बाबरी मस्जिद विवाद : 20 वां दिन- हिन्दू पक्ष के गवाहों के बयान पर विश्वास नहीं किया जा सकता - सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड
अयोध्या मामले में सुनवाई के 20वें दिन मुस्लिम पक्षकारों के वकील राजीव धवन ने अपने दलील को आगे बढ़ाते हुए कहा कि निर्मोही अखाड़ा की ओर से हाई कोर्ट में जो गवाहियां दी गयी हैं उन्हें स्वीकार नहीं किया जा सकता है। बता दें शुक्रवार को अयोध्या मामले की सुनवाई के लिए संविधान पीठ नहीं बैठेगी। सोमवार और मंगलवार को कोर्ट की छुट्टी है। मतलब अब अयोध्या मामले की अगली सुनवाई बुधवार को होगी।
राजीव धवन ने कहा कि राम चबूतरे पर पूजा और पूजा का अधिकार कभी मना नहीं किया। विवाद पूरी जमीन के स्वामित्व को लेकर है। राजीव धवन की दलील पर जस्टिस नज़ीर ने पूछा कि आप तो यह मान रहे हैं कि आप और निर्मोही अखाड़ा उस जगह पर साथ साथ थे ? मुस्लिम पक्षकार के वकील राजीव धवन ने कहा कि हमने कभी नहीं कहा कि निर्मोही अखाड़े का मालिकाना हक़ था। मालिकाना हक़ हमेशा से सुन्नी वक्फ़ बोर्ड के पास था और है। धवन ने कहा कि राम चबूतरा पर निर्मोही अखाड़ा पूजा करता रहा है और हम इसे मानते हैं कि उनका उस जगह पर पूजा का अधिकार है।
सुनवाई के दौरान वकील राजीव धवन ने 1880 के एक मुकदमें का ज़िक्र करते हुए कहा कि दोनों उपासकों की ओर तरफ से पूजा का अधिकार नही मांग रहे है दोनों ही प्रबंधन और प्रभार के अधिकार क्यों मांग रहे है?
जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा कि जब आप निर्मोही अखाड़ा के पूजा के अधिकार को मान चुके हैं तो फिर इन बातों का क्या मतलब है? इस पर धवन ने कहा कि हम पूजा के अधिकार को मानते हैं लेकिन ज़मीन पर मालिकाना हक के दावे का विरोध करते हैं। राजीव धवन ने आज फिर 'contenous wrong' यानी लगातार होने वाली ग़लती की बात की। उन्होंने कहा कि एक बार मस्जिद या विवादित ज़मीन पर मूर्ति रख दी गई और उसके बाद उस गलती को बरकरार रखा गया। इस contenous wrong को जारी नहीं रखा का सकता।
मुस्लिम पक्षकार के वकील राजीव धवन ने कहा कि Possesion (स्वामित्व) शब्द art की एक टर्म है, जबकि belonging (संबद्ध) आर्ट का शब्द नहीं है।जस्टिस बोबडे ने पूछा कि possesion (स्वामित्व) आर्ट की टर्म क्यों हैं? जस्टिस नज़ीर ने कहा कि belonging शब्द उनकी याचिका में है और किसी भी क़ानून में नहीं है, आप इसपर क्यों बहस कर रहे है? राजीव धवन ने कहा कि क्योंकि वे ने कहा है कि belonging का मतलब 'कुछ और है' ( something else) जस्टिस DY चंद्रचूड़ ने कहा कि वह शेबेट है और यह उनका अधिकार है। राजीव धवन ने कहा कि हमको देखना होगा शेबेट के क्या अधिकार है, शेबेट के अधिकार सीमित हैं, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि मूर्ति कहाँ है मूर्ति जहां जाती है शेबेट वही रहता है।
उनका कहना है कि उनका अधिकार छीना जा रहा है। जस्टिस DY चन्द्रचूड़ ने कहा कि शेबेट के प्रबंधन और प्रभार को मांग रहे है प्रबंधन और प्रभार देवता के लिए है उनके सभी अधिकार देवता के लिए है। राजीव धवन ने कहा कि ट्रस्टी और शेबेटशिप में फ़र्क़ होता है। वह एक ट्रस्ट की अवधारणा है, लेकिन वह मालिक नहीं है। राजीव धवन ने कहा कि मूर्ति को दूर नहीं ले जाया गया जगह स्थानांतरित कर दी गई।इसलिए वह कहते हैं कि पूजा करना चाहते है।मेरा अनुरोध है कि यह याचिका के संदर्भ में देखा जाए।
सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड के वकील राजीव धवन ने कहा कि निर्मोही अखाड़ा 1734 से अस्तित्व का दावा कर रहे हैं। मैं कह सकता हूं कि निर्मोही अखाड़ा 1855 में बाहरी आंगन थे और वह वहां रहे हैं। धवन ने कहा कि राम चबुतरा बाहरी आँगन में है जिसे राम जन्म स्थल के रूप में जाना जाता है और मस्जिद को विवादित स्थल माना जाता है। । धवन ने निर्मोही अखाड़ के गवाहों के दर्ज बयानों पर जिरह करते हुए महंत भास्कर दास के बयान का हवाला देते हुए कहा कि उन्होंने माना कि मूर्तियों को विवादग्रस्त ढांचे में रखा गया था।राजीव धवन ने श्री के. के. नायर और गुरु दत्त सिंह,डीएम और सिटी मैजिस्ट्रेट की 1949 की तस्वीरों को कोर्ट को दिखाया।
राजीव धवन ने राजा राम पांडे और सत्य नारायण त्रिपाठी के बयान में विरोधभास के बारे में सुप्रीम कोर्ट को बताया है। धवन ने कहा कि ऐसा लगता है कि कई गवाहों के बनयान को प्रभावित किया गया। एक गवाह के बारे के बताते हुए धवन ने कहा कि उसने 14 साल की उम्र में RSS जॉइन किया था, बाद में RSS और VHP ने उसको सम्मानित भी किया ।
सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड के वकील धवन ने एक गवाह के बारे में बताते हुए कहा कि गवाह ने 200 से अधिक साक्ष्य दिया और विश्वास करता है कि एक झूठ बोले में कोई नुकसान नही है, जब मंदिर की ज़मीन ज़बरदस्ती छीनी गई है। जस्टिस DY चंद्रचूड़ ने कहा कि इन विरोधाभासों के बावजूदभी आप यह मान रहे है उन्होंने अपनी शेबेटशिप के अधिकार स्थापित कर लिए हैं।
राजीव धवन ने कहा कि मैं उनको झूठा नही कह रहा हूं लेकिन में यह समझना चाह रहा हैं कि वह खुद को शेबेटा तो बता है लेकिन उनको नही मालूम की कब से शेबेट है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अगर आप निर्मोही अखाड़ा के अस्तित्व को मान रहे है तो उनके संपूर्ण साक्ष्य को स्वीकार किया जाएगा।
राजीव धवन ने कहा कि कुछ लोग कहते हैं कि निर्मोही अखाड़ा 700 साल पहले कुछ उससे भी पहले का मानते हैं। मैं निर्मोही अखाड़ा की उपस्थिति 1855 से मानता हूं, 1885 में महंत रहहुबर दास ने मुकदमा दायर किया,हम 22 - 23 दिसंबर, 1949 के बयान पर बात कर रहे हैं।

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