एक देश एक चुनाव क्यों
इस वर्ष को लोकसभा चुनाव के सेमीफाइनल के रूप में देखा जा रहा है। इसमें आठ राज्यों के विधानसभा चुनाव होने हैं। वैसे लगभग, हर साल देश में चुनाव होते हैं। चुनाव से सरकार का काम काज बुरी तरह प्रभावित होता है। 2014 के संसदीय चुनावों को दस महीने भी नहीं गुजरे थे कि महाराष्ट्र, हरियाणा और झारखंड में चुनाव होने लगे। इसके कुछ ही समय बाद, जम्मू और कश्मीर और दिल्ली में चुनाव आयोग को चुनाव कराने पडे। इन चुनावों की थकान दूर भी न हुई थी कि बिहार विधानसभा चुनाव की तैयारियां शुरू हो गईं, जिसके चार महीने बाद असम, तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल, केरल और पुडुचेरी में चुनाव का बिगुल बज गया।
उत्तर प्रदेश, पंजाब, उत्तराखंड, गोवा और मणिपुर जैसे राज्यों को चुनाव से गुज़ारना पड़ा। अभी गुजरात और हिमाचल प्रदेश के परिणाम पर बात हो रही थी कि नव वर्ष के आगमन के साथ ही राजनैतिक दलों ने मेघालय, नागालैंड, त्रिपुरा, कर्नाटक, मिजोरम, राजस्थान, छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश में चुनावी तैयारी शुरू कर दीं। त्रिपुरा में मतदान हो चूका है और कर्नाटक में इस की तैयारी है I
लोकतंत्र में चुनाव जनता के लिए आपने प्रतिनिधियों के चयन का सार्वजनिक त्यौहार होता है। इसकी तैयारी में, चुनाव आयोग, प्रशासन, सरकारी कर्मचारियों का समय और बहुत पैसा खर्च होता है। चुनाव की आचार संहिता लगने के कारण तीन माह तक विकास का कार्य ठप हो जाता है। सरकारी घाटा बढ़ जाता है, प्रत्येक चुनाव आयोजित करने के लिए बहुत ज़्यादा खर्च होता है I फिर हर राज्य को पाँच वर्षों में , नगरीय निकायों, पंचायत, विधानसभा और संसद के चुनावों से अलग -अलग समय गुजरना पड़े तो जनता को इस की भारी कीमत चुकानी पड़ती है। बेशक लोकतंत्र का अपना मूल्य है, लेकिन सवाल है कितना मूल्य हो?
राजनीतिक दलों और उम्मीदवारों के जरिये मतदाताओं को लुभाने के लिए बड़ी रकम खर्च की जाती है, जिस पर प्रश्न चिह्न लगाए जाते हैं इस के अतिरिक्त केंद्रीय सशस्त्र बालों सहित बड़ी संख्या में मानव बल चुनावी ड्यूटी में लगाया जाता है। इतना ही नहीं जनता को विकास संबंधी गतिविधियों में बाधाओं और ध्वनि प्रदूषण का भी सामना करना पड़ता है।
हद तब हो जाती है जब सत्तारूढ़ पार्टी कहीं न कहीं होने वाले चुनावों को देखते हुए उन राज्यों में भी कठोर निर्णय या ज़रूरी सुधार के काम नहीं करती जहां चुनाव आयोजित नहीं हो रहे होते, यदि केंद्र में किसी दल की मजबूत सरकार होती है, तो उसका पूरा ध्यान चुनाव जीतने पर केंद्रित होता है। इस स्तिथि पर चिंता व्यक्त करते हुए चुनाव आयोग ने 1983 में संसद और विधानसभा के चुनाव एक साथ कराने की सिफारिश की थी और 1999 में विधि आयोग ने अपनी 170 वीं रिपोर्ट में भी ऐसी ही अनुशंसा की थी।संविधान निर्माताओं ने लोकसभा और विधानसभा के चुनाव साथ -साथ कराने का प्रायोजन किया था। 