"एक गाड़ी जिसने सैकड़ों का पेट भरने की ली जिम्मेदारी"
एक गाड़ी .................. कभी कालीघाट मंदिर के बाहर, तो कभी भीङ से भरे मौलाली के फूटपाथ पर तो कभी धरमतल्ला की सड़कों पर। जब भी मैं इस गाड़ी को देखती तो मेरे मन में ये सवाल उपजता कि, आखिर ये एक ही गाड़ी महानगर के इन सड़कों पर जगह-जगह करती क्या है ? इस सवाल के जवाब को तलाशने की मैनें ठानी और निकल पड़ी जवाब ढ़ुंढने। शाम का वक्त था तकरीबन 4 बज रहे थे। मैनें दैखा रोज की तरह एक गाड़ी मौलाली के फूटपाथ पर आकर रूकती है।
गाड़ी के रूकते ही फूटपाथ पर गुज़र बसर कर रहे लोग उस गाड़ी को घेर लेते है। तभी गाड़ी में बैठा एक शक्स बाहर निकलता है और उन लोगों को अपनी गाड़ी से खाने का पैकेट और पानी की बोतलें निकालकर बांटने लगता है। इसके बाद वही गाड़ी कालीघाट मंदिर की ओर जाती है और फिर से मंदिर के बाहर बैठे कुछ संतो और फकीरों में खाने का पैकेट व पानी की बोतलें बांटती है।
इसी तरह से धरमतल्ला, कोलकत्ता नेश्नल मेडिकल कॉलेज व अस्पताल, सैय्यद साह बाबा मज़ार, और महानगर के अलग-अलग इलाकों में हर रोज खाना और पानी बांटा करती थी। ये गाड़ी रोज करती क्या है इसका जवाब तो मुझे मिल गया लेकिन अब मेरी जिज्ञासा इस गाड़ी के बारे में जानने की और भी बढ़ गइ।
मैंने अब इसका विश्लेषण करना शुरू किया। उक्त गाड़ी के ड्राइवर आबिद व उनके सहयोगी से मैनें बात की। आबिद ने बताया कि फरवरी 2018 से हम हर रोज महानगर के अलग-अलग इलाकों में गरीबो को खाना व पानी बांटते है। मैनें पुछा कि मुफ्त में बांटते हो या पैसे लेकर, तो आबिद ने कहा कि नहीं मुफ्त में खाना और पानी देते।
ये बात सुनकर मुझे बड़ा अजीब लगा भला आजके ज़माने में जब बेटा बाप का नहीं है भाइ भाइ का नहीं है तो कोइ बिना किसी स्वार्थ के इतना परोपकार क्युं करेगा। आबिद से बात करने के दौरान मैनें उससे पूछा कि आखिर ये सारा काम किसके द्वारा किया जा रहा है, तो आबिद ने कहा कि ह्युमन राइ्टस प्रॉटेक्शन एसोसिएशन (मानवाधिकार सुरक्षा संघ) के द्वारा फरवरी 2018 फूड फॉर ऑल मुहिम के तहत ये काम किया जा रहा है। इसके तहत हर रोज लगभग 500 से 600 लोगों को खाना बांटा जाता है।
इन तमाम बातों की पुष्टि करने मैं मानवाधिकार सुरक्षा संघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष शमीम अहमद से मिली। शमीम अहमद ने बताया कि मैं अपने घर से जब भी निकलता था मेरी नजर सड़को पर भूखे रोते - बिलकते बच्चों और लोगों पर पड़ती थी। फिर मैनें एक दिन सोचा कि नहीं अब मुझे कुछ करना है उनके लिए जिन्हें एक वक्त का खाना भी नहीं मिल पाता, जो पानी की तलाश में यहां वहां भटकते है।
इसके बाद हमने फूड फॉर ऑल मुहीम की शुरूआत की। जिसके तहत गरीब और लाचार लोगों में खाना बांटना शुरू किया गया। आगे उन्होंने कहा कि इस मुहिम को आज लगभग चार महिने हो गए है और इनचार महिनों में तकरीबन 80 हजार लोगों ने खाना खिलाया गया। उन्होनें कहा कि आगे भी हम इसी तरह इस मुहिम को चलाएगें। आगे उन्होने कहा कि हमारे यहां शुद्ध शाकाहारी भोजन ही बनाया जाता है, ताकि किसी भी धर्म के लोग इसे आसानी से खा सके।
