बिहार चुनाव: “काँग्रेस की हार के लिए मुस्लिम नहीं, कट्टर हिन्दू ज़िम्मेदार हैं”
Adnan Hamid
बिहार में फिर से बहार बा, नीतीश कुमार बा, एनडीए सरकार बा, काँग्रेस की हार बा, ओवैसी ज़िम्मेदार बा! काँग्रेस पार्टी से और उम्मीद भी क्या कर सकते हैं? क्योंकि चुनाव तो इसे न लड़ना आता है न ही जीतना। बस अपनी हार का ठीकरा फोड़ना आता है। कभी ईवीएम तो कभी ओवैसी के सिर, जहां ओवैसी नहीं होंगे वहां यह ठीकरा ईवीएम के सिर फोड़ा जाएगा जहां ओवैसी होंगे वहां ओवैसी के सिर।
यह तथाकथित सेक्युलर पार्टी जो कभी भी सेक्युलर थी ही नहीं, बल्कि छिपे हुए हिन्दुत्ववादियों का अड्डा थी। अब यह बिहार चुनाव हारने के बाद मुसलमानो के सिर अपनी हार का ठीकरा फोड़ते हुए मुसलमानो को कट्टर बता रही है। जबकि इंडियन एक्सप्रेस के आंकड़ों के मुताबिक 75-76 फीसदी मुस्लिम वोट महागठबन्धन को ही गया है।
यादवों को छोड़कर अन्य पिछड़ी और दलित जातियों का वोट एनडीए को ही गया है। ब्राह्मण, भूमिहार, राजपूत और अन्य सवर्ण जातियों का वोट तो एनडीए को जाता ही जाता। तो अगर आंकड़ों और जनसंख्या दोनों परिदृश्य से देखें तो बिहार में काँग्रेस और महागठबंधन की हार और एनडीए की जीत के लिए हमेशा की तरह मुसलमान नहीं बल्कि बहुसंख्यक हिन्दू ही ज़िम्मेदार हैं।
काँग्रेस और सेक्युलर पार्टियां हमेशा से भाजपा और संघ का हव्वा दिखाकर मुसलमानों से अपना वोट बैंक चलाती रही हैं। अपनी पार्टियों में सिवाय इक्का-दुक्का नेताओं के अतिरिक्त नेतृत्व तो दिया नहीं। उन इक्का-दुक्का नेताओं को भी सिर्फ उन्हीं सीटों पर ही टिकट देती थी जिनपर मुस्लिम वोटर बहुसंख्यक है।
मुसलमान अपने आपको राजनीतिक परिदृश्य में अलग-थलग और नेतृत्वविहीन पाता है
आज जो मुसलमान अपने आपको राजनीतिक परिदृश्य में अलग-थलग और नेतृत्वविहीन पाता है। उसके लिए भी यही तथाकथित सेक्युलर राजनितिक पार्टियां ज़िम्मेदार हैं। न ही यह मुसलमानो को राजनीतिक नेतृत्व प्रदान कर पायी न ही उनकी सामाजिक-अर्थिक स्थिति में ही कुछ सुधार कर पायीं। इसी लिए आज भी मुसलमानो को ‘”पंचर वाला” के नाम से ही संबोधित किया जाता है।
अगर मुसलमान खुद के बलबूते पर प्रशासनिक या अन्य सेवाओं में कैसे न कैसे अपना स्थान सुरक्षित करे तो उसे जिहाद बोला जाता है। अगर राजनीति में ओवैसी जैसे लोगों के ज़रिए अपना स्थान बनाने की कोशिश करे तो मुसलमानो पर काँग्रेस जैसी खुद को सेक्युलर कहने वाली पार्टियां कट्टर होने का टैग दे देती हैं और मुसलमानो के चुने हुए नेताओं को जिन्ना का टैग।
काँग्रेस और संघ-भाजपा में क्या अन्तर रह गया
दरअसल दोनों में कभी कोई अन्तर था ही नहीं। भाजपा और संघ के लोग जैसे मुसलमानों को “गद्दार और देशद्रोही” का टैग देते वैसे ही काँग्रेस मुसलमानो को “कट्टर और जिन्नापरस्त” और उनके नेताओं को जिन्ना का टैग दे रहे हैं। दरअसल एआईएमआईएम भाजपा की बी-टीम नही है। बल्कि काँग्रेस ही भाजपा और संघ की ए-टीम है।
