पहचान के आधार पर सज़ा के लिए “बुलडोज़र मंत्रालय”
मुंबई | हाल के दिनों में गुजरात के अहमदाबाद में 8,000 से ज़्यादा घर गिराए दिए गए, जिनमें से ज़्यादातर कथित तौर पर मुस्लिम परिवारों के थे. गुजरात सरकार ने बिना कोई विश्वसनीय सबूत दिए इन घरों को “बांग्लादेशी” बस्तियों के रूप में प्रचारित किया.
उन घरों को अवैध घोषित करते हुए, अधिकारियों ने बिना किसी पूर्व सूचना जारी किए या कानूनी कार्यवाही किए सामूहिक रूप से तोड़फोड़ की, जो सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का घोर उल्लंघन है, जिसके अनुसार किसी भी बेदखली से पहले उचित प्रक्रिया की आवश्यकता होती है.
यह सिर्फ़ एक तकनीकी या प्रशासनिक कार्रवाई नहीं थी बल्कि यह बल प्रदर्शन भी था जिसने कानून की अनदेखी की और हज़ारों परिवारों को गहरी मानवीय पीड़ा दी.
सबसे ज़्यादा परेशान करने वाली बात यह है कि चुनिंदा लोगों को निशाना बनाने का स्पष्ट पैटर्न देखा गया. जबकि देश के हर कोने में अवैध निर्माण मौजूद हैं, बुलडोज़र एक बहुत ही विशिष्ट दिशा में काम करते हैं और वे लगभग हमेशा मुस्लिम-बहुल इलाकों में आते हैं.
उत्तर प्रदेश से लेकर मध्य प्रदेश और अब गुजरात तक, भाजपा शासित राज्य एक अनौपचारिक “बुलडोजर मंत्रालय” लागू करते दिख रहे हैं, जहाँ राज्य की शक्ति का इस्तेमाल न्याय या विकास के लिए नहीं बल्कि पहचान के आधार पर सज़ा देने के लिए किया जाता है.
एक पूरा समुदाय, जिनमें से कुछ दशकों से वहाँ रह रहे हैं, रातों-रात मिटा दिए जा रहे हैं. महिलाओं की रसोई छिन जाती है, बच्चों को स्कूलों से निकाल दिया जाता है, बुजुर्गों को आश्रय नहीं मिलता और पूरी ज़िंदगी बिना सुनवाई, बिना चेतावनी और बिना किसी सहारे के मलबे में तब्दील हो जाती है.
संस्थानों की चुप्पी और मीडिया के अधिकांश लोगों की उदासीनता अन्याय को और गहरा करती है. इस तरह के विध्वंस की वैधता, नैतिकता या मानवीय लागत पर सवाल उठाने के बजाय, मीडिया का बड़ा हिस्सा प्रमुख राजनीतिक विमर्श की सेवा करने वाले आख्यानों से ध्यान भटकाना जारी रखता है. यह केवल इमारतों के बारे में नहीं है बल्कि यह न्याय, गरिमा और संविधान में निहित धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक वादों का विध्वंस है.
यदि कोई स्वतंत्र एजेंसी उचित ऑडिट या फील्ड स्टडी करे, तो इस विध्वंस की सीमा और इसके निष्पादन में धार्मिक पूर्वाग्रह उजागर हो जाएगा. लेकिन ऐसे आंकड़ों के अभाव में, ये विध्वंस सार्वजनिक रिकॉर्ड में अदृश्य रहते हैं और राज्य द्वारा उनका हिसाब नहीं रखा जाता.
इसलिए, आने वाली राष्ट्रीय जनगणना में, यह महत्वपूर्ण है कि विपक्षी दल मुसलमानों और अन्य हाशिए के समुदायों की आवास की स्थितियों के उचित सर्वेक्षण के लिए एक मज़बूत मांग उठाएं. यह केवल संख्याओं के बारे में नहीं है, यह जीवन के बारे में है. हमें यह जानने की ज़रूरत है कि कितने लोग सुरक्षित घरों के बिना रहते हैं, कितने विस्थापित हुए हैं, और हाल के वर्षों में कितनों के घर ध्वस्त हुए हैं.
जब कानून के नाम पर बुलडोज़र का इस्तेमाल किया जाता है तो देश को यह जानने का हक है कि किसे और क्यों निशाना बनाया जा रहा है. इस जानकारी के बिना, अन्याय छिपा रहता है, और पीड़ा को स्वीकार नहीं किया जाता है. सच्चाई को सामने लाने का समय आ गया है क्योंकि तभी हम सिस्टम को जवाबदेह ठहराना शुरू कर सकते हैं और अधिक समानता और मानवीय समाज के लिए लड़ सकते हैं.
courtesy:https://hindi.indiatomorrow.net

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