हेट स्पीच मामला: सुप्रीम कोर्ट ने खारिज की अमीश देवगन की FIR रद्द करने की याचिका

सुप्रीम कोर्ट ने हेट स्पीच के मामले में टीवी न्यूज एंकर अमीश देवगन के खिलाफ दर्ज एफआईआर को रद्द करने से इनकार करने का फैसला करते हुए कहा कि प्रभावशाली व्यक्तियों को अपने भाषण में अधिक जिम्मेदार होना पड़ता है।

कोर्ट ने कहा कि प्रभावशाली व्यक्ति आम जनता या विशिष्ट वर्ग से संबंध रखते हैं इसलिए उन्हें अपने प्रभाव और अधिकार का ध्यान रखते हुए उनका कर्तव्य है कि वो अधिक जिम्मेदार रहें। 

देवगन ने सुप्रीम कोर्ट में सूफी संत मोइनुद्दीन चिश्ती के खिलाफ की गई अपनी टिप्पण‌ियों पर भारतीय दंड संहिता की धारा 153A/295A के तहत दर्ज एफआईआर को रद्द करने की मांग की थी। उपासना स्थल अधिनियम 1991 पर बहस के दौरान, देवगन ने कथित तौर पर "लुटेरा चिश्ती" शब्द का इस्तेमाल किया था।



जस्टिस एएम खानविलकर और संजीव खन्ना की बेंच ने 'हेट स्पीच' की अवधारणा का विश्लेषण करते हुए एफआईआर को रद्द करने की याचिका को खारिज किया और टिप्पणी की कि प्रभावशाली व्यक्तियों को उनकी पहुंच को ध्यान में रखते हुए अपने भाषण में अधिक जिम्मेदारी का प्रयोग करना चाहिए।

कोर्ट ने कहा, "उनसे बोले और लिखे गए शब्दों द्वारा व्यक्त अर्थों को जानने और अनुभव करने की अपेक्षा की जाती है, जिसमें वो संभावित अर्थ भी शामिल होते हैं, जिसे समझे जाने की संभावना होती है। अनुभव और ज्ञान के साथ, उनसे उच्च स्तर के संचार कौशल की उम्मीद की जाती है। यह मानना उचित है कि वे उन शब्दों का उपयोग सावधानी से करेंगे, जिनसे उनके इरादे व्यक्त होते हैं।"

कोर्ट ने कहा कि इसका मतलब यह नहीं है कि पत्रकारों जैसे प्रभावी व्यक्ति अन्य नागरिकों की तरह ही अभिव्यक्ति और भाषण की स्वतंत्रता का आनंद नहीं लेते हैं। लेकिन 'किसने' बयान दिया सवाल तब प्रासंगिक हो सकता है जब अदालतें हेट स्पीच के 'नुकसान या प्रभाव' 'मंशा' और/ या 'विषयवस्तु' जैसे तत्वों की जांच करती हैं।

बेंच ने स्पष्ट किया, "हमारा यह कहना नहीं है कि प्रभावशाली व्यक्ति या सामान्य लोगों को प्रतिशोध और अभियोजन के खतरे से डरना चाहिए, अगर वे धर्म, जाति, पंथ आदि से संबंधित विवादास्पद और संवेदनशील विषयों पर चर्चा करते हैं और बोलते हैं।

ऐसी बहस करना और अभिव्यक्ति का आजादी हमारे लोकतंत्र में एक संरक्षित और पोषित अधिकार है। इस तरह की चर्चाओं में भाग लेने वाले लोग, विभिन्न प्रकार के, और कभी-कभी अतिवादी विचार व्यक्त कर सकते हैं, लेकिन इसे 'हेट स्पीच' नहीं माना जाना चाहिए, क्योंकि ऐसा करने से सार्वजनिक स्तर की सभी वैध चर्चाओं और बहस में बाधा पड़ेगी।

कई बार, इस तरह की चर्चा और बहस विभिन्न दृष्टिकोणों को समझने में मदद करती हैं और अंतर को खत्म करती हैं। सवाल, मुख्य रूप से इरादे और उद्देश्य का है। तदनुसार, 'भला विश्वास' और 'कोई वैध उद्देश्य' अपवाद लागू होंगे, जब लागू होने होंगे।"

कोर्ट ने माना कि 'हेट स्पीच' का किसी विशेष समूह के प्रति घृणा के अलावा कोई उद्देश्य नहीं होता है। कोर्ट ने कहा कि एक प्रकाशन, जिसमें अनावश्यक बयान शामिल हों, जिसका नीचा द‌िखाने के अलावा कोई वास्तविक उद्देश्य न हो, इस बात का सबूत होगा कि प्रकाशन गलत इरादे से किया गया है।

जस्टिस खन्ना द्वारा ने फैसले में लिखा, "बहुलतावाद के लिए प्रतिबद्ध राजनीति में, घृणास्पद भाषण लोकतंत्र के लिए किसी भी वैध तरीके से योगदान नहीं कर सकता है और वास्तव में, समानता के अधिकार को निरस्त करता है।"

कोर्ट ने कहा कि 'हेट स्पीच' की सार्वभौमिक परिभाषा मुश्किल रही है, सिवाय एक समानता के कि 'हिंसा के लिए उकसाना'दंडनीय है। कोर्ट ने कहा, "इसलिए, 'हेट स्पीच' का संवैधानिक और वैधानिक उपचार उन मूल्यों पर निर्भर करता है, जिन्हें बढ़ावा देने की मांग की जाती है, इसमें कथित नुकसान और इन नुकसानों का महत्व शामिल है।"

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