आपको बता दें कि शमीम अहमद पिछले 20 सालों से मानवाधिकार व सामाजिक कार्यों में अपना योगदान देते आ रहे है। शमीम से बात करने के बाद मैं उन लोगों के पास गइ जिन्हे खाना दिया जाता है। सबसे पहले मैनें मौलाली के फूटपाथ पर अपने पति व चार बच्चों के साथ रह रही शबाना से बात की। शबाना ने अपने दर्द को साझा करते हुए कहा कि, मैं अपने परिवार के साथ यहां करीब 20 सालो से रह रही हुं, जबसे महानगर का शहरीकरण हुआ है तब से हमें सबसे ज्यादा पानी की तकलीफ हुइ है।
पहले तो जगह-जगह ट्युबवेल लगे होते थे मगर शहर के अर्बनाइजेशन के बाद सारे ट्युबवेल को हटा दिया गया है, नगर निगम द्वारा लगाए गए पानी के नल काफी दूर है जिस वजह से हमें काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। आगे शबाना कहती है कि हमे खाने की भी काफी तकलीफ होती कइ बार तो हम और हमारे बच्चे भुखे सो जाया करते थे। लेकिन जब से ये मानवाधिकार द्वारा फूड फॉर ऑल खाना देने की मुहिम शुरू हुई है ये मुहिम मानों हम सबकी परेशानी का हल हो।
ये गाड़ी नहीं हम गरीबो के लिए फरिश्ता है। शबाना से बात करते करते हुए मैनें उसके आठ साल के बेटे सोहैल से बात की। सोहैल ने कहा कि मुझे हर रोज खाने का इंतजार रहता है, मुझे खाने में सबसे ज्यादा आचार पसंद आता है। इसके बाद मैं कॉलेज स्ट्रीट स्थित कोलकाता मेडिकल कॉलेज व अस्पताल पहुंची, वहां दूर दराज से इलाज करवाने आये लोगों से बात की उनमें से एक अभिजीत नास्कर ने बताया कि मैं अपनी मां का इलाज कराने चंदननगर से आया हुं। मैं यहां तकरीबन तीन महिने से हुं।
इस बात पर मैंने पूछा कि तो तुम रहते कहा हो अभिजीत ने कहा कि हम तो गरीब है मां को अस्तोपताल में भर्ती करा दिया है और मैं यही अस्पताल के बाहर सो जाया करता हुं। मां को अस्पताल से खाना मिलता है, और मैं तो रोज फूड फॉर ऑल की गाड़ी का इंतजार करता हुं जब गाड़ी आती है तो खाना मिलता है। यहां से मैं निकल पड़ी कालीघाट ।
कालीघाट जाकर मैनें मंदिर के बाहर बैठे संत और साधुओं से बात की। उन्होनें कहा कि हमारा पेट अगर भरता है तो वो फूड फॉर ऑल के बदौलत। हम अगर रोज खाना खाते है तो फूड फॉर ऑल के कारण। मैनें उन लोगों से पूछा कि खाने की क्वालिटी कैसी होती है तो उन्होने कहा कि खाने की क्वालिटी काफी अच्छी होती और हर रोज कुछ नया होता है खाने में, उन्होने कहा कि त्योहारों में तो पुरी, खीर, फ्राइड राइस जैसे व्यंजन मिलते है।
जात, धर्म, ऊंच, नीच को हटाकर बिना किसी स्वार्थ के आजके दौर में हर रोज किसी को खाना खिलाना वाकई में एक बड़ी बात है। आज जहां उंचे तबके के लोग जो शान से एयरकंडिशन का लुत्फ उठाकर अपने डायनिंग रूम खाना खाते है जबकि उसी समय बाहर एक छोटा बच्चा भूख से बिलकता है। इंसानियत खोते आजके लोग पलट कर किसी गरीब मज़लुम को नहीं देखते है ऐसे में फरिश्ते की तरह कार्य कर रहा मानवाधिकार संगठन मिसाल है।

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