अतीत में जाएं तो सीएए का जन्म जिस एनआरसी से हुआ उसके जन्मदाता से लेकर बाबरी मस्जिद का ताला खुलवाने का श्रेय किसके सिर पर है सिवाय काँग्रेस के। भागलपुर, हाशिमपुरा, मुरादाबाद, जबलपुर में मुसलमानों में मुसलमानो के खून से कौन खेला काँग्रेस। अब जब इतने ज़ुल्म के बाद मुसलमानों ने इसके तथाकथित सेक्युलरिज़्म को नकारना शुरू किया तो अब यह मुसलमानो को ही कट्टर बता रही है। दरअसल मुसलमान नहीं काँग्रेस ही कट्टर है।
मुसलमानों से जुड़े मुद्दों पर भाजपा सरकार बनने के बाद भी काँग्रेस अक्सर दबी ज़ुबान में बात करती है या करती ही नहीं है। चाहे वह कश्मीर का मुद्दा हो, सीएए का मुद्दा हो या दिल्ली दंगे और उसमे फंसाये गए बेकसूर एंटी-सीएए ऐक्टिविस्ट का मुद्दा या फिर मॉब लिंचिंग का मामला। काँग्रेस से अच्छा तो लेफ्ट है। वह संसद में नहीं है परंतु वह सड़क पर तो उतरता है। सीएए विरोधी प्रदर्शनों को सड़कों तक लाने में लेफ्ट की भी अहम भूमिका थी। वो मुसलमानों से जुड़े मुद्दो पर काँग्रेस और बाकी सेक्युलर पार्टियों से ज़्यादा खुलकर तो बोलता है।
मुसलमान कब तक तथाकथित सेक्युलर पार्टियों पर भरोसा करें
मुसलमानों ने तो आम आदमी पार्टी पर भी भरोसा किया था लेकिन चुनाव खत्म होते ही उसने अपना हिन्दुत्ववादी चेहरा सबके सामने दिखा दिया। मुसलमानों ने समाजवादी पार्टी पर भी भरोसा किया था सो उसने भी मुज़फ्फरनगर का ज़ख्म मुसलमानों को दिया था। क्या इस देश में ऐसा कोई नियम कि मुसलमान अपने रिप्रज़ेंटेशन की बात नहीं कर सकता?
जब सभी शोषित और पिछड़े वर्गों के अपने-अपने राजनीतिक दल हैं तो मुसलमानों के क्यों नहीं? यादवों की पार्टी हो सकती है, दलितों की पार्टी हो सकती है लेकिन एक ऐसी पार्टी नहीं हो सकती जो संवैधानिक मूल्यों पर चले। जिसमें सेक्युलरिज़्म भी शामिल है, एक एक समाज की नुमाइंदगी कर सके।
आजतक किसी पार्टी ने मुस्लिम रिप्रज़ेंटेशन पर बात क्यों नहीं की? आज भी वह इसपर बात नहीं करना चाहते तो फिर क्या इन पार्टियों ने मुसलमानो को अपना राजनीतिक गुलाम समझ रखा है क्या? मुसलमान बस इनको चुनता रहे और उसे हमेशा डर-डर के रहना पड़े।
हद तो यह है कि कोई सच्चर कमेटी की सिफारिशों पर बात करना ही नहीं चाहता है। मुसलमान आज इतना पिछड़ा हुआ क्यों है इस पर कोई बात क्यों नहीं करता या किसी को इससे फर्क ही नहीं पड़ता। सभी लोग मुसलमानों को दोयम दर्जे का नागरिक मान चुके हैं।
रही बात एआईएमआईएम के साम्प्रदायिक होने की तो अक्सर काँग्रेसी और लिबरल लोग उसपर आरोप लगाते हैं कि एआईएमआईएम मुसलमानों के भाजपा हैं। यह एक बेबुनियाद आरोप है क्योंकि भाजपा और संघ का सपना हिन्दू राष्ट्र का है लेकिन ओवैसी ने कब कहा कि वह भारत को एक मुस्लिम राष्ट्र बनाना चाहते हैं?
कब उन्होंने इस्लाम की अन्य धर्मों पर श्रेष्ठता की बात की? जबकि अन्य धर्मों पर श्रेष्ठता संघ का मुख्य फासीवादी एजेंडा है। हमको यह समझना चाहिए संघ और भाजपा फासीवादी हैं। जबकि एआईएमआईएम और ओवैसी फासीवादी नहीं हैं।
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