दो बुरों में से कम बुरे को चुनना मुसलमानों की मजबूरी क्यों?
बीजेपी और कांग्रेस के संदर्भ में बुद्धिजीवियों की तरफ से यह जुमला अक्सर सुनने को मिलता है कि 'दो बुरों में से कम बुरे को चुनना मुसलमानों की मजबूरी है।' आखिर बुरों में से ही चुनना मुसलमानों की मजबूरी क्यों और कैसे है? जवाब होगा कि मुसलमानों के पास इसके अलावा कोई ऑप्शन नहीं है, और कोई चारा नहीं है। ऑप्शन कैसे नहीं है? एम.आई.एम, ए.आई.यू.डी.एफ, पीस पार्टी, पॉपुलर फ्रंट, उलमा कौंसिल आदि मुसलमानों की ढेरों पार्टियां मौजूद हैं ? जवाब दो तरह का मिलेगा; सभी के सभी दलाल हैं (जैसे वो खुद उस दलाली के चश्मदीद गवाह हों) या इन पार्टियों को सपोर्ट करके अपना वोट बर्बाद करने का क्या फायदा? जीतना तो है नहीं। अब सवाल यह है कि:
क्या मुसलमानों का वोट केवल दो बुरों को हराने-जिताने के लिए है?
अगर मुसलमान ऐसे ही दूसरों को हराते-जिताते रहेंगे तो उनका भविष्य क्या होगा? क्या उनका बेडा धीरे-धीरे पूर्ण रूप से ग़र्क़ नहीं हो जाएगा?
क्या मुसलमानों का अपना कोई हित या भविष्य नहीं है?
सवाल यह है कि अगर ऑप्शन नहीं है तो क्या ऑप्शन खुद-बखुद बन जाएगा?
क्या हिंदुस्तानी मुसलमानों के सियासी भविष्य के लिए कोई प्लानिंग नहीं होनी चाहिए?
क्या ये ज़रूरी है कि मुसलमान हमेशा सिर्फ अगले इलेक्शन को ही नज़र में रख कर वोटिंग का फैसला करें? क्या हम दूर-अंदेशी से काम लेकर, अपने भविष्य को नज़र में रख कर, लॉन्ग-टर्म प्लानिंग के तहत फैसला नहीं कर सकते?
क्या मुसलमान दूसरों को हराने-जिताने के बजाये अपने सियासी फ्यूचर के लिए अपना वोट इन्वेस्ट नहीं कर सकते? क्योंकि बिना इन्वेस्ट किये तो कुछ भी हासिल नहीं होता।
और आखिर में एक अहम सवाल कि अगर आज आप की नज़र में मुस्लिम क़यादत वाली सभी पार्टियां (बिना सबूत के) दलाल हैं तो क्या गारंटी है कि कल को उठने वाली किसी नई क़यादत को आप दलाल नहीं कहेंगे या भरोसा कर लेंगे?
मुस्लिम बुद्धिजीवियों से इन सवालों के जवाब मतलूब हैं। साथ ही मेहरबानी होगी अगर वो ये भी बता दें कि उनकी इस बदगुमानी और बदख्याली का इलाज क्या है।

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