बाबरी मस्जिद विवाद : क्या रामलला विराजमान कह सकते हैं कि उस जमीन पर मालिकाना हक़ उनका है? - सुन्नी बोर्ड
अयोध्या मामले में आज सुनवाई के 21 वें दिन मात्र डेढ़ घण्टे की सुनवाई हुई क्योंकि सुनवाई करने वाली संविधानपीठ दोपहर 2 बजे के बाद बैठी थी। सुन्नी वक्फ़ बोर्ड ने निर्मोही अखाड़ा की याचिका के दावे का विरोध करते हुए कहा कि विवादित जमीन पर निर्मोही अखाड़े का दावा नहीं बनता क्योंकि विवादित ज़मीन पर नियंत्रण को लेकर दायर उनका मुकदमा, सिविल सूट दायर करने की समयसीमा ( लॉ ऑफ लिमिटेशन ) के बाद दायर किया गया था।
सुन्नी वक्फ़ बोर्ड के वकील राजीव धवन ने दलील दी कि 22-23 दिसंबर 1949 को विवादित जमीन पर रामलला की रात मूर्ति रखे जाने के करीब दस साल बाद 1959 में निर्मोही अखाड़ा ने सिविल सूट दायर किया था जबकि सिविल सूट दायर करने की समयसीमा 6 साल थी।
राजीव धवन ने 1962 में दिए गए सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले का हवाला देते हुए कहा कि हाईकोर्ट के फैसले पर सवाल उठाया और कहा कि जो गलती हुई उसे जारी नहीं रखा जाए। यही कानून के तहत होगा।
धवन ने कहा कि निर्मोही अखाड़ा ने यह साबित किए जाने कि कोशिश करी है कि जमीन पहले हिन्दू पक्षकारों के अधिकार में थी। यह मानकर अदालत को विश्वास दिलाया जाता रहा है जो उचित नहीं है।
निर्मोही अखाड़ा ने जो गैरकानूनी कब्जा चबूतरे पर किया उस पर मजिस्ट्रेट ने नोटिस कर दिया जिसके बाद से इसके बाद न्यायिक समीक्षा शुरू हुई और एक नोटिस जोकि गलत दावा था। उसके चलते आज 2019 में सुप्रीम कोर्ट सुनवाई कर रहा है।
मुस्लिम पक्ष के वकील राजीव धवन ने हिंदू पक्ष के दावे पर सवाल उठाते हुए कहा कि 'क्या रामलला विराजमान कह सकते हैं कि उस जमीन पर मालिकाना हक़ उनका है ? नहीं, उनका मालिकाना हक़ कभी नहीं रह है!
राजीव धवन ने कहा कि निर्मोही आखड़ा राम चबूतरे पर बाहर के आंगन पूजा करते थे, उन्होंने कभी अंदर पूजा नही की, फिर वो अंदर के आंगन में कैसे पहुंचे, क्या हम मजिस्ट्रेट के पास जा सकते हैं और कह सकते हैं कि आप मुझे मेरा कर्तव्य देते हैं। मामले की सुनवाई काल भी जारी रहेगी।
गौरतलब है कि निर्मोही अखाड़ा ने दलील दी थी कि उनके सिविल सूट के मामले में लॉ ऑफ लिमिटेशन का उल्लंघन नहीं हुआ है क्योंकि 1949 में तत्कालीन मजिस्ट्रेट ने सीआरपीसी की धारा 145 के तहत विवादित जमीन को अटैच ( प्रशासनिक कब्जे में ) कर दिया था। और उसके बाद मजिस्ट्रेट ने उस विवादित जमीन को लेकर कोई आदेश पारित नहीं किया। निर्मोही अखाड़ा ने दलील दी थी कि जबतक मजिस्ट्रेट ने आखरी आदेश पारित नहीं किया लॉ ऑफ लिमिटेशन वाली छः साल की सीमा लागू नहीं होती! इलाहाबाद हाईकोर्ट ने निर्मोही अखाड़ा और सुन्नी वक्फ़ बोर्ड दोनों की याचिका को इसी लॉ ऑफ लिमिटेशन के आधार पर ख़ारिज कर दिया था। हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि 'कॉज ऑफ एक्शन' यानि मजिस्ट्रेट ने विवादित जमीन को अटैच करने का आदेश 1949 का था इसलिए छः साल बाद दायर दोनों सूट 'टाइम बार्ड' यानी समयसीमा के बाद दायर किये गए हैं। निर्मोही अखाड़ा ने 1959 में और सुन्नी वक्फ़ बोर्ड ने 1961 में सूट दायर किया था।

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