बाबरी मस्जिद विवाद : 34 वां दिन: सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड की दलील पूरी हुई
अयोध्या मामले में आज सुनवाई के 34वें दिन मुस्लिम पक्ष ने हिन्दू पक्ष के इस दावे का विरोध किया कि बाबरी मस्जिद इस्लाम के स्थापित नियम के खिलाफ थी। मुस्लिम पक्ष के पक्षकार के वकील मोहम्मद निज़ाम पाशा ने दलील दी कि बाबरी मस्जिद वैध मस्जिद थी या नहीं, वहां वजू करने की व्यवस्था थी या नहीं इसे इस्लाम के सिद्धांतों पर परखने की जरूरत नहीं है। यह देखे जाने की जरूरत है कि वहां के लोग इसे मस्जिद मानते थे या नहीं।
आज सुनवाई के एक बात और साफ हो गयी कि अयोध्या मामले में मध्यस्थता से समाधान का रास्ता करीब-करीब बंद हो गया है। रामलला विराजमान के वकील सीएस वैद्यनाथन ने संविधानपीठ से कहा कि मध्यस्थता को लेकर तमाम खबरें चल रही हैं लेकिन हम किसी मध्यस्थता में शामिल नहीं हैं। इसपर चीफ जस्टिस रंजन गोगोई ने कहा कि हम इन बातों पर ध्यान नहीं देते क्योंकि सुनवाई काफी एडवांस स्टेज में है।
जाने सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड के वकील मोहम्मद निज़ाम पाशा ने अपनी जिरह में क्या कहा
अपनी दलील की शुरुआत करते हुए निजाम पाशा ने कहा कि 'निर्मोही' का मतलब होता है मोह का अभाव और 'बैरागी' का मतलब वैराग्य होता है। फिर भी ये लोग जमीन पर कब्जे की मांग पर अड़े हुए हैं! निर्मोही अखाड़े को संपत्ति से लगाव नहीं होना चाहिए लेकिन वह अभी भी दावा करते हैं। इसलिए बहस धार्मिक पहलुओं पर आधारित नहीं होनी चाहिए बल्कि कानूनी पहलू पर होनी चाहिए।
निज़ाम पाशा ने दलील दी कि वज़ू को लेकर हदीस में कहा गया कि यह बेहतर होगा कि वज़ू घर से कर के मस्जिद आया जाए। इसलिए विवादित ढांचे पर वजू के लिए स्थान का नहीं होना कोई बड़ी बात नहीं है। हिन्दू पक्ष की दलील थी कि बाबरी मस्जिद में वज़ू करने की कोई जगह नहीं थी। निज़ाम पाशा ने जमाली कमाली मस्जिद, सिद्धि साईद मस्जिद का उदाहरण देते हुए कहा कि उस मस्जिद में कोई गुम्बद नहीं है पर जाली लगी हुई है जिसे 'ट्री ऑफ लाइफ' कहते हैं। यही नहीं वहां पर जो नक्काशी है उसमें पेड़ और फूल बने हुए हैं। हिन्दू पक्ष की दलील है कि विवादित ढांचे जिसे मुस्लिम पक्ष मस्जिद कहता है उसमें गुम्बद नहीं थी। हिन्दू पक्ष की यह भी दलील है कि विवादित जमीन की खुदाई में ढांचे के जो अवशेष मिले हैं उसमें पेड़ और फूल बने हैं जो मस्जिदों में नहीं होते।
निज़ाम पाशा ने कहा कि हज़रत निज़ामुद्दीन दरगाह और अजमेर में दरगाह के पास क़ब्र मौजूद है और दोनों दरगाहों के पास मस्जिद भी है तो हिन्दू पक्ष की यह दलील कि बाबरी मस्जिद के पास क़ब्र थी और वह मस्जिद नही थी यह ग़लत है।
