हमें डर रहता है कि कहीं कोई काफिर मस्जिद में न आ जाये
|
हमने बचपन से हमेशा दो अलग अलग कहानियां सुनीं हैं मसलन हमने सुना कि जब हम मर जाएंगे तो एक हिसाब किताब से गुज़र कर जन्नत और जहन्नम को जाएंगे, और दूसरी तरफ हमने ये भी सुना कि जब हम मर जाएंगे तो हमारा दूसरा जन्म हो जाएगा, मेरे लिए इन दोनों बातों पर एकसाथ यकीन करना मुश्किल था लेकिन जब थोड़े बड़े हुए तो हमें पता चला कि दरअसल जन्नत जहन्नम तो मुसलमान जाते हैं और पुनर्जन्म हिंदुओं का होता है, एकदिन मैंने बड़े दुख के साथ अपने दोस्त रोहित से कहा रोहित तुम हिन्दू हो न? उसने हाँ में सर हिलाया, मैंने कहा भाई मैं जब मर जाऊंगा तो कभी वापस नहीं आ पाऊंगा लेकिन तुम तो दुबारा आ जाओगे, तुम्हारा दूसरा जन्म हो जाएगा और मैं उधर ही जन्नत में रहने लगूंगा, इतना कहते कहते मेरी आँखों से आंसू आ गए, और रोहित ने मुझे दिलासा देते हुए कहा भाई मैं तुमसे मिलने आया करूंगा, खैर इस हादसे के बाद रोहित मुझसे बड़ी हमदर्दी रखने लगा था, जैसे लोग यतीम बच्चों से हमदर्दी रखते हैं। फिर इसके बाद हमें बताया गया कि ये दुनिया इंसानों का इम्तहान लेने के लिए बनाई गई है ताकि खुदा इस दुनिया से अच्छे लोगों को छांट कर जन्नत दें और बुरों को जहन्नम, और फिर मुझे ये भी पता चला कि ये दुनिया दरअसल कुछ भी नहीं बस भगवान की माया है। लेकिन फिर इसके बाद बिलआखिर मुझे पता चल गया कि मैं मुस्लिम हूँ और इस्लाम ही सच्चा धर्म है, बाक़ी सब झूट है। लेकिन इतना जानने के बाद मुझे इस बात की खुशी बिल्कुल नहीं हो रही थी कि मेरा धर्म सच्चा है बल्कि अपने दोस्तों को लेकर चिंता थी कि वो सब तो जहन्नम में जाएंगे, मैं ये जान कर उदास था। असल में इन यादों के ज़रिए ये बताना चाह रहा हूँ की भारत जैसे समाज में पल रहे बच्चे किन किन तरह के सवालों से गुजरते हैं, इन सवालों से गुजरते हुए एक मुस्लिम होने के बावजूद मैंने हिन्दुओं के रीति रिवाज, पूजा, आराध्य और तमाम तरह की किस्से कहानियां सुनीं, माँ दुर्गा, माँ सरस्वती, की कहानियां भी, सोचता हूँ तो ऐसा लगता है जैसे मेरे आसपास का पूरा माहौल मुझे सिखा रहा है, बता रहा है, हर भाषा हर शैली में, भोजपुरी में, मगही में, मैथली में, अपने गैर-मुस्लिम दोस्तों के साथ रह कर मैं इतना सीख चुका हूं कि किसी गैर-मुस्लिम लड़के के साथ चंद घंटे गुज़ार कर,चंद आदतें परख कर मैं बता सकता हूँ कि वो लड़का बनिया है या ब्राह्मण है, और टाइटल सुन कर बता सकता हूँ कि बंदा सारस्वत ब्राह्मण है या शांडिल्य गोत्र है। मैं ये नहीं कह रहा हूँ कि ये सब जानना मेरे लिए ज़रूरी था, बल्कि मैं ये कहना चाह रहा हूँ की आप जिस समाज के साथ रह रहे हैं आपको उनकी संस्कृति,रीति रिवाज के बारे में तो पता होना चाहिए ताकि दो समाज का आपसी तालमेल बना रहे, दो समाज जितना बेहतर तरीके से एक दूसरे को समझेंगे उतना ही वैमनस्य उनके बीच बना रहेगा।
अब दूसरी ओर आप देखिये की मेरे कई हिन्दू दोस्त हैं जिन्हें मेरे धर्म में रमज़ान और ईद के सिवा कुछ भी पता नहीं है, हमारी धार्मिक रीति रिवाजों के बारे में लोग बहोत कम जानते हैं, ईद बकरीद, मोहर्रम पर आप मैथली, भोजपुरी में कोई लोकगीत नहीं ढूंढ पाएंगे, हम क्या सोचते हैं, ज़िन्दगी के बारे में हमारा
क्या दर्शन है, ये सबकुछ हम कभी नहीं बता पाएंगे अपने हमवतनों को, क्योंकि हम बताना नहीं चाहते, क्योंकि सभ्यता और संस्कृति हम बांटना नहीं चाहते, हमें डर रहता है कि कहीं कोई काफिर मस्जिद में न आ जाये, कहीं कोई काफिर हमारी सभ्यता पर कोई प्रश्न न खड़ा कर दे, कहीं कोई हमारे धर्म की हुरमत को बांका न कर दे, शायद इसी कारण से हम और हमारे रीति रिवाज किसी लोकगीत में नहीं है, लोक कथाओं में नहीं है और इसी लिए भारतीय समाज से हमारा संवाद ठीक नहीं है, और इसी लिए हमारे खिलाफ दुर्भावनाएं फैलाना आसान है, हम इस धरती पर रहते तो हैं लेकिन इस धरती में रचे बसे नहीं हैं, हम इस धरती पर रहने वाले बिल्कुल अलग किस्म के लोग हैं जिन्हें कोई नहीं जानता।
(Waqas Ahmad)

0 comments