बिहार दिवस : बंगाल से बिहार-उड़ीसा को अलग करने की क्यों उठी मांग, जानें कब और कैसे अलग हुआ बिहार
वह घड़ी आयी और 12 दिसंबर 1911 को बिहार को अलग राज्य का दर्जा मिल गया. बिहार की पहचान उसे 145 वर्ष बाद उसे प्राप्त हुई. आज 110 साल पूरा होने पर हमें विकसित बिहार का इंतजार ही है.
पटना. बंगाल से अलग बिहार राज्य की स्थापना साल 1912 में हुई थी. बिहार के अलग राज्य के रूप में स्थापित होने की ख़ुशी में हर साल 22 मार्च को हर साल बिहार दिवस (Bihar Diwas) मनाया जाता है. यह परंपरा मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने शुरू की है. बिहारियत की रक्षा के लिए बंगाल से अलग होने के बाद अगर कुछ बिहार ने खोया है तो वो बिहारियत ही है. बंगाल से अलग होने के ठीक 110 साल बाद अगर हम अलग होने के कारण पर गौर करें तो साफ तौर पर दिखता है कि अपनी पहचान और हिस्सेदारी सुनिश्चित करने के लिए हम बंगाल से अलग हुए थे. आज बिहार का एक बड़ा तबका भूल चुका है कि वो क्यों, कब और कैसे बंगाल से अलग हुआ.
1870 में पहली बार अलग होने की सोच आयी सामने
पलासी युद्ध के बाद 1765 में पटना की प्रशासनिक पहचान का विलोप हो गया और ईस्ट इंडिया कम्पनी को दीवानी मिली. उसके बाद यह महज एक भौगोलिक इकाई बन गया. अगले सौ सवा सौ सालों में बिहारी एक सांस्कृतिक पहचान के रूप में तो रही, लेकिन इसकी प्रांतीय या प्रशासनिक पहचान मिट सी गई. 1870 के बाद मुंगेर से निकलने वाले उर्दू अख़बार ‘मुर्ग़ ए सुलेमान’ ने पहली अगल बिहार राज्य की आवाज़ उठाई. इस अख़बार ने ही सबसे पहले “बिहार बिहारियों के लिए” का नारा दिया था. ये मांग अख़बार ने उस समय की थी जब आम तौर पर लोग इस बारे में सोंचते भी नही थे.1894 में बिहार टाइम्स और बिहार बन्धु (संपादक -केशवराम भट्ट ) ने इस बौद्धिक आन्दोलन तेज किया. 1889 में प्रकाशित नज़्म में पाते हैं जिसका शीर्षक था- ‘सावधान ! ये बंगाली है”. इस भाव की ही एक और प्रस्तुति 1880 में ‘बिहार के एक शुभ-चिंतक’ का पत्र है जिसमें बंगालियों की तुलना दीमकों से की गई है जो बिहार की फसल (नौकरियों) को ‘खा रहे हैं.
सच्चिदानंद सिन्हा ने शुरू की निर्णायक लड़ाई
1900 के बाद इस मांग को बल मिला जब सच्चिदानंद सिन्हा जैसे नौजवान बिहारी शब्द को लेकर पहचान की लड़ाई शुरू की. इसका ही एक प्रतिफलन बिहार का बंगाली विरोधी आन्दोलन था, जो बिहार के प्रशासन और शिक्षा के क्षेत्र में बंगालियों के वर्चस्व के विरोध के रूप में उभरा. उस वक्त बिहार का नौजवान बिहार के स्टेशन पर ‘बंगाल पुलिस’ का बैज लगाकर ड्यूटी देता था. आम तौर पर यह कहा जाता है कि ब्रिटिश सरकार ने बंगाल के टुकड़े करके उभरते हुए राष्ट्रवाद को कमजोर करने का प्रयास किया, लेकिन बिहार को बंगाल से अलग लेने का निर्णय के पीछे का कारण बिहार की उपेक्षा थी. एल. एस. एस ओ मैली से लेकर वी सी पी चौधरी तक विद्वानों ने बिहार के बंगाल के अंग के रूप में रहने के कारण बढ़े पिछड़ेपन की चर्चा की है. इस चर्चा का एक सुंदर समाहार गिरीश मिश्र और व्रजकुमार पाण्डेय ने प्रस्तुत किया है. सबने माना है कि बिहार का बंगाल से अलग किए जाने का कोई बड़ा विरोध बंगाल में नहीं हुआ. यह लगभग स्वाभाविक सा ही माना गया.

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