पाशा ने दलील दी कि अगर एक व्यक्ति भी मस्जिद में नामज़ पढ़ता है तो उसके मस्जिद होने का स्टेट्स बरक़रार रहेगा। यह कहना कि बाबरी मस्जिद में सिर्फ दो वक़्त की नामज़ होती थी इसलिए उसका मस्जिद होने का स्टेट्स खत्म हो गया यह ग़लत है। निज़ाम पाशा ने कहा कि यह कहना गलत है मस्जिद में खाना नहीं बनाया जा सकता और खाया नहीं जा सकता। पाशा ने एक हदीस का हवाला देते हुए कहा मोहम्मब्द साहब ने मस्जिद में खाना खाया था।
निज़ाम पाशा ने दस्तावेज़ों के ट्रांसलेशन पर भी सवाल उठाया,मीर बाकी को बाबरनाम मे ताशकंदी बताया गया क्योंकि यह ताशकंद से था, मीर बाकी इस्फ़हान नही था बाकी आसिफ़ था आसिफ का मतलब दूसरा(second) होता है पाशा बताने की कोशिश कर रहे है फ़ारसी से अनुवाद में कई तरह की गलतियां है। निज़ाम पाशा के ट्रांसलेशन पर सवाल उठाने पर CJI ने कहा कि आप जिन ट्रांसलेशन पर सावल उठा रहे है उसका सही ट्रांसलेशन करके इंग्लिश में दिए और उस शब्द के सही ट्रांसलेशन का सबूत दिए।
जाने सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड के वकील शेखर नाफड़े ने अपनी जिरह में क्या कहा
मुस्लिम पक्ष के वकील शेखर नाफड़े ने कल की अपनी अधूरी रह गयी दलील को पूरा करते हुए कहा कि1885 में विवादित जमीन के केवल एक हिस्से पर दावा किया गया था और अब पूरी जगह का दावा किया जा रहा है। सवाल यह है कि 1885 में महंत रघुबर दास ने जो सूट दायर किया था वह पूरे हिंदुओं का प्रतिनिधित्व कर रहे थे या नहीं। शेखर नाफड़े 'रेस ज्युडिकेटा' पर दलील दे रहे थे।
रेस ज्युडिकेटा का मतलब होता है किसी दीवानी वाद में कोर्ट ने फैसला सुना दिया है तो वही वाद, वही वादी उसी कोर्ट में दायर नहीं कर सकता। महंत रघुबर दास ने 1885 में अगर व्यक्तिगत हैसियत से सूट दायर किया था तब रेस ज्युडिकेटा लागू नहीं होगा।
जस्टिस बोबडे ने कहा कि अखाड़ा या हिंदुओं द्वारा ऐसा कोई दावा नहीं किया गया था कि रघुबरदास उनका प्रतिनिधित्व कर रहे थे। महंत रघुबरदास ने यह भी नहीं कहा कि वह पूरे हिंदुओं या मठ का प्रतिनिधित्व कर रहे थे। नाफड़े ने दलील दी कि महंत 'मठ और हिंदुओं' के कानूनी प्रतिनिधि हैं। महंत जब एक बार कहता है कि वह पूजा स्थल का महंत है, तो वह मठ का कानूनी प्रतिनिधि होता है और अपने आप ही हिन्दू श्रद्धालुओं का प्रतिनिधि बन जाता है।
शेखर नाफड़े ने कहा कि इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज ने 1885 के फैसले को भी माना, ज्यूडिशियल कमिश्नर में साफ कहा गया कि महंत रघुवरदास ने चबूतरे के लिए क्लेम किया था।नाफड़े ने कहा कि हिन्दू पक्षकारों ने सीमित अधिकार माना था, उन्होंने अपने अधिकार को बढ़ाने की कोशिश की और सीता की रसोई पर भी दांव किया
सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड के वकील शेखर नाफड़े ने कहा कि हिन्दू का अंदरूनी आंगन में कोई अधिकार नही था यह ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट ने भी माना था। नाफड़े ने कहा कि हिंदुओं का वह पर सीमित अधिकार था, वह पर मस्जिद मौजद थी। अंदरूनी आंगन मस्जिद का हिस्सा थी, रघुबरदास ने जो कहा भी निचली अदालत में कहा वह पूरे हिंदुओं की तरफ से था इसी लिए 1885 का फैसले रेस ज्युडिकेटा लागू होता है।।