1967 तक यह एक साथ होते भी थे I इसका उद्देशय था कि तीन महीने चुनाव हों और पूरे पांच साल काम। लेकिन 1967 भारत के इतिहास में एक महत्वपूर्ण पड़ाव साबित हुआ, जब देश की राजनीति ने करवट ली। राम मनोहर लोहिया ने गैर-कांग्रेस वाद का नारा दिया और आठ राज्यों में गैर-कांग्रेसी सरकारें बनीं, जो विभिन्न राजनीतिक दलों की मिली जुली सरकारें थीं। कई टांगों पर खड़ी कई राज्य सरकारें समय से पहले गिर गईं। उनके चुनाव 1968-1969 में कराये गए। दूसरी ओर, श्रीमती इंदिरा गांधी ने 1 972 की बजाय चौथी लोकसभा का चुनाव 1971 में करा दिया। समय से पहले चुनाव होने से यह वयवस्था पूरी तरह भंग हो गई। इससे जो विघ्न उत्पन्न हुआ वह सरकारी तन्त्र के समय और शक्ति पर भारी पड़ रहा है। अब तक सात बार लोकसभा के चुनाव समय से पहले हो चुके हैं। उनमें से तीन आम चुनाव 199 6 से 1999 के बीच आयोजित हुए। कांग्रेस का 1969 में बंटवारा हुआ, इंदिरा गांधी ने कांग्रेस के क्षत्रपों को बेअसर करने और पार्टी पर अपनी सर्वोच्चता सिद्ध करने के लिए 1971 में लोकसभा भंग कर मध्यावधि चुनाव का एलान कर दिया। अनुच्छेद 356 का सहारा लेकर 1972 में 18 विधानसभाओं के समय पूरा होने से पहले चुनाव कराये गये। 1975 में लोकसभा की अवधि बढ़ाना, मोरारजी देसाई सरकार के द्वारा 1978 में विधानसभाओं को भंग कर चुनाव कराने, इंदिरा गांधी का जनता पार्टी को उन्हीं की भाषा में 1980-81 में जवाब देने से साथ चुनाव की संभावना समाप्त हो गई। यह भी गौरतलब है कि 1978 में जनता पार्टी की सरकार द्वारा कांग्रेस की राज्य सरकारों को बर्खास्त करने और 1980-81 में इंदिरा गांधी द्वारा जनता पार्टी की प्रांतीय सरकारों के साथ वैसी ही प्रक्रिया से दोनों चुनावों में एकरूपता लाई जा सकती थी लेकिन ऐसा हुआ नहीं। अलबत्ता इस राजनीतिक संकट से प्रांतीय दल अस्तित्व में आ गाये। कई राज्यों में यह इतने मजबूती से उभरे कि उन्होंने किसी भी राष्ट्रीय पार्टी को वहां जमने नहीं दिया। प्रांतीय दाल क्यूंकि राष्ट्रीय दलों की प्रतिक्रिया में सामने आये थे इसलिए प्रांतीय जनता ने उन में विश्वास दिखाया। इन दलों ने भी स्थानीय मुद्दों पर ध्यान केंद्रित किया। जिस प्रांतीय दल ने राष्ट्रीय पार्टी बनने या उसके मार्ग पर चलने की कोशिश की, जनता ने उसे राज्य से बाहर कर दिया। बीजेपी की वर्तमान केंद्रीय सरकार संसद और विधानसभा के चुनाव साथ कराने को लेकर गंभीर है। उसने 2014 के चुनावी घोषणापत्र में इस वादे को जगह दी थी। भाजपा के सत्ता में आने के बाद इस विषय पर बहस तेज हुई है। 2015 में संसद की स्थायी समिति ने भी इसके पक्ष में अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा था कि इससे समय और धन दोनों की बचत होगी। फरवरी 2016 में प्रधानमंत्री ने संसद को संबोधित करते हुए इस विमर्श को आगे बढ़ाने की सलाह दी थी। इसी वर्ष सितंबर में सरकार ने लोगों से उनके सुझाव मांगे थे। नीति आयोग ने विभिन्न सामाजिक संस्थाओं, गणमान्य व्यक्तियों और राजनीतिक दलों की सलाह के लिए एक विस्तृत दस्तावेज, '' एक देश एक चुनाव '' शीर्षक से जारी किया। यह दस्तावेज़ कई आंकड़ों के साथ एक समय में चुनाव कराने के तर्क को विभिन्न नज़रियों से प्रस्तुत करता है। उसमें कहा गया है कि चूंकि संसदीय प्रणाली में विधायिका की कोई निश्चित अवधि नहीं है, दोनों स्तरों के चुनावों को दो चरणों में समन्वित किया जा सकता है। पहला चरण 2019 में सत्रहवें आम चुनाव के साथ तथा दूसरा 2021 में सत्रहवीं लोकसभा के मध्य में कुछ विधानसभाओं की अवधि को घटा कर तथा कुछ की अवधि को बढ़ा कर।
