतंकवाद के खिलाफ रैलियाँ निकालते  रहे हैं.
ऐसे जलसों में भारी तादाद में मुस्लिम समुदाय के  लोग जमा हो जाते हैं और फिर उनको हिन्दू ,सिख ,इसाई ,जैन , स्वामी के धार्मिक गुरु देश में ‘सांप्रदायिक सौहार्द’ अर्थात गंगा जमुनी तहज़ीब को बचाने की मुसलमानों से पुरजोर अपील करते हैं .
लेकिन यह सर्वधर्म एकता, स्टेज तक ही सीमित दिखाई देती है . सामने बैठे श्रोता कक्ष में एक भी व्यक्ति दूसरे सम्प्रदाय का नहीं होता . यहाँ सवाल उठता है की  क्या यह ‘सांप्रदायिक सौहार्द’ का पाठ सिर्फ मुस्लिम समाज के लिए है ?  क्या आप ने कभी ऐसे किसी ‘सांप्रदायिक सौहार्द’ के जलसे में शिरकत की है ? जिसका आयोजन स्वामी अग्निवेश ,स्वामी कृष्णां, जैनमुनि , सिख धर्म गुरु , इसाई धर्म गुरु  ने किया हो  11साल की दिल्ली की पत्रकारिता में कम से कम मुझे तो अभी तक ऐसे किसी जलसे में शिरकत का निमंतरण नहीं मिला है . [caption id="attachment_2868" align="aligncenter" width="691"] सभी धर्मो की सांकेतिक तस्वीर[/caption] ‘सांप्रदायिक सौहार्द’ पर जलसे करने  वाले उलेमा यह बताएं की उन्हों ने अब तक ऐसे कितनी जनसभाओं में शिरकत की है ?  जिनका आयोजन विभिन्न धार्मिक संस्थाओं  ने किया है जिसका विषय ‘सांप्रदायिक सौहार्द’ की स्थापना रहा हो .
इस लिए अब यह सवाल  उठाना ज़रूरी होगया है की देश के संविधान की रक्षा के लिए दूसरे धर्म के धार्मिक गुरू कब आगे आयेंगे ? या फिर  मुस्लिम समुदाय ने ही यह जिम्मेदारी ले रखा है . इसके विपरीत हिन्दू धर्म गुरु सिर्फ धार्मिक यग करते रहे गे , अलबत्ता इस मामले में मुस्लिम उलेमा काफी आगे दिखाई देते हैं अपनी  मजलिसों में दूसरे धर्म के धार्मिक गुरुओं को पूरा  पूरा मौक़ा देते हैं ,
जब तक स्टेज पर  विभिन्न धर्मों की शिरकत का कम्पोजीशन  सामने बैठे श्रोताओं में नज़र नहीं आयेगा , ‘सांप्रदायिक सौहार्द’ बनाये रखने की कोशिश किसी एक समुदाय के करने से कामयाब नहीं हो सकती .
जब तक सभी धर्म के लोग साथ मिल बैठ कर देश की गंगा जमुनी तहज़ीब को बचाने काा संकल्प नहीं लेंगे स्टेज का सुहाना मंज़र कोई नतीजा नही दे सकता यह मात्र सांकेतिक  सौहार्द साबित होगा| इस लिए मुस्लिम जलसों में स्टेज शेयर करने वाले दूसरे धर्म के वक्ता बड़ी तादाद में अपने अपने धर्म के श्रोता के साथ ऐसे जलसों  में शामिल हों.
अगर ऐसा कुछ कर दिखाने में सब मिल कर कामयाब होते हैं तब जाकर एक मज़बूत सन्देश उन लोगों को दे सकेंगे जो देश की एकता भाई चारा को खंडित करने में लगे हुए हैं शायर  के शब्दों में ‘वरना इन बिखरे हुए तारों से क्या बात बने ‘ हम ने स्टेज की शिरकत को ही पूरा काम समझ लिया है . (अशरफ अली बस्तवी)  

0 comments

Leave a Reply