आज मुस्लिम पक्ष की दलीलें पूरी होने के बाद हिन्दू पक्ष ने उन दलीलों पर जवाब देना शुरू किया।
जाने हिन्दू पक्ष के वकील परदारन ने मुस्लिम पक्ष की दलील पर जवाब देते हुए क्या कहा
रामलला विराजमान के वकील के परासरन की दलील दी कि विवादित जगह पर मूर्ति थी या नहीं यह महत्वपूर्ण नहीं। पूजा स्थल कई प्रकार के होते हैं, कहीं मूर्ति होती है कहीं नहीं होती। पूजास्थल का उद्देश्य देवत्व की पूजा। मूर्ति नहीं होने को आधार बनाकर जन्मस्थान पर सवाल उठाना उचित नहीं।
परासरन ने भगवान के स्वयंभू रुप पर दलील देते हुए कहा कि भगवान दो रूप में होते हैं, एक तो मूर्ति रुप में दूसरा जो स्वयं प्रकट होतै हैं, मेरे यहां भूमि भी स्वयंभू होती है। परासरन ने जमीन की दिव्यता के बारे में बताते हुए कहा कि जरुरी नहीं कि भगवान का कोई निश्चत रूप हो लेकिन सामान्य लोगों को पूजा करने के लिये एक आकृति की जरुरत होती है जिससे लोगों का ध्यान केन्द्रित हो।
परासरन ने दलील दी कि हिंदुओं कि आस्था है कि जब भक्त पर कोई संकट आता है तब भगवान आते हैं। महाभारत इसका सीधा उदाहरण है जहां भगवान के शस्त्र उठाए बिना पांडवों को जीत मिल गई क्योंकि भगवान उनके साथ थे। परासरन मुस्लिम पक्ष द्वारा रामलला के 'न्यायिक व्यक्तित्व' होने पर उठाए गए सवाल का जवाब दे रहे हैं। मंगलवार को भी उनकी दलील जारी रहेगी।
वरिष्ठ वकील ने कहा कि भगवान को अपने लोगों की रक्षा के लिए संरक्षित करना होगा। कोई भी मूर्ति का मालिक नहीं है। इसका विश्वास है जो महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। वह कभी पैदा नहीं होता और वह कभी नहीं मरता. उसकी कोई शुरुआत और अंत नहीं है। लोगों को पूजा करने के लिए यह सुनिश्चित करने के लिए अभिव्यक्ति को बनाए रखने की आवश्यकता थी। दिव्यता के बाद ही मूर्ति पवित्र हो जाती है।
परासरन ने कहा कि भगवान को अपने लोगों की रक्षा के लिए संरक्षित करना होगा। कोई भी मूर्ति का मालिक नहीं है। इसका विश्वास है जो महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है. वह कभी पैदा नहीं होता और वह कभी नहीं मरता। उसकी कोई शुरुआत और अंत नहीं है. दिव्यता के बाद ही मूर्ति पवित्र हो जाती है। परासरन ने कहा कि मूर्ति अपने आप में न्यायिक व्यक्तित्व नहीं है, लेकिन एक मूर्ति की जब स्थापना और पूजा होती है तब उसमें न्यायिक व्यक्ति विकसित होता है, क्योंकि उसमें देव की पवित्रता आ जाती है। परासरण ने जस्टिस बोबड़े के सवाल पर कहा कि हिंदुओं की यह आस्था है कि जब भक्त या आस्था संकट में होती है, तब भगवान आते हैं।