डर और ख़ौफ़ का धंधा
जनता दरबार स्पेशल:- अगर आप के दिल में डर ज़िन्दा है तो आप हमेशा डर के ही ज़िन्दा रहेंगे। अगर बेख़ौफ़ जीना है तो अपने दिल के ख़ौफ़ को मारना होगा। दिल के डर का ज़िन्दा रहना आप के ज़िन्दा रहने को मुश्किल बना देगा।
ज़िंदगी मुश्किल हो तो चलेगा, कठिनाई हो तो सह लेंगें, ग़ुरबत हो तो उसका भी सामना कर लेंगें लेकिन अगर डर हो तो ज़िंदगी मौत बन जाएगी। और जब ज़िंदगी मौत बन जाए तो फिर साँसों का चलना या दिल का धड़कना सब व्यर्थ है।डर जब किसी समाज का अभिन्न अंग बन जाता है तो उस समाज के लोग जीवन में कोई बड़ा कारनामा अंजाम नहीं दे पाते। उनकी सोच का दायरा सीमित हो जाता है, मानसिकता संकुचित हो जाती है। आज़ाद देश में रहते हुवे भी वो डर के ग़ुलाम हो जाते हैं। डर, इंसानी समाज को बुज़दिल बना देता है। और बुज़दिल कभी देशप्रेमी या राष्ट्रवादी हो ही नहीं सकते।
हाँ, जीवन में इंसान धर्म, आस्था या क़ानून से डरता है लेकिन डर को ही धर्म आस्था या क़ानून बना लेना अपने जीवन को गिरवी रख देने के समान है।अगर वक़्त रहते डर को विकसित करने वालों की पहचान नहीं की गयी तो हमारी धमनियों में रक्त की जगह डर प्रवाहित होने लगेगा जिस से डर की विजय होगी और हम सभी पराजित हो जाएँगे । गाँधी की आत्मा को ठेस पहुँचेगा और नाथूराम गोडसे की मानसिकता ख़ुश होगी। -मसीहुज़्ज़मा अंसारी

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