यदि सरकार एक साथ चुनाव कराना चाहती है, तो उसे संविधान के अनुच्छेद 83, 85, 172 और 174 में संशोधन करना पड़ेगा। अनुच्छेद 83 लोकसभा एवं अनुच्छेद 172 विधानसभा का कार्यकाल पांच वर्षों के लिए निर्धारित करता है। यानी इसमें समय की अधिकतम सीमा तो है, लेकिन कार्यकाल की कोई न्यूनतम सीमा नहीं है। इसमें संशोधन के लिए संसद के दोनों सदनों में बहुमत की आवश्यकता होगी। राजनीतिक दलों की सहमति के बिना संविधान संशोधन संभव नहीं है।वर्तमान केंद्रीय सरकार का विपक्ष के प्रति रुख ऐसा नहीं है, कि इस पर आम सहमति बन सके। जब तक ऐसा नहीं होता, तब तक कुछ सुधार संविधान में संशोधन के बिना भी किए जा सकते हैं। चुनाव आयोग को अधिकारी है कि वह विभिन्न विधानसभाओं के छह महीने में होने वाले चुनावों को आगे पीछे कर के एक साथ कर दे। इस अवधि को एक वर्ष तक बढ़ाया जा सकता है। चुनाव आयोग ने लोकसभा एवं विधानसभा के चुनाव साथ कराने के लिए 24 लाख ईवीएम और वीवीपीएटी मशीनों की आवश्यकता बताई है। इस समय उम्मीदवारों के खर्च की सीमा तो निर्धारित है, लेकिन राजनीतिक दलों की नहीं। उन की सीमा भी तय होनी चाहिए।
एक साथ चुनाव कराने के लाभ पर तो खूब चर्चा हो रही है कि इससे काम करने का पूरा समय मिलेगा।, निर्वाचित प्रतिनिधियों की जिम्मेदारी पर जवाबदेही हो सकेगी। दल बदल के अभिशाप से राष्ट्रीय राजनीति को छुटकारा मिलेगा, चुनाव की आचार संहिता से केंद्र सरकार के कार्य प्रभावित नहीं होंगे। इस संबंध में विभिन्न देशों के उदाहरण भी दिए जाते हैं, लेकिन इसकी कमियों पर चर्चा नहीं की जाती। हमारा देश ऐसा है जहां किसी विशेष समय में किसी एक पार्टी की हवा होती है। एक समय में चुनाव होने से पूरे देश पर एक पार्टी का वर्चस्व कायम हो जायेगा। जो लोकतंत्र के पक्ष में नहीं है।एक पार्टी के वर्चस्व से, लोकतंत्र की समाप्ति का मार्ग आसान होगा। इसका सीधा प्रभाव प्रांतीय पार्टियों पर होगा। देश दो या तीन पार्टी प्रणाली की ओर चला जाएगा। हर पार्टी अपने पक्ष में माहौल बनाने के लिए किसी भी हद को पार करने का प्रयास करेगी। इसका कुछ अनुमान वर्तमान हालात से लगाया जा सकता है। चुनाव जीतने के लिए देश में क्या- क्या नहीं हो रहा। एक ओर गोरक्षा के नाम पर लोगों का ख़ून बताया जा रहा है तो दूसरी ओर वही पार्टी मतदाताओं को लुभाने के लिए गोमांस की पार्टी कर रही है। देश का दक्षिणी भाग जो हमेशा शांत रहा है, उस को भी एक रंग में रंगने की कोशिश की जा रही है। अभी बार -बार चुनाव होने से केंद्र सरकार और राजनीतिक दलों पर कुछ गलत न करने का दबाव रहता है, और वे जनता के लिए जवाबदेह होते हैं। अलग-अलग चुनावों के खिलाफ तर्क दिया जाता है कि सरकार ऐसे कठिन निर्णय नहीं ले पाती, जिन के दूरगामी एवं उपयोगी परिणाम हों। एक साथ चुनाव हो या अलग-अलग वह निर्णय लिया जाए जो देश के हित में हो, इससे जनता को फायदा मिले और लोकतंत्र को शक्ति।

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