महाभारत इसका सीधा उदाहरण है, जहां भगवान के शस्त्र उठाए बिना पांडवों को जीत मिल गई, क्योंकि भगवान उनके साथ थे। परासरन ने कहा कि धवन ने हमारे सवालों पर 4 दिन जवाब दिया, लेकिन मेरे बोलने पर सवाल खड़ा कर रहे हैं. मैं जो भी बोल रहा हूं उसका मतलब है। स्वयंभू दो प्रकार के होते हैं एक तो मूर्ति रूप में दूसरा जो स्वयं प्रकट होते हैं. मेरे यहां भूमि भी स्वयंभू होती है। जमीन की दिव्यता के बारे में बताते हुए परासरण ने कहा कि जरूरी नहीं है कि भगवान का कोई निश्चत रूप हो लेकिन सामान्य लोगों को पूजा करने के लिये एक आकृति की जरूरत होती है, जिससे लोगों का ध्यान केंद्रित हो.बोबड़े ने पूछा कि आपको इस जमीन को ज्यूरिस्टिक पर्सन बताने के लिये दिव्य साबित करने की जरूरत क्यों पड़ रही है? परासरण ने कहा- सामान्य लोगों को पूजा करने के लिये भगवान के एक रूप की जरूरत पड़ती है जबकि जो लोग आध्यात्म में काफी ऊपर उठ चुके होते हैं उनको इसकी जरूरत नहीं पड़ती। परासरन ने कहा कि हिंदू धर्म में ईश्वर एक होता है और सुप्रीम होता है। अलग रूप में अलग प्रकार से अलग-अलग मंदिरों में पूजा होती है। राजीव धवन ने परासरन की दलील पर विरोध किया और कहा कि ये जो उदाहरण दे रहे हैं इसका इस केस से कोई लेना देना नहीं हैं।इन्होंने हमारे उठाए सवाल का जवाब नहीं दिया। परासरन की दलील- विवादित जगह पर मूर्ति थी या नहीं, यह महत्वपूर्ण नहीं है. पूजा स्थल कई प्रकार के होते हैं। कहीं मूर्ति होती है, कहीं नहीं होती. पूजास्थल का उद्देश्य देवत्व की पूजा है। मूर्ति नहीं होने को आधार बनाकर जन्मस्थान पर सवाल उठाना उचित नहीं। राजीव धवन ने हिंदू पक्षकर के वकील परासरन के ज़रिए दिए जा रहे उदाहरण पर आपत्ति जताते हुए कहा कि जो उदाहरण दिए जा रहे हैं, उसका इस केस से कोई लेना देना नही है. जब हम उदाहरण दे रहे थे तो कोर्ट ने हमको टोका हम चाहते है कि कोर्ट इस मामले में निष्पक्ष रहे। परासरन ने कहा कि न्यायिक व्यक्ति को हिंदू कानून की दृष्टि से देखा जाना चाहिए। रोमन कानून या अंग्रेजी कानून से देखना गैरजरूरी ह। परासरन ने कहा कि हिंदू धर्म में परम ईश्वर एक परम आत्मा है, जिसकी विभिन्न मंदिरों में विभिन्न रूपों में पूजा की जाती है।जाने चीफ जस्टिस रंजन गोगोई ने क्यों याचिकाकर्ता से क्यों कहा कि आप हमसे वह मांग रहे है जो हमारे पास नही है
आज एक बार फिर मुख्यन्यायाधीश ने कहा है कि सुनवाई नियत समय में पूरी होनी चाहिए। कोर्ट के पास समय नहीं है। हिंदू पक्ष से जन्मभूमि पुनरोद्धार समिति के वकील पीएन मिश्रा ने कोर्ट से और समय की मांग की तो चीफ जस्टिस रंजन गोगोई ने कहा - हमारे पास समय नहीं है, आप वो चीज मांग रहे हैं जो हमारे पास है ही नहीं।
सुप्रीम कोर्ट ने हिन्दू पक्षकारों से कहा कि मुस्लिम पक्ष की दलीलों पर गुरुवार तक जवाब पूरा करें। शुक्रवार को राजीव धवन सुन्नी वक्फ़ बोर्ड की तरफ से दलील देंगे।

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